
Sushobhit-
जून 2021 में Anurag Vats ने रुख़ पब्लिकेशंस से मेरी पहली किताब छापी थी। उसके बाद दो और छापीं। अब चौथी भी ला रहे हैं। लेकिन पहली किताब छापने से पहले उन्होंने मुझसे एक ग़ौरतलब बात कही थी। उन्होंने कहा, “तुमको छापकर मैं बहुत बड़ा जोखिम उठा रहा हूँ!”
मानो वे किसी लेखक को नहीं, नामी चोर या डकैत को छाप रहे थे! लेकिन चोरी या डकैती तो छोटे गुनाह हैं, मेरा गुनाह इससे कहीं बड़ा था- गुनाहे-अज़ीम था, कुफ़्र था, शिर्क था- मैं इस्लाम की बुराइयों की मुख़ालिफ़त करता था। आज भी करता हूँ। और ताज़िंदगी करता रहूँगा। और हिन्दी साहित्य के संसार में इससे बड़ा पाप कोई दूसरा नहीं।
लेखक भ्रष्ट हो, चलेगा। अय्याश हो, चलेगा। रुपयों का ग़बन करने वाला हो, डोमेस्टिक वायलेंस करने वाला हो, बदज़ुबान हो, औरतों का शोषण करता हो, तानाशाह हो- सब चलेगा, लेकिन इस्लाम का आलोचक नहीं होना चाहिए। जिसने यह गुनाह किया, उसका हुक्का-पानी हिन्दी वाले बंद करवा देते हैं। क्या आपने हिन्दी की मुख्यधारा के किसी लेखक-प्रकाशक को इस्लाम की शान में ज़रा-सी भी गुस्ताख़ी करते कभी देखा?
लेकिन मैं वह गुस्ताख़ी लम्बे समय से करता आ रहा था और ठोस तर्कों के साथ कर रहा था। अनुराग इस बात को जानते थे। फिर भी वो मुझे छापना चाहते थे। तै यह हुआ था कि विश्व साहित्य और विश्व सिनेमा पर दो जिल्दें हम रुख़ से लाएँगे। अनुराग इससे उत्साहित थे, लेकिन उनके भीतर शुरू से ही यह खटका भी था कि अगर सुशोभित जैसे ‘पतित-व्यक्ति’ को छाप दिया तो हिन्दी की मुख्यधारा- जिसके साथ उनका उठना-बैठना, खाना-पीना है- उनके साथ कैसा सलूक़ करेगी।
कई लेखक हैं, जो स्वयं रुख़ से प्रकाशित होना चाहते हैं, लेकिन वे गुणवत्ता के उस मानक पर खरे नहीं उतरते, जिसे अनुराग ने रुख़ के लिए सेट किया है। इसके लिए उनके मन में ईर्ष्या और क्षोभ है। कुछ के मन में कुंठा है कि सुशोभित जैसों को क्यों छापा जा रहा है। यह कुंठा कइयों के मन में कई सालों से दबी थी, जो अब फूट पड़ी।
जब रुख़ के लिए मैंने किताबें दीं तो अनुराग की उस टिप्पणी का मान रखने के लिए कि- “तुमको छापकर मैं बहुत बड़ा जोखिम उठा रहा हूँ!”- मैंने तै किया कि जब साहित्य ही मेरा मुख्य काम है, तो मुझे बेकार की राजनैतिक टिप्पणियों से क्या सरोकार? मैं नहीं चाहता था कि मेरी वजह से अनुराग को किसी के फ़िक़रे-नसीहतों का सामना करना पड़े। मैंने अनुराग को आश्वस्त किया कि मैं अब इस्लाम वग़ैरा पर टिप्पणियाँ नहीं करूंगा, तुम निश्चिंत होकर मेरी किताबें छापो।
हालाँकि मैंने यह वादा पूरी तरह से निभाया नहीं। मैं समय-समय पर इस्लाम पर लिखता रहा, लेकिन साथ ही मैंने हिन्दुत्व, राष्ट्रवाद, केन्द्र की भाजपा सरकार के विरुद्ध भी बहुत टिप्पणियाँ कीं। यह सब मैंने जानबूझकर बैलेंस बनाने के लिए नहीं किया। मेरा सारा लेखन स्वत:स्फूर्त है, आरोपित नहीं है। लेकिन यह सब करने के कारण मेरे “गंगा नहाने” का भाव अनुराग आदि के मन में उत्पन्न हुआ होगा कि चलो यदा-कदा इस्लाम पर लिखता है तो क्या, मोदी के विरोध में भी तो लिखता है! इससे इस्लाम-विरोध का गुनाह उनकी नज़र में थोड़ा कम हो जाता था।

