
बद्री प्रसाद सिंह-
संत महिमा। धर्म परायण मां का पुत्र होने के कारण बचप से मुझे धार्मिक संस्कार मिले थे। प्राइमरी कक्षा से 10वीं कक्षा तक गर्मियों में मैं अपने ननिहाल कुद्दूपुर रहकर पूज्य नाना हनुमंत सिंह जी के सानिध्य में विद्यालय की पुस्तकों के साथ धार्मिक पुस्तकें भी पढ़ता था। मेरे नाना जी हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत, उर्दू, और फारसी के अच्छे ज्ञाता थे तथा भारत रत्न बाबू भगवान दास के, शिष्य रहे थे। उनके पुस्तकालय में धार्मिक पुस्तकों की भरमार थी। वहां मैंने गीता, रामचरितमानस, कुछ पुराण, योग वशिष्ठ, बाइबिल व कुरान का हिंदी अनुवाद पढ़ा था, यद्यपि उस समय उन्हें समझने की क्षमता मुझमें बहुत कम थी।
प्रयाग विश्वविद्यालय से दर्शन शास्त्र से MA करने तथा भारतीय संस्कृति का अध्ययन करके धर्म और दर्शन के ज्ञान में कुछ वृद्धि की। तीर्थराज प्रयाग तथा देश की सांस्कृतिक एवं धार्मिक राजधानी काशी में नियुक्ति के समय कुछ विद्वत जनों का स्नेह मिला। पुलिस अधीक्षक पौड़ी की नियुक्ति काल में अधिकतर लक्ष्मण झूला, ऋषीकेश एवं हरिद्वार के बहुत से संत महात्माओं के प्रवचनों को सुनने तथा उनसे वार्ता कर जिज्ञासा दूर करने का अवसर मिला, यद्यपि उन वार्ताओं में निराशा अधिक मिलती।
मैं 2010 में मुरादाबाद में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक था, एक दिन प्रातः घर के फोन ड्यूटी ने बताया कि शंकराचार्य जी आवास के फाटक पर खड़े हैं और सुरक्षा न मिलने से रुष्ट हैं। मैंने शंकराचार्य के विषय में पूछा तो वह नहीं बता सका, उनके सहायक ने फोन पर नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि शंकराचार्य जी हरिद्वार जा रहे हैं रास्ते के सभी जिलों में उन्हें सुरक्षा हेतु इस्कोर्ट गाड़ी मिली लेकिन यहां नहीं मिली जबकि डीजीपी कार्यालय ने वायरलेस से इसका आदेश दे दिया था। मैं तुरंत उनकी सुरक्षा हेतु इस्कोर्ट लगा दूं और आकर उनसे माफी मांगू।
मैं सोकर उठा ही था, मैंने दिखवाया तो पता चला ऐसा कोई फैक्स या वायरलेस नहीं आया है। मैं आश्वस्त होकर फोन पर उनके सहायक को आदेश न मिलने की बात बताकर पूछा कि वह कहां के शंकराचार्य हैं तो वह बोले कि काशी के हैं। मैंने कहा कि देश में कुल चार पीठ ही है जहां शंकराचार्य जी होते हैं उनमें काशी नहीं है। तब वह मुझे बरगलाना चाहा तो मैंने धमकाया कि फर्जी बात करने पर जेल भेज दूंगा तब वह गलती मानी। बात से पता चला सहायक जी मेरे गांव के पड़ोस के रहने वाले सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी थे। उनके आग्रह पर मैंने जनपद की सीमा तक इस्कोर्ट लगा दी। वह मुझे बुलाकर शंकराचार्य से आशीर्वाद लेने को कहा जिसे मैंने विनम्रता से मना कर दिया। देश में न जाने कितने स्वयंभू शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, विश्वगुरू आदि हिंदुओं को बरगला रहे हैं और शिष्यों को धन का मोह त्यागने का उपदेश देकर अपनी दौलत बढ़ा रहे हैं।
आशाराम, राम रहीम तो कुछ ऐसे संत हैं जिनको न्यायालय ने दंडित किया। देश में बहुत से ऐसे संत हैं जिन पर आरोप नहीं लगे या आरोप दबा दिए गये। अकूत संपदा के स्वामी होने के बाद भी ऐसे धर्माचार्य जनहित या हिन्दू हित में शिक्षा, अस्पताल, अनाथालय, लंगर आदि चलाने में कोई रुचि नहीं लेते। यही नहीं, हिंदू धर्म में सदियों से व्याप्त कुरीतियों को दूर करने में भी रुचि नहीं लेते। सावन के कांवड़ मेले में ही रास्ते में सैकड़ो लंगर चला देते तो कांवड़ियों की भोजन समस्या समाप्त हो जाती और हिन्दू मुस्लिम होटलों का विवाद न होता। हिंदू धर्म में वर्ण तथा जाति व्यवस्था नासूर बनी हुई है जिसके कारण बहुत से पिछड़े व दलित समाज के लोग इसाई, मुस्लिम, बौद्ध धर्म में दीक्षित हो रहे हैं, यदि घूम-घूम कर ये संत इस व्यवस्था की आलोचना कर सभी हिंदुओं को बराबरी का संदेश देते, तो इस कुप्रथा का अंत हो गया होता। कुंभ मेलों मे संतों का स्नान जुलूस “शोभा यात्रा “निकालने में आगे पीछे चलने में ही विवाद होता रहता है, जबकि संतों को काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, राग द्वेष आदि दुर्गुणों से मुक्त होना चाहिए।
देश में बहुत से विद्वान, अनासक्त संत हैं, उन्हें आकर हिंदू समाज में व्याप्त कुरीतियों को समाप्त करने हेतु ठोस प्रयास करना चाहिए। हिंदू धर्म में प्रतिदिन नये पंथ, संप्रदाय बनते रहे हैं, उनके आचार्यों में शास्त्रार्थ होते रहते थे और पराजित संत जीते हुए का पंथ स्वेच्छा से स्वीकार कर लेता था। आदि शंकराचार्य का मीमांसक मंडन मिश्र से हुए शास्त्रार्थ में मंडन पराजित होकर शंकराचार्य के शिष्य बन गये थे। धर्मांधता हिंदुओं का गुण कभी नहीं रहा। सैकड़ों वर्षों देश पर मुस्लिम और ईसाई के द्वारा राज करने के बाद भी हिन्दू धर्म न केवल बचा है अपितु पल्लवित-पुष्पित हो रहा है। हमारे संत विश्व में हो रहे नव जागरण, सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक उन्नति को दृष्टि में रखकर हिंदुओं को जागृत करें जिससे देश और समाज प्रगति कर सके।
लेखक उत्तर प्रदेश पुलिस के सेवानिवृत्त IG रहे हैं।


