रवीश कुमार-
करण थापर शानदार हैं। बस उन्हें अब दो गिलास पानी की जगह हाई स्टैंडर्ड की चीज़ें रखनी चाहिए। करण इंटरव्यू को इंटरव्यू की तरह करते हैं। गोदी चैनलों के एंकर अपना स्लॉट भरने के लिए करते हैं। उस दिन उनकी लगभग छुट्टी हो जाती है। ठीक उतनी देर काम करते हैं जितनी देर इंटरव्यू चलता है। उसके बाद समोसा और चाट का फोटो ट्विट करते हैं। इंटरव्यू से एक दो पंच लाइन निकाल कर घर रेस हो जाते हैं।
इसलिए इन चैनलों में हर दिन किसी को इंटरव्यू के लिए खोजा जाता है। इस कारण दिल्ली में इंटरव्यू देने वाले इतने पैदा हो गए हैं कि मुझे भी तंग करने लगे हैं कि इंटरव्यू ले लो। इंटरव्यू ले लो। रोज़ मेरा एक घंटा मना करने में जाता है। घर से निकलता हूँ कि रास्ते में कोई न कोई मिल जाता है कि इंटरव्यू ले लो। परेशान हो गया हूँ अपना इंटरव्यू करवाने वाले से।
चुनाव में इतने मुद्दे हैं। कोई एंकर मेहनत नहीं करना चाहता। वह मुद्दों पर रिसर्च नहीं करेगा। कम ही हैं लेकिन दो चार पत्रकारों ने मुद्दों पर गहरी रिपोर्ट की है। उन्हीं के काम को आगे बढ़ा देता। ये सब असल काम करने के बजाए नक़ली इंटरव्यू करेगा ताकि लगे कि वह प्रासंगिक है। महत्वपूर्ण है। इंटरव्यू का स्टेट्स बढ़ाया जाता है। इससे दर्शकों को भी आवारा बनाया जाता है कि आप मुद्दों को छोड़ इंटरव्यू देखें। एंकर तो है ही लोफ़र। इतने एंकर हैं किसी की करण थापर की तरह साख नहीं है।
चुनाव में कौन जीतेगा इसे लेकर इस देश में पाँच सौ लोग दावा करते हैं। ढाई सौ ग़लत होते हैं और ढाई सौ सही होते हैं। इसमें तो बड़ी बात नहीं है। लेकिन अगर इसी दावे के आधार पर किसी का एक दिन में पाँच पाँच इंटरव्यू होने लगे तो यह बताता है कि भले जीत रहे हों लेकिन प्रधानमंत्री के इंटरव्यू से कुछ निकल नहीं रहा है। पचास इंटरव्यू की मेहनत बेकार गई। प्रधानमंत्री को एक ही इंटरव्यू देना था और वो भी करण थापर को। फिर प्रशांत किशोर की ज़रूरत नहीं पड़ती।
कृपया करण पानी की जगह वाइन रखा करें। हर बार वही लोटा और वही पानी और वही प्यासा सावन।


