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न्यूज़ चैनलों का ऑफर ठुकरा अजीत अंजुम कैसे बन गये सफल यूट्यूबर!

अजीत अंजुम-

मेरी छोटी सी कहानी …. आज मैं जो भी हूँ , वो सिर्फ़ आप दर्शकों की वजह से . आपके भरोसे की वजह से और यूट्यूब जैसे प्लेटफ़ार्म की वजह से . वरना हम जैसों का मर्सिया तो लिख दिया गया था .

चैनलों की नौकरी के लायक़ हम रहे नहीं थे .चैनल की नौकरी में तमाम पाबंदियाँ और बंदिशें परेशान करने लगी थी. ये करो और ये न करो जैसे हालात ने आख़िर एक दिन बाग़ी बना दिया.

नौकरी छोड़कर घर बैठ गया था . ख़ुद को बनाए रखने का कोई रास्ता तलाश रहा था . महीनों की जद्दोजहद के बाद भी कोई रास्ता नहीं दिख रहा था . कुछ सेविंग थी और घर -परिवार का सपोर्ट था इसलिए उतनी चिंता तो नहीं थी लेकिन कुछ करना तो था . पूरी ज़िंदगी पड़ी थी . भविष्य की चिंता भी सता रही थी . चैनलों में काम नहीं करना है , ये तय कर चुका था लेकिन करें तो करें क्या वाला सवाल हर सुबह बाये खड़ा हो जाता था . एक बड़े चैनल की तरफ़ एप्रोच किया गया लेकिन मैंने कहा कि अब मुझे चैनल में नहीं जाना है . उस चैनल के लिए बात कर रहे शख़्स बहुत हैरान भी हुए कि आप ख़ाली हैं फिर भी इतनी बड़े ऑफ़र को ठुकरा क्यों रहे हैं ? मैंने कहा -अब ख़ाली रह लूँगा कि उस तरफ़ नहीं लौटूँगा . कुछ और विकल्प आए लेकिन उसे भी ठुकराया क्योंकि मन लायक़ काम कर पाने की गुंजाइश नहीं दिखी .

तभी लॉकडाउन का ऐलान हुआ

24 मार्च 2020 को लॉकडाउन की घोषणा के अगले दिन किसी ने बताया कि NH 24 से बहुत से मज़दूर अपने परिवारों के साथ पैदल यूपी -बिहार की तरफ़ जा रहे हैं . मैं सुबह- सुबह ट्रैक शूट में ही मोबाइल लेकर हाईवे तक पहुँचा . दिल्ली -यूपी बॉर्डर से गुजरते मज़दूर परिवारों का वीडियो बनाने लगा . मेरे पास और कोई माध्यम नहीं था , तो ट्विटर पर छोटे -छोटे वीडियो डालने लगा . कुछ ही देर में बहुत से लोग फ़ोन करके पलायन कर रहे मज़दूरों के बारे में पूछने लगे . कुछ लोग मदद करने के लिए आगे आने लगे .

मुझे आज भी याद है कि अखिलेश यादव के साथ रहने वाले आशीष यादव ने मेरा वीडियो देखकर यूपी की तरफ़ पैदल जा रहे मज़दूरों के बारे में जानकारी ली और कहा कि हम लोग उनकी कुछ मदद करना चाहते हैं . फिर मैंने कुछ मज़दूरों का नंबर लेना शुरु किया . कुछ के नंबर अखिलेश यादव के यहाँ पहुँचे और ग़ाज़ियाबाद और आगे के रास्तों पर उनके कार्यकर्ताओं ने खाने -पीने का इंतज़ाम किया .

