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पत्रकारिता की दुनिया में मेरे दो हीरो!

मनीष दुबे-

पिछले दिनों विकिलीक्स के संस्थापक जूलियन असांजे को रिहा कर दिया गया. उनकी रिहाई का मैसेज देखते ही मैने खट से खबर लगाई. भड़ास पर. क्यों… मैं तो कभी मिला नहीं, ना ही शायद मिल सकता हूं. लेकिन उस शख्स से एक पेशेवर लगाव है. दुनिया की दाई-महतारी कर दी उस व्यक्ति ने. खासकर उसकी जो अपने को पापा लगाता था. इसके अलावा भी असांजे के कई कारनामें आते-दिखते रहे हैं जो मुझ सहित औरों को भी उनकी तरफ झुकाव को बनिस्बत बनाए हुए हैं.

खैर, मीडिया के भीतर दूसरा शख्स जिसका मैं मुरीद हूं… वो हैं भड़ास4मीडिया के संस्थापक-संपादक बाबा यशवंत सिंह. ये बाबा वाला टैग उनके अलावा आज तलक मुझसे कोई और नहीं ले पाया. एक वक्त मीडिया का लादेन उपनाम से चर्चित रहे बाबा को अगर भारतीय मीडिया का असांजे कहें तो इसमें कोई अतिशयोक्ति न होगी. सही मायनों में बाबा मैरे लिए रोल मॉडल..हीरो हैं.

वो भी एक समय था, जब दिल्ली में भटकाव के दिनों बाबा के बुलावे पर उनके अड्डे गया था. काम के सिलसिले में. लेकिन मुझे हिंदी टाइपिंग नहीं आती थी. अलबत्ता, उन्होंने हिंदी टाइपिंग सीखकर आने की कहकर वापस भेज दिया. साल था 2010 या 2011. तब से एक समय आज है. भड़ास में लिखते-सुधरते और लगातार सीखते हुए 6 महीने से ज्यादा का समय हो चुका है. काम…., काम तो मुझे आज भी ठीक से नहीं आता. बस जो करता या कर पा रहा हूं, उसमें मेरे बाबा यशवंत का ही योगदान है.

सुबह लॉगिन कर मैं मनीष दुबे नहीं बल्कि यशवंत बनकर बैठता हूं. उसका कारण ये है कि अगर कोई गलती हुई या गई तो उसका दोष मुझपर नहीं बल्कि बाबा के मत्थे जाएगा. इसलिए इस एक काम को मैं पूरी श्रद्धा से करता हूं. गीता में भी कृष्ण ने कहा है…”हे पार्थ तुम अपना कर्म करो..फल की इच्छा मत करो. फल देने के लिए मैं स्वयं बैठा हूं.”

100 टका मैं गीता की इस लाइन को फॉलो करता हूं.कर्म करता हूं. बिना फल की इच्छा रखे.

अब आप लोग को लग रहा होगा कि लेओ.. मनीष दुबे, भड़ास में काम करता है तो यशवंत बाबा की खुशामदीद कर रहा है… तो आप गलत हैं. जिसने बाबा को बकरी का बच्चा समझा वो हमेशा गच्चा खाया है. ना जानने वालों को बता दूं कि यशवंत मीडिया में जितने चर्चित और परफेक्ट इंसान हैं उतने ही अध्यात्म और ब्रह्मांड के जानकार भी हैं. लगातार कुछ न कुछ नया, अलबेला, अटपटा खोजा, ढूंढा और बीना करते हैं. आसान नहीं है यशवंत होना!

ये खुशामदीद नहीं बल्कि दिली लगाव है. हम भड़ासी लोग अगर किसी के लिए कुछ लिखते हैं तो उसमें 24 कैरेट गोल्ड जैसा प्यार होता है. वरना हमारी गाली भी भला करती है. बेटियों का जन्मदिन हो तो बाबा की तरफ से मुद्रा आती है, भड़ास में कोई विज्ञापन आए तो उसका शेयर मेरे पास भी आता है. बाबा को कोई लाभ हो कहीं से तो बाबा खुले दिल-मन से वह भी मुझे शेयर करते हैं. कभी मेरी लिखी लगाई हेडिंग अच्छी लगे तो तुरंत मोबाइल में तारीफी रुपया गिरता है. कभी कोई खबर ऊपर चढ़ जाए तो मोबाइल में पैसा आने की धुन बज उठती है. वेतन तो अपनी जगह है ही.

कुल मिलाकर, अपने कर्मचारी को कर्मचारी न मानने समझने वालों की फेहरिस्त में बाबा श्री श्री 1008 भड़ासानंद स्वामी का नाम सुनहरे अक्षरों में लिखा जाना चाहिए. वे कहते भी हैं, “हम लोग कॉमरेड लोग हैं उनके टाइप जीवनशैली फॉलो करते हैं. जो लाभ हो मिल बांटकर जज्ब करना चाहिए.”

भड़ास में नौकरी करने का सबसे पहला मूलमंत्र यही है कि आप अपनी मजदूरी वाली मानसिकता निकाल फेंकिए. मस्त काम कीजिए, हां लेकिन काम पर फोकस कीजिए..बस.

वैसे भी ये धरती कर्म प्रधान है. आपके कर्म ही आपको आगे बढ़ाते हैं. सोर्स सिफारिश की जमीन बड़ी कम होती है. इसलिए हे पार्थ… कर्म करते रहो. अन्त में मेरे दोनों हीरो को मेरा प्रणाम. उनकी हमेशा तूती बोलती रहनी चाहिए, जिंदाबाद.

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1 Comment

1 Comment

  1. संतोष देव गिरि

    June 30, 2024 at 1:58 pm

    जबरदस्त, बेबाक विचार मनीष भाई, वैसे यह आपके विचार नहीं हैं बल्कि अंतर्मन से निकलने हुए वह सच बोल है जिसे कम ही लोग बोल कह पाते हैं। वैसे काम के प्रति निष्ठा और समर्पण होना भी चाहिए। आप और यशवंत बॉस की जोड़ी भी खूब जम रही है। यशवंत सर का अपनों पर भरोसा करना, वक्त बेवक्त उनका सहयोग करना वेतनमान से इतर हट (जैसा की आप मनीष जी कहते हैं)यह आज के समय में विरले ही मीडिया संस्थान करते हैं।

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