संजय कुमार सिंह-
अमर उजाला और टीओआई ने बांग्लादेश के हिन्दुओं की स्थिति पर चिन्ता जताई। इसके लिए खेल में राजनीति की शिकार विनेश फोगाट की सफलता को तो छोड़ ही दिया, जीवन और मेडिकल बीमा पर 18 प्रतिशत जीएसटी के विरोध की खबर को भी जगह नहीं मिली। आज के अखबारों में बांग्लादेश की राजनीति में हिंसा के नतीजे से संबंधित खबरें हैं तो भारत की राजनीति में खेल या भारत के खेल में राजनीति की खबर प्रमुखता से है। अमूमन मैं पत्रकारिता में राजनीति पर लिखता हूं लेकिन आज खबर खेल में राजनीति और इस कारण राजनीति के साथ खेल हो जाने की है। आप जानते हैं कि ओलंपिक चल रहा है और कल खबर आई कि महिला पहलवान विनेश फोगाट 50 किलो वर्ग की महिला कुश्ती के फाइनल में पहुंच गई हैं। यानी उन्हें रजत पदक मिलना तय है। फाइनल में जीत गईं तो स्वर्ण भी मिल सकता है। वैसे तो यह बहुत बड़ी बात नहीं है और स्वर्ण पदक किसी न किसी को मिलता ही है, मिलेगा भी। बड़ी बात यह है कि विनेश फोगाट को स्वर्ण पदक मिल सकता है। रजत तो मिल ही गया। विनेश फोगाट के बारे में बताने की जरूरत नहीं है।
अगर आप नाम से नहीं पहचान रहे हैं तो बता दूं कि विनेश और अन्य महिला पहलवानों ने भारतीय कुश्ती महासंघ के उस समय के प्रमुख और सांसद ब्रजभूषण शरण सिंह पर यौन उत्पीड़न का आरोप गया था। न सिर्फ आरोप लगाया कार्रवाई की मांग और उसके समर्थन में धरना आदि भी दिये। पर सरकार ने अपने सांसद को बचा लिया (मामला चल रहा है)। पॉस्को का मामला होने पर भी उनकी गिरफ्तारी नहीं हुई और भाजपा ने भले उन्हें इस बार टिकट नहीं दिया, उनके बेटे को दिया। विनेश का जीतना इसलिए महत्वपूर्ण है और चर्चा में है। राहुल गांधी ने इस सबंध में एक्स पर लिखा है, “एक ही दिन में दुनिया की तीन धुरंधर पहलवानों को हराने के बाद आज विनेश के साथ-साथ पूरा देश भावुक है। जिन्होंने भी विनेश और उसके साथियों के संघर्ष को झुठलाया, उनकी नीयत और काबिलियत तक पर प्रश्नचिन्ह खड़े किए, उन सभी को जवाब मिल चुका है। आज भारत की बहादुर बेटी के सामने सत्ता का वो पूरा तंत्र धराशाई पड़ा था जिसने उसे खून के आंसू रुलाए थे। चैम्पियंस की यही पहचान है, वो अपना जवाब मैदान से देते हैं। बहुत शुभकामनाएं विनेश। पेरिस में आपकी सफलता की गूंज, दिल्ली तक साफ सुनाई दे रही है”।

आज के अखबारों में यह खबर लीड है। नवोदय टाइम्स का शीर्षक है, विनेश की चांदी पक्की। अखबार में इसके साथ राहुल गांधी का ट्वीट भी छपा है। इंडियन एक्सप्रेस की आज की लीड यही खबर है। शीर्षक तीन कॉलम में सिर्फ विनेश फोगाट है। ऊपर फ्लैग शीर्षक है, नाम का मतलब है हिम्मत : जंतर मंतर से पेरिस पोडियम तक। विनेश का फाइनल मुकाबला आज है। अमर उजाला में पहला आधा पन्ना विज्ञापन है और लीड बांग्लादेश है। दूसरे पहले पन्ने पर ओलंपिक में मंगल लीड है और उपशीर्षक है, विनेश फाइनल में पहुंचने वाली पहली पहलवान बेटी। अब इस बेटी का परिचय शीर्षक या खबर में तो दिया नहीं जा सकता है सो वह नहीं है और आज यही मेरा मुद्दा है। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ सरकार ने जिस बेटी की शिकायत नहीं सुनी, उससे राजनीति की उसने राजनीति को खेल से पीछे कर दिया है। बताने को अमर उजाला ने इसे ऐतिहासिक कहा है और लिखा है, फोगाट ने पहले विश्व चैम्पियन को हराया, फिर दो मुकाबले और जीते।
हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर है। शीर्षक है, बेजोड़ विनेश ने प्रशंसकों को चौंकाया, स्वर्ण (पदक) की दौड़ में। द हिन्दू में विनेश की फोटो है और कैप्शन में उसकी उपलब्धि बताई गई है। टाइम्स ऑफ इंडिया में आधा पन्ना विज्ञापन है और बाकी में विनेश की खबर नहीं है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने नोबल विजेता मोहम्मद युनूस को बांग्लादेश की अंतरिम सरकार का मुखिया चुने जाने की खबर को बैनर बनाया है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने अपनी सिंगल कॉलम की इस खबर में बताया है कि 84 साल के युनूस शेख हसीना के घनघोर आलोचक हैं और इस समय किसी चिकित्सीय प्रक्रिया के लिए पेरिस में हैं। शांति की बहाली के लिए उन्होंने निष्पक्ष चुनाव की मांग की है। बांग्लादेश की खबर भारत के लिए इतनी महत्वपूर्ण है कि द टेलीग्राफ का पूरा पहला पन्ना वहीं की खबरों से भरा हुआ है। इस चक्कर में पहले पन्ने की कई खबरें छूट गई हैं।
1. नवोदय टाइम्स
– राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने इस्तीफा दिया
– हॉकी में स्वर्ण का सपना टूटा, जर्मनी ने 3-2 से हराया
2. अमर उजाला
– बांग्लादेश की मुख्य खबर के अलावा तीन कॉलम की खबर का शीर्षक है, “मंदिरों, हिन्दुओं के घरों और संपत्तियों को निशाना बना रहे हैं आंदोलनकारी”। यह खबर इस तथ्य के बावजूद है कि अवामी लीग के नेता का होटल जला दिया गया है और उसमें 24 लोग जिन्दा जल गये(देश / धर्म की चर्चा नहीं है)। मरने वालों में एक इंडोनेशिया का नागरिक था यह बताया गया है। इस खबर को अमर उजाला ने ही लीड के भाग के रूप में छापा है।
कल बांग्लादेश नेशनल हिंदू महाजोत के महासचिव गोबिंद प्रमाणिक का एक वीडियो सोशल मीडिया पर था। उसमें वे बांग्ला में जो कह रहे हैं उसका मतलब यही है कि हिंसा हो रही है और वह सबके खिलाफ है और उसका आधार धर्म नहीं है। सोशल मीडिया पर कई तस्वीरें हैं जिनमें दिखाई दे रहा है कि लोग मंदिरों की सुरक्षा में खड़े हैं। मस्जिद से अपील का वीडियो तो कल ही था। कहने की जरूरत नहीं है कि यह हिन्दी में नहीं है तो हिन्दी के संपादक क्या करते?
3. द हिन्दू
– मनीष सिसोदिया को जमानत के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ईडी से पूछा है, ट्रायल कब पूरा होगा। खबर के अनुसार ट्रायल में देरी के बारे में पूछे जाने पर ईडी की ओर से कहा गया है कि अभियुक्त ने अदालत में एक के बाद एक दस्तावेज मांगे इसलिए देरी हुई और यह अभियुक्त यानी मनीष सिसोदिया के कारण है। ऐसे दलील की मंशा समझना मुश्किल नहीं है।
– कल एक खबर छपी थी कि सेना में बड़ी संख्या में पद खाली हैं और सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा की आड़ में उसका विवरण नहीं दे रही है। आज इस संबंध में द हिन्दू की खबर है जिसमें बताया गया है कि सरकार पहले संसद में पूछे गये सवाल के जवाब में नियमित रूप से यह जानकारी देती रही है।
– 10 साल में पीएमएलए के 5297 मामले और उनमें 40 में सजा, गृहमंत्रालय ने लोकसभा में यह जानकारी दी। इस आधार पर आज यह खबर होनी चाहिये थी कि ऐसी हालत में मुख्यमंत्री और दूसरे निर्वाचित नेताओं को जेल में रखने का क्या मतलब है लेकिन मीडिया को बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हमले की चिन्ता ज्यादा है।
4. टाइम्स ऑफ इंडिया
– बांग्लादेश की खबरों के साथ एक खबर का शीर्षक है, हिन्दू पार्षद की हत्या; 27 जिलों में मंदिर, दुकानें और घरों में तोड़फोड़
5. हिन्दुस्तान टाइम्स
