रंगनाथ सिंह-
पहले फिराक को देखा होता, अब तो बहुत कम बोले है-
आज फिराक गोरखपुरी का बर्थडे है। रघुपति सहाय ने अपने लिए फिराक (विरह) नाम क्यों चुना होगा? पता नहीं। कई साल पहले की बात है। एक बार इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी के साथ बैठकी में उर्दू कविता का जिक्र छिड़ गया। बात फैज और फिराक तक आ गयी। थानवी जी उन्हें फैज से कमतर न मानते थे। मैं हैरान था कि वह ऐसा कैसे कर सकते हैं! फिराक को फैज के बराबर या ऊपर कैसे देख सकते हैं! मूल बात ये थी कि मैंने तब फिराक को ढंग से पढ़ा नहीं था! फैज का समग्र कई बार पढ़ रखा था। फिराक नजर गश्ती में जितने नजर आए होंगे, उतने ही।

उर्दू साहित्य में मीर-गालिब-इकबाल या मीर-गालिब-फैज या मीर-गालिब-जोश या फिर कुछ लोग वली दक्कनी इत्यादि को मिलाकर उर्दू शायरी के त्रिदेव तय करने का प्रयास करते हैं। थानवी जी से चर्चा जारी ही थी कि उनके मित्र डीपीटी भी वहीं आ गये। डीपीटी ने भी थानवी जी की तरफदारी की। मैंने यहकर जान बचायी कि मैंने फिराक को ज्यादा पढ़ा नहीं है! मगर दिल के अन्दर मैंने नहीं माना कि फिराक फैज के बराबर के शायर होंगे! दो-चार अच्छे शेर तो दिल्ली-लखनऊ में कई दर्जन लोगों ने कहे हैं! आज भी कह रहे हैं मगर फैज के बराबर!
उस दिन का दिन और आज का दिन फिराक को हल्के में लेने का कुफ्र मुझपर उधार है। आज भी मैंने फिराक को ढंग से नहीं पढ़ा है मगर इतना पढ़ लिया है कि अक्ल आ जाए। भविष्य में पढ़ने के क्रम में भी फिराक का नाम बाद में है। आनन्दस्वरूप वर्मा ने मेरी रुचि देखकर अपना बहुमूल्य नासिर काजमी समग्र मुझे सौंप दिया है। उर्दू कविता पर अगली पढ़ायी शुरू होगी तो नासिर काजमी से होगी। फिराक का नम्बर उसके बाद ही आएगा मगर उनका जन्मदिन तो आज ही आ गया है और कुछ लिखना है।
फिराक के जन्मदिन पर मीडिया कवरेज देखने के लिए गूगल सर्च किया तो आशा अनुरूप निराशा मिली। मगर नीचे दिख रहा एक पुराना लेख मिला जिसका शीर्षक रोचक है। ये भोली हेडिंग जिसने भी दी है, आज का दिन बना दिया। कुछ हलकों में दबी जबान में कुछ लोग कहते हैं कि मीर-गालिब-फिराक मगर इतनी बड़ी हेडिंग वो भी इंग्लिश में! इंग्लिस के प्रोफेसर फिराक की कद्र किसी इंग्लिश पत्रकार ने समझी! पोएटिक जस्टिस! हिन्दी वालों का ऐसा लिखते हुए हाथ काँप जाएगा। उर्दू वालों के लिए तो यह कुफ्र हो जाएगा! कुफ्र करने में उर्दू वालों की अब रूह काँपती है। वैसे भी काफिरों की जबान हिन्दी है। फिर वे क्यों कुफ्र करें!
