
सुनील चतुर्वेदी-
पानी परम्परा पर लिखने का सिलसिला थम गया था। सोचा था बहुत हुआ। फिर आज एक मित्र ने यह कहकर ध्यान दिलाया कि दक्षिण भारत की परम्पराओं को क्यों छोड़ दिया! बात वाजिब थी। वाकई आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, तमिलनाडु, केरल की पानी परंपराओं पर बात किये बिना बात पूरी कैसे हो। तो आज बात दक्षिण भारत की।
केरल में रेतीले तटीय इलाक़ों में वर्षाजल संग्रहण के लिये कुएँ और पहाड़ी इलाक़ों में तालाब बनाये जाने की परंपरा थी। कुछ पहाड़ी इलाक़ों में सुरंग बनाकर कड़क चट्टानों के पीछे संग्रहित पानी को कुएँ या छोटा तालाब बनाकर एकत्रित किया जाता था। यदि सुरंग लंबी है तो जगह-जगह वायु कुपक बनाकर हवा को सुरंग के अंदर पहुँचाया जाता था।

कर्नाटक में नदियों से नहर निकालकर पानी तालाब में पहुँचाकर खेती करने की परंपरा रही है। इन तालाबों को ‘केरे कहा जाता था। तालाब श्रृंखला में बनाये जाते थे। पहाड़ी क्षेत्रों में नीचे की तरफ़ बरसात का पानी इकट्ठा करने के लिये भी छोटे तालाब बनाये जाने का प्रचलन था। जिन्हें कोल कहा जाता था।
जो बेंगलुरु आज जल संकट को लेकर चर्चा में है वहाँ के पुरखों ने आज से लगभग 300 साल पहले बाहरी हिस्से में तालाब बनाकर शहर में आने वाले बरसात के पानी को नालों का निर्माण कर तालाब तक पहुँचाया था। यही तालाब शहर के लिये पानी के स्रोत थे। आज इन जल परंपराओं का भूला देने का परिणाम सामने है।
आंध्र प्रदेश में भी कर्नाटक की तरह ही नहर के माध्यम से बरसात का पानी एक गोल तालाब में संचित किया जाता था जिसे स्थानीय लोग ‘गोंची कहते थे।
तमिलनाडू में भी तालाब और बांध बनाये जाने की परंपरा रही है। तमिलनाडू में तालाब को ‘इरी कहा जाता है।
इस श्रृंखला में जिन भी प्रदेशों की पानी परंपरा पर बात की है यूँ समझिये उनका केवल परिचय भर है। हर प्रदेश में कई और भी परंपराएँ रही हैं जो अभी भी अनकही हैं।
कुछ साथी इन जल परंपराओं की गहरायी से पड़ताल कर रहे हैं। पिथौरागढ़ इलाक़े में भाई महेश पुनेठा जी ऐसी संरचनाओं को खोजने और उन्हें सहेजने के लिये यात्राएँ निकाल रहे हैं। और भी लोग हैं जो जुटे हैं इस तरह के काम में। उन सभी नाम, अनाम साथियों को प्रणाम।
हम भी पानी बचाने में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर सकते हैं। ज्यादा नहीं तो अपने आसपास ही दस लोगों तक पानी बचाने की बात पहुँचा सकते हैं।
बात से बात चलेगी। दस से सौ.. सौ से हज़ार.. हज़ार से लाख और लाख से …पानी बचाने का संदेश यूँ ही फैलेगा। फिर एक बार रीते घट भरेंगे और हम पानीदार होंगे। आमीन!

(इस श्रृंखला को यहीं विराम देते हैं। आप सभी ने पढ़ा, सराहा बहुत शुक्रिया। फिर कभी भारतीय दर्शन में पानी और नदियों पर बात करेंगे। अगले दो महीने ज़मीनी स्तर पर पानी बचाने के काम में जुटेंगे।)
समाप्त..
जल साक्षरता (पार्ट-14) : गुरुत्वाकर्षण के नियम को तोड़ खेतों में पहुँचता था पानी!


