
अंशुमान तिवारी-
बिछड़ा कुछ इस अदा से कि रुत ही बदल गई! विश्व के सबसे संभावनामय कार बाजार में ग्राहक ही लापता हो गए.
दास्तां यूं बदल गई !
- कार डीलरों के पास Rs. 73000 करोड़ की कारें शो रूम और गोदामों में पड़ी हैं. अर्थात तीन पीएम ग्राम सड़क योजनाओं से ज़्यादा की राशि फँसी है.
- कार डीलर 30 दिन का स्टॉक ( inventory) रखते हैं अब 70 दिन की इन्वेंटरी हो रही.
- डीलर बैंक कर्ज़ लेकर कंपनियों को कार का भुगतान करते हैं सो बैंक भी फँसे.
- डीलरों का संगठन FADA कह रहा कार कंपनियों ने अपना स्टाक, डीलरों के सर मढ़ दिया, बिक्री है नहीं. कार कंपनियाँ कह रहीं डीलर कुछ ज़्यादा ही शिकायत कर रहे.
- अप्रैल – जून के बीच बिक्री केवल 3% बढ़ी. जुलाई में 2.5% घट गई. सुज़ुकी, टाटा, हुंडई सबको झटका, डिस्काउंट देने के बावज़ूद.
- साल 2023-24 में आटोमोबाइल निर्यात भी करीब 5.5% घट गया. जून की तिमाही में निर्यात सुधरा है मगर इतना नहीं कि राहत मिले.
- भारत छोटी कारों का बाज़ार था, महंगाई बढ़ने और कमाई घटने से बाज़ार सिमट गया. जब बाइक खरीदना मुश्किल है तो कार की कौन सोचे. बीते बरस एक बडे कार निर्माता ने छोटी कारों के बाजार को श्रद्धांजलि दे दी थी
- बचीं मझोली-महँगी कारें, कोविड वाली माँग निबट ली तो फिर यहाँ भी सन्नाटा.
- महँगा कर्ज़, आटोमोबाइल पर टैक्स पर टैक्स और फिर ईंधन की ऊँची क़ीमतें ग्राहक कहां से आएं?
- उदारीकरण के बाद कार उद्योग ऐसे दिन पहली बार देख रहा है कि उत्पादन में कटौती की नौबत है
- देश में कारवाले कम हैं. 1000 लोगों पर 24 कारें, दुनिया में 1000 लोगों पर 314 के औसत से बहुत कम . मगर थोड़ी सी कारों के बिकने न बिकने से तय होता है उपभोक्ता बाज़ार में मौज है या मायूसी! क्यों कि..
- भारत की पूरी Manufacturing एक तरफ़ और Automobile एक तरफ़. कुल मैन्यूफ़ैक्चरिंग में ऑटोमोबाइल का हिस्सा 49%, GDP में 7.1% और 3.7 करोड़ रोजगार एसा सरकारी आर्थिक समीक्षा बताती है.
- स्टील से लेकर रबर तक असंख्य उद्योग और बीमा से बैंकिंग तक कई सेवायें कारों के पहियों पर चलती हैं
- अब आप इस विशाल उपमहाद्वीपीय अर्थव्यवस्था में पोखर सी मैन्यूफैक्चरिंग को बिसूरिये जो मुट्ठी भर कार ग्राहकों की मोहताज़ है या फिर महंगे कर्ज, भारी टैक्स और पेट्रोल डीजल की कीमतों को लानतें भेजिये मगर उपभोक्ता बाज़ार के उत्सव सूचक उद्योग की उदासी बड़ी संगीन हो चली है.
आह कार, वाह कार!
हैरां थे अपने अक्स पे घर के तमाम लोग
शीशा चटख गया तो हुआ एक काम और – दुष्यंत


