
सुनील चतुर्वेदी-
लेह-लद्धाख और स्पीती- बारिश 6 से. मी. से भी कम लेकिन ‘हाहाकार’ नहीं ‘कूल’ है वहाँ!
एक कहावत है ‘माले मुफ्त दिले बेरहम’। मुफ्त का माल है लुटाये जा प्यारे! यह भी एक जीवन दर्शन है। इन दिनों पानी को लेकर हमारा यही रवैया है। देश के कुछ प्रदेशों को छोड़ दें तो अधिकांश में 60 से.मी. से लगाकर तो 200 से.मी. तक औसत बारिश होती है।
झमाझम खूब बरसता है पानी। धरती को भिगोता, नदियों को उफनाता, बहता हमसे कोसों दूर निकल जाता है। इस बरसते, बहते पानी से हमारा सारोकार कुछ पल भीगने, आनन्द लेने तक ही सीमित होता है। हम कुछ देर इन बूँदों से अपने हिस्से की धरती पर रुकने के लिये गुज़ारिश भी नहीं करते। लेकिन लेह-लद्दाख, स्पीती जैसे इलाक़े जहां बारिश 6 से.मी. से भी कम है वहाँ के पुरखे इस बारिश की कद्र जानते थे। उनके लिए ज़मीन पर गिरकर बहने वाली एक-एक बूँद बेशक़ीमती थी। वो उसे सहेजते थे, जतन से सम्हाल-सम्हाल कर वापरते।

चुनौती से ही संघर्ष की ताक़त मिलती है और संघर्ष से ही नये रास्ते खुलते हैं। चुनौती न हो तो शरीर के साथ दिमाग़ को भी जंग लगने लगता है। यहाँ जीवन के लिये वर्ष भर पानी बड़ी चुनौती थी। करो या मरो वाला आलम था। हिमालय के पुरखों ने रास्ता निकाला। साल के छह महीने दिन के समय ऊपर जमा बर्फ़ पिघलती है और देर शाम तक पानी नीचे आता है। यहाँ के बाशिंदों ने इसी पानी को इकट्ठा करने की तरकीबें खोजी।
आइये जान लेते है वो क्या थी तरकीब-
जिस तरह उत्तराखण्ड में पानी के स्रोतों के क़रीब पानी इकट्ठा करने के लिये पक्की दीवार चुनकर नौला बनाया जाता है उसी तरह लद्दाख में ग्लेशियर के मुहाने पर पत्थर की दीवार चुनकर टंकी बनायी जाती है जिसे हिमाचल में ‘कूल’ कहते हैं। इस कूल में एकत्रित पानी को नीचे लाने के लिये नाली या छोटी नहर बनायी जाती थी। इस नाली या नहर को नीचे एक गोल तालाब बनाकर उससे जोड़ दिया जाता था। लीजिये ग्लेशियर के मुहाने से गाँव तक पानी इकट्ठा करने का एक पूरा सिस्टम तैयार था। बरसात के मौसम में ऊपर से बहकर आने वाला पानी भी इसी नहर से होता हुआ तालाब में जमा होता था। सर्दियों के मौसम में इस पानी का उपयोग किया जाता था।
गर्मियों में जब तापक्रम बढ़ने के साथ ही बर्फ़ पिघलने लगती थी तो पानी शाम तक इस नहर /नाली के ज़रिए तालाब में पहुँचता था। तालाब से निकली छोटी-छोटी नहरों से पानी रात में खेतों में सिंचाई के लिये पहुँचाया जाता। सुबह होते ही खेतों तक पानी ले जाने वाली नहरों के मुहाने बंद कर दिये जाते हैं ताकि दिनभर ग्लेशियर से पिघला पानी तालाब में इकट्ठा हो सके ।पूरे गर्मी भर यही क्रम रहता है।
तालाब में जमा पानी सबको खेती के लिये मिले इसके लिये गाँव के सब लोग मिलकर एक व्यक्ति का चुनाव करते थे जिसे ‘चुरपून’ कहा जाता था। यही व्यक्ति इस बात का ख़्याल रखता था कि सबको बराबर पानी मिले।
स्पीती में तो ठंड के मौसम में तापक्रम शून्य से 40 डिग्री तक नीचे चला जाता है। बारिश भी बेभरोसे की है। चुनौती और कठिन थी लेकिन यहाँ भी इसी तकनीक के सहारे जीवन चल पड़ा था।
लाख दिक़्क़तों और चुनौतियों के बावजूद थानी-मानी थे हिमालय के गाँव। तब यहाँ के पूर्वज किसी सरकार या वैज्ञानिक के भरोसे नहीं बैठे रहे थे। उन्होंने अपनी समझ, सूझबूझ से ही रास्ते निकाले थे।
आज! ..आज हम निर्भर है सरकारों पर। जो करना है सरकार करे हम मतदान कर सारी जवाबदारियों से मुक्त हैं। पानी शुरू से व्यक्ति, समाज और सरकार सभी का मसला रहा है किसी एक का नहीं। क्या सोचते हैं आप!
क्रमशः
जल साक्षरता (पार्ट-9) : हमारे पूर्वजों का ‘वाटर मैनेजमेंट’ आज से बेहतर और विवेकपूर्ण था!