जब वीगनिज़्म पर मेरी किताब आई, उससे ठीक पहले मैं रुख़ से अपनी नई किताब का काम पूरा कर चुका था और वह छापेख़ाने में जा चुकी थी। वह किताब समान्तर सिनेमा पर केंद्रित है। पहले उसी को आना था, लेकिन संयोग से वीगनिज़्म वाली आ गई। रुख़ को जनवरी में पाण्डुलिपि सौंपी गई थी, हिन्द युग्म को अप्रैल में। अप्रैल में दूर-दूर तक यह ख़याल नहीं था कि यह किताब जून तक बनकर तैयार हो जाएगी और ईदुज्जुहा नामक राक्षसी-पर्व भी जून में ही आ रहा है (जी हाँ, वह एक राक्षसी-पर्व है, क्योंकि अपने ही घर में, अपने छोटे बच्चों के सामने, अपने पालतू जानवर का क़त्ल कर देना किसी भी सभ्य क़ौम का परिचय नहीं हो सकता, यह एक शैतानी कृत्य है। पूरी दुनिया के लोग मांस खाते हैं, लेकिन घर में जानवर का क़त्ल करके उसका मांस खाने का क़बीलाई अपराध इस 21वीं सदी में हर कोई नहीं कर सकता)।
हिन्द युग्म ने अपना काम फ़ुर्ती से किया और रुख़ वाले मेरी किताब को डिले करते रहे, इसमें मेरा दोष नहीं है। हिन्द युग्म वाली किताब जब छापेख़ाने में चली गई, तब जाकर मैंने समाचार-पत्र में देखा कि 17वीं जून को यह राक्षसी-त्योहार मनाया जाएगा। यह एक संयोग था। और इसे मैं बुरा संयोग नहीं मानता। जब आग लगे, तभी दमकल तुरंत आ जाए तो क्या बुरा है? हो सकता है दमकल संयोग से वहाँ से गुज़र रही थी। जानवरों पर अत्याचार और क्रूरता के सबसे बड़े त्योहार पर जानवरों के हक़ की बात करने वाली किताब आए तो क्या हर्ज़ है? अलबत्ता यह प्लान नहीं किया गया था।
जब किताब आई तो लिबरल-सेकुलर गैंग ने यह झूठ फैलाना शुरू किया कि उसमें मुसलमानों को टारगेट किया गया है (यह सरासर बेबुनियाद है और किताब पढ़ने वाले इस आरोप को तुरंत निरस्त कर सकते हैं) या कि उसे जानबूझकर ईद पर लॉन्च किया गया है आदि। इन आरोपों का अनुराग जैसे सरल-स्वभाव के व्यक्ति पर असर हुआ। जब मैंने ‘अल्ला को प्यारी है क़ुर्बानी’ वाली टिप्पणी की तो अनुराग विचलित हो उठे।
मैं पहले भी कह चुका हूँ कि वह एक भद्दी टिप्पणी थी, जो मुझे नहीं करनी चाहिए थी, लेकिन उसका परिप्रेक्ष्य करोड़ों जानवरों के क़त्ल वाला वह बदनुमा त्योहार था। किसी सामान्य दिन में मैं वैसी टिप्पणी नहीं कर सकता था। लेकिन उस त्योहार के बाद- स्वाभाविक ही- मेरे मन से यह भाव उठा कि जब करोड़ों जानवरों की क़ुर्बानी उनकी मर्ज़ी के खिलाफ़ इंसानों के द्वारा दी जा सकती है तो प्रकृति की उच्चतर शक्तियाँ (जैसे क्लाइमेट) इंसानों की क़ुर्बानी क्यों नहीं दे सकतीं? कौन जानता है कि ख़ुदा को किसकी क़ुर्बानी ज़्यादा पसंद है- आदमी की या जानवर की? ये कौन तै करेगा कि किसकी जान ज़्यादा क़ीमती है?