मैं फिराक पर कुछ रस्मी बात लिखकर निकल जाता अगर आज उनका मीर पर एक बयान न सुन लिया होता। पिछले कुछ समय से मैं मेरे जहन के भीतर कुछ किवाड़ों पर ताला लगा हुआ था। नासिर काजमी की किताब मैं ले तो आया था मगर उस ताले की चाभी नहीं मिल रही थी। सहन में बैठे-बैठे में अचेत सोचता रहता था मगर किवाड़ खुलने का जरिया नहीं बन रहा था।
फिराक शायर के साथ प्रोफेसर भी थे। यूजीसी वाले नहीं, असली वाले। फिराक उन खुशनसीब महापुरुषों में हैं जो वीडियो के आविष्कार के बाद पैदा हुए इसलिए हम उन्हें पढ़ने-समझने के साथ बोलते-बतियाते हुए भी देख-सुन सकते हैं। फिराक बोलते नाटकियता के साथ बोलते थे। वे हाथों से, आँखों से, चेहरे की बनावट, लहजे में उतार-चढ़ाव के साथ बोलते थे। उनके वीडियो देखिए तो लगता है कि कोई धान-गेहूँ उगाने वाला देहाती फूलों के बगीचे में आ धमका है। खुरपी चलाने आती नहीं इसलिए सम्भल-सम्भल कर फावड़ा चला रहा है। फिराक को उर्दू, फारसी, इंग्लिश, हिन्दी, अवधी, बनारसी साहित्य और जबान आती थी मगर दरबारी तहजीब की उनके व्यक्तित्व में कुछ कमी सी थी।
फिराक को सुनते हुए मैं ठिठक गया क्योंकि मीर के जिक्र में उन्होंने कहा कि मीर काफिर थे! उनकी शायरी कुफ्र की शायरी है! मीर मुझे और अपने से लगे। फिराक ने आगे कहा, जूठन काछन मुझे मीर के कुफ्र का मिला है। असली चीज तो वो खा गया कमबख्त। सूर में है। तुलसी तो और ऊपर हैं।”
मैं चौंक गया कि उर्दू शायरी की जिस डगर से मैं गुजरा उसपर फिराक का घर था भी कि नहीं! नासिर काजमी में भी मेरी रुचि देर से जगी। जॉन एलिया को मैंने पहली बार पढ़ा था तो लगा था कि कैसे-कैसे लोग शायरी करते हैं! उसके एक दशक बाद अगली पीढ़ी ने जॉन एलिया को सोशलमीडिया का सबसे पापुलर हिन्दी शायर बना दिया! हम तक फैज एक ईकोसिस्टम के जरिये पहुंचे थे। गालिब पापुलर बहुत थे। मीर तक हम खुद पहुँचे थे। हमारी बाद वाली पीढ़ी ने जॉन एलिया को खुद डिस्कवर किया था! जबकि एलिया हमारी पीढ़ी के शायर थे!
फैज-फराज-मजाज के बाद मैं गालिब से होकर मीर तक पहुंचा। मीर माने सबसे ऊपर। सबसे ऊपर पहुँचकर ठहर जाना स्वाभाविक है। मीर से लौटते हुए नासिर मिले जो मीर के मुरीद थे, एलिया मिले जो मीर के मुरीद थे, फिराक मिले जो मीर के मुरीद थे। भला है कि टीम गालिब से टीम मीर में शिफ्ट करने पर सोशलमीडिया ट्रॉलिंग नहीं होती है वरना…।
उम्मीद है कि कोई न कोई पीढ़ी फिराक को भी डिस्कवर करेगी! आज कविता कोश पर मौजूद फिराक की सारी गजलें पढ़ीं। फिराक के बेस्ट 5 शेर या बेस्ट 10 शेर टाइप खबरें बन सकें इसलिए कुछ चुनिंदा शेर नीचे शेयर कर रहा हूँ।
वेद,पुराण और शास्त्रों को मिली न उसकी थाह
मुझसे जो कुछ कह गई , इक बच्चे की निगाह.
किसी का कौन हुआ यूँ तो उम्र भर
ये हुस्नो इश्क तो धोखा है मगर फिर भी
उमीदे-मर्ग कब तक ज़िन्दगी का दर्दे-सर कब तक
ये माना सब्र करते हैं मोहब्बत में मगर कब तक
रक़ीबे-ग़मज़दा अब सब्र कर ले
कभी इससे मेरी भी दोस्ती थी
जब राहे-ज़िन्दगी काट चुके
हर मंज़िल की याद आने लगी
उस वक्त ‘फ़िराक’ हुई ये ग़ज़ल
जब तारों को नींद आने लगी
मुझे गुमराही का नहीं कोई ख़ौफ़
तेरे घर को हर रास्ता जाये है
हासिले-हुस्नो-इश्क़ बस है यही
आदमी आदमी को पहचाने
तुम्हीं ने बाएसे-ग़म बारहा किया दरयाफ़्त,
कहा तो रूठ गये यह भी कोई बात हुई
‘फ़िराक़’ को कभी इतना ख़मोश देखा था
ज़रूर ऐ निगहे-नाज़ कोई बात हुई
हम बदगु़माने-इश्क़ तेरी बज़्मे-नाज़ से
जाकर भी तेरे सामने आये हुए-से हैं
दिल के आईने में इस तरह उतरती है निगाह
जैसे पानी में लचक जाए किरन क्या कहना
कुछ इशारे थे जिन्हें दुनिया समझ बैठे थे हम
उस निगाह-ए-आशना को क्या समझ बैठे थे हम
बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं
तुझे ऐ जिन्दगी हम हम दूर से पहचान लाते हैं
‘फ़िराक़’ को कभी इतना ख़मोश देखा था
ज़रूर ऐ निगहे-नाज़ कोई बात हुई
ज़िन्दगी क्या है आज इसे ऐ दोस्त
सोच लें और उदास हो जाएं
रात आयी ‘फ़िराक़’ दोस्त नहीं
किससे कहिए कि आओ सो जाएं
तेरे ग़म को भी कुछ बहला रहा हूँ
