
सुनील चतुर्वेदी-
हम पढ़-लिख कर प्रकृति से दूर हुए हमारे पुरखों ने प्रकृति को गुना और तादात्म्य बनाया था। प्रकृति के अनुरूप ही उनका जीवन था। उन्होंने प्रकृति से ज़रूरत भर लिया और जितना लिया उतना सहेज कर वापस प्रकृति को लौटाया। इसके उलट हमने अपने सुख के लिये प्रकृति का भरपूर दोहन किया। हमने जल, जंगल, ज़मीन को उपभोग की वस्तु भर माना। आज उसका परिणाम हमारे सामने है। ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु में बदलाव, पानी का संकट, मिट्टी की कम होती उर्वरा शक्ति और भी ढेरों चुनौतियाँ हैं हमारे सामने।
इन सभी पर अगर बात करेंगे तो बातों के कई सिरे खुल जायेंगे और सब समेटने में बात बहुत लंबी हो जायेगी। अभी हम इस श्रृंखला में पानी पर बात कर रहे हैं तो पानी पर ही केंद्रित रहेंगे। जल संकट का समाधान ढूँढना है तो कुछ करने के पहले यह जान लेना भी ज़रूरी है कि हमारे पुरखों ने पानी को सहेजने के लिए क्या तरकीबें लगायी थीं।

लेह-लद्दाख जैसे ठंडे प्रदेश से लगाकर तो राजस्थान जैसे गरम इलाक़ों तक बरसात के पानी को संचित कर उसके उपयोग की परंपरा रही है। इन तकनीकों पर बात करने के पहले मनुष्य द्वारा बरसात के पानी को बचाने के इतिहास पर भी एक दृष्टि डाल लेते हैं।
आज से 6000 साल पहले जब मनुष्य ने सामूहिक रूप से बसना शुरू किया तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी, पानी। उन्होंने इस चुनौती से निपटने के लिए घर की छतों और पहाड़ों से बहकर आने वाले वर्षाजल को रोकने के लिये पत्थरों को काट कर कुंड बनाये। ऐसे सबसे पुराने कुंड फ़िलिस्तीन और यूनान में पाये गये।
पानी के लिये कुओं के निर्माण के परम्परा हड़प्पा काल से शुरू हुई। इस दौर में हर तीसरे घर में कुएँ होते थे। भारतीय उपमहाद्वीप में बलूचिस्तान में किसान खेतों में गड्ढे बनाकर बरसात का पानी रोकते थे। इसी काल में (ई.पू. तीसरी शताब्दी) बरसात का पानी रोकने के लिये पत्थरों और ईंटों के बंधा बनाये जाने लगे थे।
चंद्रगुप्त मौर्य के समय में तो वर्षाजल संरक्षित करने के लिए तालाब बनाने वाले किसानों को पाँच साल के लिये कर में छूट दी जाती थी और तालाबों को नुक़सान पहुँचाने और पानी को प्रदूषित करने वालों के लिये दंड का प्रावधान भी था। तालाब से खेतों में सिंचाई के लिये नहरों का निर्माण भी किया जाता था। इसके प्रमाण नागार्जुन कोंडा की खुदायी में पाये गये।
इतिहास में पानी को लेकर दर्ज इन चंद उदाहरणों से स्पष्ट है कि पूर्व में हम अपनी आवश्यकता की पूर्ति केवल वर्षाजल को बचाकर ही करते थे। लेकिन वर्तमान में हम अपने पुरखों की इस सीख को भूल गये हैं। या यूँ कहें कि हमने अपनी विरासत को ही भुला दिया है।
कहते हैं सुबह का भूला शाम को घर लौट आये तो वह भूला नहीं कहलाता। हम लौट रहे हैं पानी बचाने की तरकीबों को अपनाने के लिये। लौट रहे हैं न!
आगे की कड़ी में जानेंगे भारत की अलग-अलग भौगोलिक स्थिति और जलवायु में पानी बचाने की क्या तरकीबें थीं।
क्रमशः