अनुराग को कुंठितों के गिरोह द्वारा टोका गया कि “देखो, तुम्हारा लेखक क्या लिख रहा है।” घबराकर उन्होंने मेरे खिलाफ़ एक पोस्ट लिख मारी। इससे पहले आपको कब याद आता है कि अनुराग वत्स ने किसी व्यक्ति पर नाम लेकर पोस्ट लिखी हो, जबकि एक से बढ़कर एक घोटाले साहित्य की दुनिया में हो चुके हैं? अनुराग तो राजनैतिक-साम्प्रदायिक मसलों पर भी स्टैंड नहीं लेते, लेकिन मेरे मामले में उन्हें सार्वजनिक रूप से नामजद संवाद करने की आवश्यकता महसूस हुई। उन्हें बरगलाने वाले अपने मिशन में क़ामयाब हुए। वो कुटिल मुस्कान मुस्कराए होंगे कि “देखो, हमने रुख़ से सुशोभित का पत्ता कटवा दिया!”
इसके बाद अब मेरा रुख़ और अनुराग से किसी तरह का सम्बंध रखना बहुत कठिन हो जायेगा। मैंने अनुराग के सामने निजी संदेशों में प्रस्ताव रखा है कि मेरी जो नई किताब तुम ला रहे हो, उसकी घोषणा अपनी प्रोफ़ाइल और रुख़ के हैंडल्स से मत करना, ताकि तुम्हें ‘शर्मिंदगी’ ना उठानी पड़े कि तुमने ‘मेरे जैसे व्यक्ति’ को छापा। उसका प्रचार मैं अपने तईं ही कर लूँगा। लेकिन मेरा सवाल अनुराग सहित आप सबों से है कि- जिस व्यक्ति ने 20 किताबें लिखी हैं- और मजाल है जो उन 20 किताबों में एक भी वाक्य अभद्र, अशिष्ट और असंसदीय हो- उसे उसकी एक टिप्पणी के आधार पर जज करके खारिज़ करने वाले हिन्दी के ये होनहार क्या इतना ही कठोर रवैया दूसरों के आचरण के प्रति भी रखेंगे? या यह कृपा केवल और केवल मुझ पर ही की जायेगी, क्योंकि मैं इस्लाम की आलोचना करता हूँ?
यशवंत सिंह-
मैं सुशोभित के साथ हूँ! जो व्यक्ति समय से आगे की बात करता है, उसे उसका वर्तमान समय बहुत परेशान करता है। करुणा और अहिंसा का दायरा बढ़ाने का दौर आ चुका है। जीवों के प्रति विश्वासघात (ख़ुद ही पालना और ख़ुद ही काट देना) ख़त्म किया जाना चाहिए। बलि को उत्सव की तरह आयोजित किए जाने पर रोक लगाना चाहिए। ये बलि उत्सव कई धर्मों में है। कुछ में बहुत ज़्यादा तो कुछ में कम।
सुशोभित को बधाई, उन्हें मशहूर करने में बहुत लोग जुट गये हैं, यहाँ तक कि ख़ुद इनका डरपोक प्रकाशक भी।
सुशोभित जी को ख़ुद ही प्रकाशन के बिज़नेस में उतरना चाहिए। शायद नियति इन्हें इसी तरफ़ ले जाना चाहती है। हम लोग पूरी मदद करेंगे इस काम की शुरुआत कराने में।
रुख़ पब्लिकेशन वाले अनुराग वत्स ने क्या लिखा, पढ़िए-
अनुराग वत्स-
बीच बहस में : हमारे मित्र और लेखक Chandan Pandey ने एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा उठाया। उन्होंने हिन्दी की संस्थाओं—और यहाँ उनकी मुराद प्रकाशन समूह है—से आग्रह किया, ‘सामाजिक ताना-बाना बड़ी चीज़ है। उसके अहित की बात करनेवाले अपने लेखकों से संवाद करें।’