जहाँ को भी समझा रहा हूँ
यक़ीं ये है हक़ीक़त खुल रही है
गुमाँ ये है कि धोखे खा रहा हूँ
असर भी ले रहा हूँ तेरी चुप का
तुझे कायल भी कराता जा रहा हूँ
तेरे पहलू में क्यों होता है महसूस
कि तुझसे दूर होता जा रहा हूँ
जो उलझी थी कभी आदम के हाथों
वो गुत्थी आज तक सुलझा रहा हूँ
मुहब्बत अब मुहब्बत हो चली है
तुझे कुछ भूलता-सा जा रहा हूँ
ये सन्नाटा है मेरे पाँव की चाप
“फ़िराक़” अपनी कुछ आहट पा रहा हूँ
हम उन्हे पा कर फ़िराक, कुछ और भी खोये गये
ये तकल्लुफ़ तो ना थे अहद-ए-वफ़ा से पहले
कभी दीवाने रो भी पड़ते थे
कभी तेरी भी याद आती थी
खोई खोई सी रहती थी वो आंख
दिल का हर भेद पा भी जाती थी
तेरे उन आंसूओं की याद आयी
ज़िन्दगी जिनमें मुस्कुराती थी
सामने तेरे जैसे कोई बात
याद आ आ के भूल जाती थी
वो तेरा गम हो या गमे-दुनिया
शमा सी दिल में झिलमिलाती थी
हमारा ये तजुर्बा है कि ख़ुश होना मोहब्बत में
कभी मुश्किल नहीं होता, कभी आसाँ नहीं होता
बज़ा है ज़ब्त भी लेकिन मोहब्बत में कभी रो ले
दबाने के लिये हर दर्द ऐ नादाँ ! नहीं होता
भूल बैठा है तू कह के जो बात
वो मेरी ज़िन्दगी हो गई है
गैर क्या जानिये क्यों मुझको बुरा कहते हैं
आप कहते हैं जो ऐसा तो बज़ा कहते हैं
लोग जो कुछ भी कहें तेरी सितमकोशी को
हम तो इन बातों अच्छा ना बुरा कहते हैं
ओम थानवी-
आज फ़िराक़ गोरखपुरी साहब की जयंती है। आधुनिक उर्दू आलोचना के दिग्गज मुहम्मद हसन अस्करी — ‘जदीदियत’ के मशहूर लेखक — आधुनिक उर्दू कविता में “सिर्फ़ और सिर्फ़” फ़िराक़ गोरखपुरी को कालजयी शायर मानते थे। कहते थे, बाक़ी जो है वह अल्लाह का नाम है!
तो महान शायर के चंद अशआर फिर से पेशे-ख़िदमत हैं। कहने की ज़रूरत नहीं कि अपनी कापी में वक़्त-वक़्त पर उतारे गए अशआर का यह छोटा-सा बेतरतीब संग्रह फ़िराक़ साहब के कलाम को अब तक जितना पढ़ा-समझा, उसका एक इन्द्रधनुषी चयन-भर है। …
ये क़ुर्बो-बोद भी हैं सरासर फ़रेबे-हुस्न
वो आके भी ‘फ़िराक़’ न-आए-हुए-से हैं
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उफ़ ये फ़ज़ा उदास-उदास आह ये मौजे-दूदे-शाम
याद-सी आ के रह गईं दिल को कई कहानियाँ
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वो चाहें तो वक़्त भी बदल जाय
जब आए हैं रात हो गई है
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ये माना ज़िन्दगी है चार दिन की
बहुत होते हैं यारो चार दिन भी
मुहब्बत में करें क्या हाल दिल का
ख़ुशी ही काम आती है न ग़म ही
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शिकवा-ए-जौर करे क्या कोई उस शोख़ से जो
साफ़ क़ायल भी नहीं, साफ़ मुकरता भी नहीं
एक मुद्दत से तेरी याद भी आयी न हमें
और हम भूल गये हों तुझे ऐसा भी नहीं
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उम्र ‘फ़िराक़’ ने यूँ ही बसर की
कुछ ग़मे-जानाँ कुछ ग़मे-दौराँ
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सुकूते-शाम मिटाओ बहुत अँधेरा है
सुख़न की शम्अ जलाओ बहुत अँधेरा है
ये रात वो है कि सूझे जहाँ न हाथ को हाथ
ख़यालो दूर न जाओ बहुत अंधेरा है
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वो भी न समझे बात हमारी हम भी न समझे उसकी बात
या तो ‘फ़िराक़’ हमीं दीवाने या दुनिया दीवानी है
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है अभी महताब बाक़ी और बाक़ी है शराब
और बाक़ी मेरे तेरे दरम्याँ सदहा हिसाब
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कटते-कटते रातें होतीं होते-होते सवेरा होता
रात-की-रात कभी मेरा घर तेरा रैन-बसेरा होता
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शबे-हिज्र थी यूँ तो मगर पिछली रात को
वो दर्द उठा ‘फ़िराक़’ कि मैं मुस्कुरा दिया
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शाम भी थी धुआँ धुआँ हुस्न भी था उदास उदास
दिल को कई कहानियाँ याद सी आ के रह गईं
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कोई आया, न आयेगा लेकिन
