
सुनील चतुर्वेदी-
पानी को विज्ञान के विषय की तरह पढ़ने के बाद जब मैंने इन दिनों भारतीय परंपरा में पानी को खोजना चाहा तो अचंभित रह गया। वेदों, उपनिषदों, संहिताओं, स्मृतियों, पुराणों में पानी को लेकर खूब लिखा गया है। और सबसे महत्वपूर्ण यह है कि पानी को जीवन के लिये एक आवश्यक तत्व की तरह नहीं बल्कि ‘दर्शन’ के रूप में व्याखित किया गया है।
5वीं शताब्दी में वराह मिहिर ने वृहतसंहिता में 125 श्लोक में पूरा जल विज्ञान ही लिखा है जिसमें भूजल का पता लगाने युक्तियों के साथ कुएँ और तालाब बनाने की विधियाँ भी बतायी गयी है।
हमारे पुरखों ने यह सब पढ़ा, गुना, जाना और जीवन में उतारा था। बरसात के पानी को सहेजने के लिये उन लोगों ने बहुत कुछ किया। ज़ाहिर है कि हमारे पूर्वजों का ‘वाटर मैनेजमेंट’ आज से बेहतर और विवेकपूर्ण था। आइये जानते है उनका वाटर मैनेजमेंट कैसा था।
उत्तराखण्ड और उत्तरप्रदेश की पारंपरिक जल संरचनायें-
उत्तराखण्ड में गढ़वाल और कुमायूँ क्षेत्र में जल संचय की नौला पद्धति हज़ारों साल पुरानी है। मेरे पूछने पर कुछ ग्रामीणों ने बताया कि पांडव के समय से पानी संचित करने की यह प्रथा चली आ रही है। इतिहास में भी 7 वीं शताब्दी में नौला निर्माण कराये जाने की बात पढ़ने को मिलती है।
इस पद्धति में पहाड़ों से रिसने वाली पानी को पत्थर की दीवार बनाकर चौकोर या गोल कुंड बनाकर संग्रहित किया जाता है। गाँव की आबादी के अनुसार गाँव में एक या अधिक नौला होते थे। नौला के पानी को शुद्ध करने के लिये उसमें नियमित जड़ी-बूटियाँ और आँवले के फल डाले जाते थे। नौला में संचित जल का वाष्पीकरण रोकने के लिये नौला के आसपास छायादार वृक्ष लगाये जाते थे। हर गाँव पानीदार था। आपने, हमने भी दस-पंद्रह साल पहले पहाड़ों की यात्रा के दौरान इन नौलों से पानी पिया होगा। लेकिन आज हालात भिन्न हैं। जंगल काटे जाने और सड़कों के निर्माण ने लगभग सभी सोतों को सूखा दिया है। हाल ही में अपनी उत्तराखण्ड यात्रा में मुझे जल संचय की यह पारंपरिक पद्धति कहीं दिखाई नहीं दी। परिणाम उत्तराखण्ड का हर तीसरा गाँव आज जल संकट का सामना कर रहा है। और सड़क किनारे जहां कभी प्राकृतिक पानी के सोते होते थे वहाँ आज हर जगह बोतल बंद पानी बिक रहा है।
इसी तरह गढ़वाल इलाक़े में पहाड़ से बहकर बेकार जाने वाले पानी को नाली बनाकर खेतों में पहुँचाया जाता था जिसे ‘गुहल’ कहा जाता था। इस संरचना से सभी किसानों को पानी मिले और इसकी देखरेख, मरम्मत के लिये ठेकेदार नियुक्त किया जाता था। ठेकेदार को उसके काम के बदले सभी किसान फ़सल से एक निश्चित हिस्सा देते थे। आज समाज द्वारा बनायी पानी के प्रबंधन की यह व्यवस्था भी चरमरा गयी है।

उत्तर प्रदेश की बात करें तो यहाँ गंगा के मैदानी इलाक़ों में कुओं के निर्माण की परंपरा रही है। बरसात के पानी के संचय के लिये तालाब भी प्रचलन में थे।
प्रयागराज के पास श्रृंगवेरपुरा में खुदायी में ई.पू. पहली शताब्दी में बनाये गये तालाब के अवशेष मिले हैं। यह तालाब बरसात के पानी को एकत्रित करने के लिये नहीं बल्कि गंगा नदी के अतिरिक्त पानी को एकत्रित करने के लिये बनाया गया था। गंगा नदी की बाढ़ का पानी एक चौड़ी नहर बनाकर एक टैंक में पहुँचाया जाता था जो सिल्ट टैंक का काम करता था। पानी के साथ आने वाली मिट्टी और कचरा इस टैंक में रुक जाता था। पानी छनकर इस टैंक से सीढ़ीदार रास्ते से होकर दूसरे तालाब में जाता था। सीढ़ीदार रास्ते से गुजरने से पानी में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ जाती थी और पानी की गंध दूर हो जाती थी। यहाँ से एक चैनल के माध्यम से पानी तीसरे तालाब में पहुँचाया जाता था। जिसे पीने के काम में लिया जाता था। तीसरे तालाब से अतिरिक्त पानी वापस गंगा नदी में नहर के माध्यम से छोड़ दिया जाता था। यह एक चैनल सिस्टम था। सदियों पुरानी बाढ़ के पानी को भी संचित करने की यह कमाल की संरचना थी।
वो लोग भी कमाल के थे जो पानी को लेकर इतना सचेत और जागरूक थे। और आज हम?
क्रमशः
जल साक्षरता (पार्ट- 8) : जल संकट का हल ढूँढना है तो पुरखों से यह तरकीबें सीखिए!


