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सुख-दुख

जल साक्षरता (पार्ट-11) : क्लाइमेट चेंज हो या पानी का संकट हमारी नजरें विदेश की तरफ ताकने लगती हैं!

सुनील चतुर्वेदी-

घर का जोगी जोगड़ा आन गाँव का सिद्ध! कहावत पुरानी है और इसके मायने गूढ़ हैं। हमारे सामने कोई संकट हो, चाहे ग्लोबल वार्मिंग हो या क्लाइमेट चेंज या पानी का संकट या फिर कोई आफ़त-विपत हो, हमारी नज़रें विदेश की तरफ ताकने लगती हैं। हमें लगता है सिद्ध तो आन गाँव का ही हो सकता है।

कुछ अच्छा कही से भी सीखा जा सकता है इस बात मेरा विरोध नहीं है लेकिन दूसरे कई देशों की भौगोलिक स्थिति, भूगर्भीय संरचना, जलवायु हमसे भिन्न है। इसलिये पहले अपने घर में ही झांक लें। हो सकता है आसन्न संकट का कारगर समाधान हमारे ही पूर्वजों के ख़ज़ाने में छुपा हो।

कल हमने लेह-लद्दाक की बात की थी। राजस्थान और गुजरात के भी कुछ इलाक़े ऐसे हैं जहां बरसात बहुत कम होती है फिर भी वहाँ लोग रहते थे, खेती भी करते थे। उनका अपना वाटर मैनेजमेंट था। आज इस श्रृंखला उसी की बात करेंगे।

उत्तर पश्चिमी राजस्थान का इलाक़ा थार मरुस्थल में आता है। इस शुष्क इलाक़े में बारिश 5 से.मी. से भी कम है। इस इलाक़े के लोग पानी की कीमत जानते थे। एक समय में जैसलमेर के गाँवों में लोग खाट पर बैठकर नहाते थे और नीचे एक तगारी में पानी इकट्ठा कर पशुओं को पिलाने के लिये दिया जाता था। मध्यप्रदेश के झाबुआ ज़िले के कुछ गाँवों में भी सन् 80 के दौर में मैंने ऐसे दृश्य देखे हैं! यानी बूँद-बूँद की कीमत थी। राजस्थान के पुरखों ने बरसात के पानी को रोकने के कई तरीक़े ईजाद किये थे। जैसे टाँका, नाड़ी, टोबा, कुंडी, तालाब, झील, जोहड़ आदि।

गाँव के घरों की छत से और सतह पर बहने वाले वर्षाजल को घर के आँगन में बने एक टाँके में इकट्ठा कर उसका उपयोग किया जाता था। जिस खुले क्षेत्र से टाँके में पानी आता था उसे आगोर कहा जाता था। इस आगोर को साफ़ रखा जाता था। कोई भी जूते-चप्पल पहिन कर इस क्षेत्र में प्रवेश नहीं करता था।

मिजोरम में भी छत से आने वाले बरसाती पानी को किसी टंकी में इकट्ठा करने की परंपरा रही है। मालवा में भी छत के पानी को घर के पास की खाली जमीन में मेड़ बनाकर रोका जाता था और उसमें धान की खेती की जाती थी। इसे ‘साल का गट्टा’ कहते थे।

महाराष्ट्र के चन्द्रपुर इलाके में भी खेत में लकड़ी के लट्ठों की मदद से मेड़ बनाकर बरसात का पानी रोककर धान की खेती का रिवाज था। स्थानीय भाषा में इसे ‘गट्टा कहा जाता था। कई प्रदेशों में बरसात का पानी रोकने के तरीक़े लगभग समान थे लेकिन संचित पानी का उपयोग जहां जैसी ज़रूरत थी वैसे किया जाता था। इसके अलावा राजस्थान के कुछ हिस्सों में ढलान के नीचे कम रिसावदार मिट्टी वाले क्षेत्र में गड्ढा बनाकर पानी रोका जाता था जिसे ‘टोबा कहा जाता था।

राजस्थान के मरू प्रदेश में कुछ इलाक़ों को ‘पार’ के नाम से जाना जाता है। पार यानी ऐसे इलाक़े जहां बरसात का बहता पानी एक जगह जमा होकर जमीन में रिस जाता है। ऐसी जगहों पर मीठे पानी के लिये कुएँ खोदे जाते थे। इन कुओं को यहाँ ‘बेरी’ नाम से जाना जाता था।

गुजरात के कच्छ क्षेत्र में भी इसी तरह मीठे पानी के लिये कुंडियाँ बनायी जाती थी। यहाँ के पूर्वज यह भी जानते थे कि मीठे पानी का घनत्व कम होने से यह खारे पानी के ऊपर जमा हो जाता है।

राजस्थान के कई इलाकों में आज से क़रीब 800 साल पहले खेती के लिये खेत में ढलान के नीचे वाले हिस्से में मिट्टी की पाल बनाकर पानी को रोका जाता था। इसे ‘खड़ींन’ कहा जाता था। खड़ींन से अतिरिक्त पानी निकालने के लिये गेट भी लगाया जाता था। बरसात के बाद इस खड़ींन में खेती किये जाने की परंपरा भी रही है।

कितने ही और भी तरीक़े खोजे गये थे राजस्थान में पानी बचाने के। हर एक इलाक़े की अपनी तकनीकें थी। सभी की बात करेंगे तो बात बहुत लम्बी हो जायेगी।

मूल बात यह है कि पहले समाज का अपनी मिट्टी, पत्थर और बहते पानी से सीधा संवाद था। वो अपने इलाक़े की मिट्टी, पानी और ज़मीन के नीचे की संरचनाओं की तासीर किसी विज्ञान की किताब से नहीं अपने पीढ़ियों के अनुभव से जानते थे। इसलिये उन्होंने अपनी मिट्टी-पानी को सहेजने के अपने तरीक़े ईजाद किये।

आज हमारा पानी से संवाद टूट गया है और हम संकट में हैं। हमें पानी से फिर संवाद स्थापित करना होगा तभी हम उसे अपने लिये बचा सकेंगे।

क्रमशः

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