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जल साक्षरता (पार्ट-14) : गुरुत्वाकर्षण के नियम को तोड़ खेतों में पहुँचता था पानी!

सुनील चतुर्वेदी-

सृष्टि का पहला बीज पानी में पड़ा और अग्नि भी पानी में ही पैदा हुई। इस वेद वाक्य की मीमांसा तो मेरी तुच्छ बुद्धि से संभव नहीं। बस अपनी मोटी बुद्धि से इतना ही जान पाया हूँ कि पानी से ही जीवन की उत्पत्ति है और पानी के बिना … सोचकर ही रूह काँप जाती है। याद आते हैं पुरखे जिन्होंने इस वेद वाक्य के गूढ़ अर्थ को बुझा था और आसमान से बरसने वाली अमृत बूँदों को जीवन की तरह सहेजा था और कुदरत के ही नियम विरुद्ध जहां चाहा वहाँ पानी पहुँचा दिया।

मध्यप्रदेश के झाबुआ ज़िले के आदिवासियों ने नदी, नालों में बहाव के विपरीत मिट्टी-पत्थर के बांध बनाकर पतली नाली को जगह-जगह मोड़कर पानी गुरुत्वाकर्षण के विपरीत पहाड़ियों पर अपने खेत में पानी ले जाने की ‘पाट पद्धति’ विकसित की थी। जो देखने-सुनने वालों को हैरान और चमत्कृत करती है।

बुरहानपुर का कुण्डी भंडारा तो देश-विदेश के जलवेत्ताओं के लिये अध्ययन की विषय वस्तु है। क़रीब 800 साल पहले सतपुड़ा की पहाड़ियों से ताप्ती नदी तक पहुँचने वाले पानी को भूमिगत सुरंगें बनाकर चार भूमिगत भंडारे में संचित किया जाता था। भूमिगत जल प्रवाह के मार्ग में लगभग हर 100 मीटर की दूरी पर वायु कुपक बनाये गये थे जो कुण्डी का काम भी करते थे। इसी तरह भोपाल और इस्लामनगर की जल संरचनायें देख कर मुँह से बरबस यही निकलता है “वाह, कमाल की इंजीनियरिंग है!”

महाकौशल इलाक़े में जल संचय की ‘हवेली पद्धति’ है। इस पद्धति में खेत के चारों मेड़ बनाकर बारिश का पानी रोका जाता था। खेत की काली मिट्टी अच्छे से इस पानी को सोख लेती थी और बारिश के बाद खेत में बचे पानी को निकालकर गेहूँ की बुआई की जाती थी। इस इलाक़े में काँस (एक क़िस्म की घाँस) बहुत होती है वह भी खेत में पानी भरे होने से सड़ कर फसल के लिये खाद का काम करती थी। केश क्रोप सोयाबीन की आमद ने इस पद्धति को कई ज़िलों में ख़त्म होने के कगार पर पहुँचा दिया है।

बघेलखंड में बांध, बँधिया, मोखा जैसी संरचनायें बनाकर धान की खेती की जाती थी। मालवा-निमाड़ में बावड़ी, तालाब बनाकर बारिश का पानी बचाने की परंपरा थी। कई जगहों पर तालाब शृंखलाबद्ध बनाये जाते थे। मालवा में नालों के किनारे बावड़ियाँ बनायी जाती थी जिसे ओढ़ी संरचना कहा जाता था। यह संरचना जल संचय के अलावा नदी, नालों का वर्षाजल प्रवाह भी नियंत्रित रखती थी। अब मालवा के परिदृश्य से यह संरचना पूरी तरह ग़ायब हैं।

कई ऐतिहासिक महत्व के स्थानों और इमारतों में भी जल संचय संरचनाएँ देखने को मिलती है जैसे साँची के स्तूप, मांडव का जहाज़ महल आदि। साँची में जहां स्तूप बने है उस क्षेत्र से आने वाले वर्षाजल को रोकने के लिये एक के नीचे एक तीन तालाब बनाये गये हैं। मांडव के पूर्व में सात सौ सीढ़ी नामक स्थान पर पत्थर का बांध बनाकर ऊपर से आने वाले पानी को रोका गया है। इसके नीचे श्रृंखलाबद्ध तालाब बने हैं। छत पर आने वाले वर्षाजल को संग्रहित करने की प्रणाली जहाज़ महल में देखने को मिलती है।

विदिशा ज़िले में ग्यारसपुर तहसील के हैदरगढ़ के महल के समानांतर पहाड़ी पर तालाब बनाया गया है जिसके ओवरफ्लो को साढ़े पाँच फुट चौड़ी नहर के ज़रिये महल में बने हौज़ में पहुँचाया गया है।

उज्जैन ज़िले के महिदपुर में आज भी बहुत से निजी चौपड़ें हैं।

पानी को लेकर इतना आत्मनिर्भर था वो समाज कि कहें तो कहाँ तक! कहते-कहते थक जाएँ पर यह पानी-कथा समाप्त ही न हो। इस मंच पर लिखने और पढ़ने दोनों की सीमा है। उसी हद में रहकर कहना है। देश के और भी हिस्से हैं जिनकी पानी कथा कहनी थी लेकिन कहीं तो रोकना भी होगा।

थोड़ा लिखा ज्यादा समझना। समझने के साथ करना भी होगा। अंतिम कथा कुछ करने की।

क्रमशः

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