चंदन की यह बात मुझे इसलिए भी अच्छी लगी क्योंकि उन्होंने संवाद शब्द पर ज़ोर दिया। अमूमन प्रकाशन संस्थान विवादास्पद मामलों में ख़ुद को तटस्थ रखते हैं। आम लोगों को इसीलिए वे महज़ व्यापारी नज़र आते हैं। एक विषय पर पुस्तक प्रकाशित करना और उसकी आक्रामक वकालत करने तक तो बात ठीक है। लेकिन ऐसा करते हुए अपना मत थोपना, समुदाय-विशेष को लांछित करना, सामाजिक वैमनस्य फैलाने वाली टिप्पणियाँ करना—एक लेखक के लिए अशोभनीय है। जैसा कि Sushobhit ने किया, वह एक लेखक का आचरण नहीं है और पढ़ने-लिखनेवाला समाज यदि उन्हें इसके लिए प्रश्नांकित कर रहा है, तो उन्हें प्रकाशित करनेवाले समूह चुप बैठे होंगे, यह धारणा भी सही नहीं है।
चूँकि अपने लेखकों से संवाद करता हूँ, चन्दन पाण्डेय के लिखने से कहीं पहले सुशोभित से बतौर पब्लिशर इस मामले में अपनी गहरी आपत्ति दर्ज करा चुका था। मैंने उन्हें साफ़ लिखा कि अगर गाँधी के विचारों का गहन अध्ययन और उन पर लेखन भी आपको ५५० इंसानों के दुःखद देहांत पर ‘अल्ला को प्यारी है क़ुर्बानी’ जैसी क्रूर और अमानुषिक टिप्पणी करने के लिए उकसाता है, तो आपको अपने अध्ययन आदि का फिर से अवलोकन करना चाहिए।
मुझे पूरा यक़ीन है कि सुशोभित की पुस्तकें प्रकाशित करनेवाली अन्य संस्थाओं की तरफ़ से भी इस आशय का संवाद हुआ होगा। जो बात मैं सुशोभित को नहीं लिख सका—और हर जगह की बहस में जिस नुक़्ते का ज़िक्र नहीं है—वह यह कि उन्होंने उचित ही हिन्दू, बौद्ध धर्म सहित अन्य पंथों की भी आलोचना की है मांसाहार के लिए, लेकिन वह यह भूल रहे हैं कि इससे आगे बढ़कर जितनी वीभत्स तुलना वह इस्लाम की करते रहे हैं वायरस से, उसे एकमात्र ख़तरा इस प्लैनेट का बताते रहे हैं—ऐसा सिर्फ़ एक इस्लामोफ़ोब कर सकता है। जहाँ तक मुझे याद पड़ता है, उन्होंने बक़रीद को ‘पिशाच-पर्व’ कहकर भी पुकारा था।
अपने को सही ठहराते-ठहराते सुशोभित को आज नहीं तो कल बहुत थकान होगी। उन्हें वैमनस्य और बौद्धिक-विमर्श का फ़र्क़ अपने लिए स्पष्ट करना होगा। जिस समाज में सुशोभित अब तक अपनी बीस पुस्तकें भेज चुके हैं, वह दरअसल एक सहिष्णु समाज है। वह अपने से अलग का अभिनंदन करता हुआ समाज है। वह आहार-व्यवहार में भिन्न होने के बावजूद मेलज़ोल से रहने और आगे बढ़नेवाला समाज है।
एक ऐसे समय में जब सत्ता-प्रतिष्ठान इस मुल्क के सामाजिक ताने-बाने को तोड़ने के लिए उद्यत हैं, बेशर्म भाषा बोलते हुए जन-प्रतिनिधि यह ऐलान कर रहे हैं कि तुम मुसलमान हो, तो तुमने अवश्य ही मुझे वोट नहीं दिया होगा, इसलिए तुम्हारा काम नहीं करूँगा—एक लेखक को ऐसा कुछ नहीं कहना चाहिए, जैसा सुशोभित इन दिनों फिर से कहते पाए जा रहे हैं। यह उस पुस्तक का दुर्भाग्य है, जिसे इतनी शिद्दत से लिखने का वह दावा करते और अब रुष्ट होते हैं कि कोई उसकी अंतर्वस्तु पर बात नहीं करता! माहौल इतना कसैला, रुक्ष, विरोध करनेवाले का जुलूस निकाल देनेवाला और गालीबाज़ बना दिया गया है कि संवाद की गुंजाइश कम हो गई है। कैंसिल-कल्चर हावी हो गया है।
सुशोभित-
हिन्दी के एक लेखक ने प्रकाशकों की नैतिकता को पुकारते हुए उनसे पूछा है कि वो सुशोभित जैसे ‘साम्प्रदायिक’ व्यक्ति को क्यों छापते हैं और अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें हिदायत दी है कि आइंदा से वो सुशोभित को प्रकाशित न करें, क्योंकि उसका लेखन- उन्हीं के शब्दों में- “स्वर्णपात्र में विष्ठा है!”