– बजट में इंडेक्सेशन खत्म किये जाने के बाद इसे फिर वापस लाने की घोषणा। दबाव में सरकार ने निर्णय लिया कि व्यक्ति दोनों में से जो चाहे उस व्यवस्था को चुन सकता है।
6. इंडियन एक्सप्रेस
– जम्मू व कश्मीर की सड़कों पर : चुनाव की चर्चा आशंकाओं के साथ
– एक खबर प्रस्तावित ब्रॉडकास्ट बिल के मसौदे पर है। इसके अनुसार ऐसी शर्तें रखी गई हैं जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरा है।
यह भी एक गंभीर मुद्दा है लेकिन अखबारों में इसकी चर्चा नहीं के बराबर है जबकि मुझे लगता है कि सरकार अपने हर कदम, उपाय और काम से स्वतंत्र रूप से काम करके खर्च चलाने के उपायों पर पहरा लगा रही है। वैसे तो वह ऐसा अपने विरोधियों को नियंत्रित करने के लिए कर रही है लेकिन इसके नतीजे में रोजगार की समस्या है। नोटबंदी और जीएसटी से छोटे व्यवसायों को लगभग मार देने के बाद एनजीओ यानी गैर सरकारी संगठन सरकार के निशाने पर रहे और एफसीआरए के नियमों को सख्त करके एनजीओ के जरिये रोजगार को भी मुश्किल बना दिया गया है। इससे भी रोजगार की कमी है और यह इसलिए किया जा रहा है कि सरकार अपने विरोधियों को नियंत्रित कर सके।
इन नियमों से उन्हें काम में उलझा दिया जायेगा या फिर ऐसी गलतियां करने के आरोप लगाये जायेंगे जो उन्होंने किये भी नहीं हों। मकसद बहुत साफ है और इसका पता पीएमएलए के तहत कार्रवाई से तो चलता ही है हाल में इंफोसिस के खिलाफ 32000 करोड़ रुपये की कथित जीएसटी चोरी का मामला बना दिया गया था। नोटिस के अनुसार यह 2017 से चला आ रहा है। सवाल उठता है कि अगर कुछ गड़बड़ था तो तभी क्यों नहीं बताया गया और अब बताने का क्या मतलब है? जाहिर है, इसका मकसद डराना, धमकाना और परेशान करना भी हो सकता है। यह किसी सरकार के काम करने का तरीका नहीं होना चाहिये।
मेडिकल इंश्योरसें पर जीएसटी का विरोध
आज के अखबारों में जनहित की एक खबर पहले पन्ने पर नहीं दिखी। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने 28 जुलाई को एक पत्र लिखकर केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से जीवन और मेडिकल बीमा पर से जीएसटी हटाने की मांग की थी। सोमवार को सरकार ने संसद में बताया कि तीन साल में इस मद में 21256 करोड़ रुपये जीएसटी से आये हैं। अकेले 2023-24 के दौरान 8,263 रुपये सरकार के खाते में आए हैं। इस बीमा पर 18 प्रतिशत जीएसटी है और निश्चित रूप से बहुत ज्यादा है। यह बीमा मध्यम और उच्च मध्यम वर्ग के वो लोग लेते हैं जो जानते हैं कि जरूरत पड़ने पर सरकार व्यवस्था से काम नहीं चलेगा। गरीबों के पास विकल्प ही नहीं है। बहुत ज्यादा पैसे हों तो बिना परवाह किये रहा जा सकता है कि जब जरूरत पड़ेगी तो देखा जायेगा। इस तरह सरकार की नालायकी या सरकारी सुविधा नहीं होने से लोग बीमा कराते हैं और सरकार उस बीमा से भी कमाती है। जाहिर है यह शौकिया नहीं होता है और इस व्यवस्था में मजबूरी है। फिर भी इतना ज्यादा टैक्स लगाना निश्चित रूप से गलत है। केंद्रीय मंत्री के ही ध्यान दिलाने पर कार्रवाई नहीं हुई तो कल संसद में विपक्ष यानी इंडिया गठबंधन ने बड़ा प्रदर्शन किया। आज के मेरे किसी भी अखबार में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। अव्वल तो पहला पन्ना विज्ञापनों से भरा होता है और जो जगह बचती है उसमें बांग्लादेश के हिन्दुओं की चिन्ता की जायेगी भारत के मध्यम वर्ग के लिए जगह नहीं है। यह राजनीति और व्यवस्था है जिसे हमने चुना और बनाया है।