फिर मैं भी अपनी सोसाइटी के एक दोस्त के साथ कुछ खाने का सामान लेकर मज़दूरों में बाँटने लगा . उनकी चिंता और मुश्किलों की कहानियाँ वीडियो की शक्ल में ट्विटर पर पोस्ट करने लगा . तब ट्विटर पर सिर्फ़ 2.20 मिनट का ही वीडियो पोस्ट हो सकता था . मैं शूट बहुत ज़्यादा कर रहा था लेकिन मेरे पास माध्यम नहीं थे . मुझे आज भी याद है कि 26-27-28 मार्च 2020 की पूरी रात मैं NH 24 पर मज़दूरों के बीच भटकता रहा . उनके वीडियो बनाता रहा . मेरे घर में लोग सोते रहते थे और मैं चुपके से आधी रात को ये देखने के लिए निकल जाता था कि अभी भी मज़दूर वैसे ही जा रहे हैं क्या ?

सब कुछ अपने मोबाइल में क़ैद करता रहा . मेरे घर वाले एतराज़ भी करने लगे कि तुम्हें कोरोना हो जाएगा . बंद करो ऐसे निकलना . मैंने किसी की नहीं सुनी क्योंकि हज़ारों मज़दूरों को यूँ पैदल जाते देखकर मैं घर में बंद नहीं रह सकता था . बच्चे , बुजुर्ग , महिलाएँ सब सैकड़ों किमी की यात्रा पर निकल पड़े थे . मैं उनकी तकलीफ़ों की कहानियाँ अपने मोबाइल में दर्ज कर रहा था लेकिन मेरी सीमाएँ थी . मेरी बेचैनी मुझे सड़क पर उनके बीच रहने -चलने को मजबूर कर रही थी . तीन -चार दिन बाद चैनलों ने इस ख़बर की ओर रुख़ किया ( एनडीटीवी को छोड़कर )

कुछ मित्र पहले से कह रहे थे कि आप यूट्यूब शुरु कीजिए लेकिन मैं टाल रहा था . मज़दूरों की कथा कहने की बेचैनी में मैंने 29 मार्च 2020 को तय किया कि अब सही वक़्त आ गया है . वहीं से मेरे यूट्यूब चैनल की शुरुआत हुई . लॉक़डाउन लग चुका था . मेरे पास कोई टीम तो छोड़िए . एक सहयोगी तक नहीं था . मोबाइल से शूट करता था . ख़ुद ही मोबाइल पर एडिट करता था ( एक मित्र ने एडिट सिखाया ) . अपलोड करने और थंबनेल बनाने नहीं आता था , तो एक मित्र ने मदद की . वो अपने घर से ये दोनों काम कर देते थे . कुछ महीने बाद जब लॉकडाउन हटा तो एक सहयोगी को रखा , जिसने कैमरा और एडिट पर मदद करना शुरु दिया .

फिर किसान आंदोलन का दौर आया . मैंने एक साल तक लगातार किसान आंदोलन के हर पहलू को कवर किया . जहां जहां आंदोलन हो रहे थे , वहाँ गया . पंचायतों में गया . हरियाणा ,यूपी और राजस्थान के अलग अलग हिस्सों में गया . सड़क पर बैठे जिन किसानों को गालियाँ दी जा रही थी , गुंडे -मवाली और देशद्रोही के तमग़ों से नवाज़ा जा रहा था , उन किसानों की आवाज़ देश -दुनिया तक पहुँचाने के लिए मैंने ख़ुद को झोंक दिया .
किसानों ने मुझे इतना प्यार दिया कि मैं ताउम्र नहीं भूल सकता . उनके प्यार और स्नेह का क़र्ज़ मैं जीवन भर नहीं उतार पाऊँगा . उस एक साल में मैंने किसान आंदोलन पर न जाने कितने वीडियो बनाए .

हर रोज़ यही लगता था कि ये किसान कब तक यूँ बैठे रहेंगे . जाड़ा , गर्मी , बरसात ..हर मौसम की मार खाकर भी किसान डटे रहे . मैं उन्हें अपने कैमरे में क़ैद करता रहा …

इसके बाद की लंबी कहानी है …लिखूँगा जल्दी ही . फ़िलहाल तो उन तमाम दर्शकों और साथियों की शुक्रिया , जिनकी वजह से ये नाचीज़ आज यहाँ तक पहुँचा है .

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