वो अंग्रेज़ी में क्या कहते हैं : ‘कैंसल-कल्चर’।
और फ़ारसी में : ‘फ़तवा’।
मानो ‘मैं वीगन क्यों हूँ’ में जीवदया और शाकाहार की बातें नहीं, ‘शैतानी आयतें’ हों।
मानो ‘कल्पतरु’ में आतंकवाद, ‘बावरा बटोही’ में उग्रवाद, ‘देखने की तृष्णा’ में फ़ासिज़्म और ‘दूसरी क़लम’ में जनसंहार की अपीलें हों।
अब एक लोकतांत्रिक-देश में किसी व्यक्ति के रचनात्मक-लेखन पर भी पाबंदियाँ लगाई जाएँगी, केवल इसलिए, क्योंकि वो उनकी नज़र में ‘साम्प्रदायिक’ है और ‘साम्प्रदायिक’ की परिभाषा उनकी दृष्टि में केवल और केवल एक मज़हब की आलोचना है?
अयातोल्ला ख़ोमैनी की यहाँ पर किस-किस को याद आ रही है, मित्रो?
नैतिकता के इन ठेकेदारों का बस चलता तो जुआरी और शराबी फ़्योदोर दोस्तोयेव्स्की की एक किताब न छपने देते, रिम्बो पर गोली दाग़ने वाले वर्लेन और तुर्गेनेव को द्वंद्व युद्ध के लिए ललकारने वाले तॉल्सतॉय की किताबें ज़ब्त करवा देते, ग़बन के आरोपी और जेल की हवा खा चुके ओ हेनरी की किताबों की प्रतियाँ सामूहिक रूप से जलवाते और नात्सी सैल्यूट देने वाले एज़रा पाउंड के तो साँसें लेने पर ही रोक लगवा देते!
जबकि इन पंक्तियों के लेखक ने न तो ग़बन किया, न जुआ खेला, न शराब पी, ना नात्सी सैल्यूट दिया, ना किसी पर गोली दाग़ी। उसने तो केवल जीवदया और शाकाहार और वीगनिज़्म की बात भर की है। और उसकी 20 किताबें रचनात्मक लेखन से भरी हैं, किसी भी किताब का कोई भी पन्ना खोलकर देख लीजिए।
जिस वीगन वाली किताब पर इतना हल्ला है, उसके 50 हज़ार शब्दों में से एक भी शब्द का अभी तक किसी ने कोई खंडन, आलोचना या विवेचना प्रस्तुत नहीं की है। क्या किताब पढ़कर उस पर बात करने की संस्कृति भी ख़त्म हो गई है?
‘कैंसल-कल्चर’ क्या इतनी हावी हो गई है कि वो लोग किसी व्यक्ति के लिखने-छपने के मौलिक अधिकार को ही बाधित कर देना चाहते हैं?
जब उन सज्जन के द्वारा यह आरोप लगाया गया कि मैंने केवल और केवल मुसलमानों की जीवहत्या और मांसाहार पर सवाल उठाए हैं और जब मैंने इसके प्रत्युत्तर में दूसरे धर्मों की जीवहत्या और मांसाहार के विरोध में लिखी टिप्पणियाँ सप्रमाण प्रस्तुत की तो उनका उत्तर तक नहीं दिया गया। आरोप लगाओ, प्रत्युत्तर मिलने पर उसको नज़रअंदाज़ कर दो, फिर नया आरोप लगा दो- यह लोकतांत्रिक-विमर्श की कौन-सी नई फ़ासिस्ट शैली है?
तिस पर मैं अत्यन्त विनम्रतापूर्वक यही ज्ञापित करना चाहूँगा कि अभी तक मेरी 20 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, आगे 20 और छपकर आएँगी…
अगर किसी में क्षमता हो तो रोककर दिखा दें!
जिस तरह से वामियों के इकोसिस्टम ने एकजुट होकर सुशोभित को घेरा, उसका नाम लेकर पोस्टें लिखीं, प्रवाद किया, उसने इन पंक्तियों के लेखक सहित कइयों को चकित किया होगा।
आखिर कौन हूं मैं और मुझे इतना महत्त्व क्यों दिया गया? किसी नियतिवंचित-नगण्य पर तो हिन्दी के ये चतुरसुजान इतनी कृपा नहीं करते, अपनी तवज्जो के फूल उस पर नहीं बरसाते! मुझसे किस प्रकार का खतरा या असुरक्षा उन्हें महसूस होती है, जो उन्होंने एकजुट होकर नामजद प्रहार किया? और यह पहली बार नहीं है। अतीत में भी ऐसा हो चुका है।
मेरी कोई राजनैतिक या अकादमिक संबद्धताएं तो हैं नहीं, न ही मैं किसी प्रभावी पद पर हूं। मेरी किताबें ज़रूर बहुत छपती और पढ़ी जाती हैं, तो क्या उस बात की ईर्ष्या है? क्योंकि मैं देख रहा था कि प्रकाशकों से मेरा बहिष्कार करने की मांग की जा रही थी। शायद उन्हें नहीं पता कि प्रकाशक उसके पक्ष में होते हैं, जिसके साथ पाठक हों!
बड़े मज़े की बात है कि उन्होंने मुझे वह साबित करने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया, जो कि मैं वस्तुतः हूं नहीं। कोई भी साधारण बुद्धि का व्यक्ति मेरी टाइमलाइन को खंगालकर या मेरी किताबों के पन्ने उलटकर यह मालूम कर सकता है कि मैं कई वर्षों से क्या सोचता और लिखता रहा हूं, कि मेरे राजनैतिक विचार विशेषकर इन लोकसभा चुनावों के दौरान क्या थे, कि हिंदुत्व और राष्ट्रवाद पर मेरा क्या मत है, कि महात्मा गांधी पर अपनी पुस्तक में मैंने पांच वर्ष पूर्व क्या लिखा था जिस पर तभी से कायम हूं, कि मैं अपने आपको एथीस्ट और कॉस्मोपॉलिटन क्यों कहता हूं, कि मेरे रचनात्मक लेखन में किस तरह की अर्थछटाएं प्रकट होती हैं आदि।
चोर-चोर चिल्लाने से आप भीड़ तो इकट्ठा कर सकते हो, लेकिन किसी को जबरन चोर नहीं साबित कर सकते। हां, अपने मन का चोर अवश्य उजागर कर सकते हो!
ऐसा कौन-सा डेस्पेरेशन था, जो हिन्दी के इतने सारे होनहार एक साथ टूट पड़े और वह भी उस किताब के लिए जिसे उन्होंने अभी पढ़ा तक नहीं है, न कभी पढ़ेंगे। जानवरों के हित में बात करना और शाकाहार की आवाज़ बुलन्द करना उन्हें इतना क्यों खटक गया कि चिन्दी-चोर की तरह एक रैंडम स्क्रीनशॉट पर समवेत होकर झूल उठे?
याद रहे, किसी व्यक्ति का मूल्यांकन अगर किया जायेगा तो फ्रैगमेंट्स में नहीं, टोटलिटी में किया जाएगा और मेरी टोटलिटी मेरी २० छपी हुई किताबें हैं, उनसे सिर फोड़े बिना आप मुझे जज नहीं कर पायेंगे! न ही आप यह कह पायेंगे कि हम आपको इतना महत्त्व नहीं देते कि आपकी पुस्तकें पढ़ें। महत्त्व तो दुर्भाग्य से आप मुझे पहले ही अतिशय दे चुके हैं, और स्वेच्छा से दे चुके हैं! बीते दो दिन में मेरे एक हज़ार फॉलोअर्स बढ़ गए और मेरी नई किताब की बिक्री में तेज़ी से इज़ाफ़ा हो गया। हानि अंत में किसकी हुई?