क्या करें गर न इन्तज़ार करें
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चुप हो गये तेरे रोने वाले
दुनिया का ख़याल आ गया है
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या इश्क़ नहीं करते या लोग हैं बे-परवा
क्यों इश्क़ में अब कोई बदनाम नहीं होता
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उसका सरापा हमसे पूछो
चेहरा ही चेहरा, पाँव से सर तक
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हम ग़मज़दों की गुफ़्तगू-ए-तल्ख़ पर न जा
‘क़िस्मत बुरी सही पर तबीयत बुरी नहीं’
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कौन ये ले रहा है अँगड़ाई
आसमानों को नींद आती है
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इश्क़ में सच ही का रोना है
झूठे नहीं तुम, झूठे नहीं हम
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तू याद आए तेरे जौरो-सितम लेकिन न याद आएं
मुहब्बत में ये मासूमी बड़ी मुश्किल से आती है
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ये जाहो-इज़्ज़त, ये नामो-शोहरत, है छाँव बस एक चलती-फिरती
बहुत न मग़रूर हो जाइएगा फ़िराक़ साहब, फ़िराक़ साहब
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जीती-जागती दुनिया में भी
चलते-फिरते मुर्दे देखे
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देख रफ़्तारे-इन्क़लाब ‘फ़िराक़’
कितनी आहिस्ता और कितनी तेज़
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लहरों में खिला कंवल नहाए जैसे
दोशीज़ा-ए-सुब्ह गुनगुनाए जैसे
ये रूप, ये लोच, ये तरन्नुम, ये निखार
बच्चा सोते में मुस्कुराए जैसे
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तू एक था मेरे अश्आर में हज़ार हुआ
इस इक चराग़ से कितने चराग़ जल उट्ठे
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शिकवा किया सितम का तो नमदीदा हो गए
तुम तो ज़रा-सी बात पे संजीदा हो गए
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गैर क्या जानिये क्यों मुझको बुरा कहते हैं
आप कहते हैं जो ऐसा तो बज़ा कहते हैं
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किसको रोता है उम्र भर कोई
आदमी जल्द भूल जाता है
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कुछ ऐसी भी गुज़री हैं तेरे हिज्र में रातें
दिल दर्द से ख़ाली हो मगर नींद न आये
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दर्दे-दिल क्या है खुला आज तेरे लड़ने पर
तुझसे इतनी थी मुहब्बत मुझे मालूम न था
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गुज़रे हैं इश्क़ नाम के ऐ दोस्त इक बुज़ुर्ग
हम लोग भी फ़कीर उसी सिलसिले के हैं
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तेरी वो नर्म दोशीजा-निगाही दिल नहीं भूला
पड़ी जब-जब नज़र तेरी निगाहे-अव्वलीं निकली
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आए थे हँसते-खेलते मयख़ाने में फ़िराक़
जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए
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तेरा पैमाना जब टूटा न आवाज़े-शिकस्त आई
वह टूटा इस तरह जैसे किसी का आसरा टूटे
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जागे हैं ‘फ़िराक़’ आज ग़मे-हिज्र में ता-सुब्ह
आहिस्ता चले आओ अभी आँख लगी है
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हवाए-जवानी के झोंके न पूछो
‘फ़िराक़’ इस हवा में न जागे न सोए
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शरीके-बज़्म हो कर यों उचट कर बैठना तेरा
खटकती है तेरी मौजूदगी में भी कमी तेरी
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फ़रेबे-अह्दे-मुहब्बत की सादगी की क़सम
वो झूठ बोल कि सच को भी प्यार आ जाए
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मुहब्बत में मेरी तनहाइयों के हैं कई उनवाँ
तेरा आना तेरा मिलना तेरा उठना तेरा जाना
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इश्क़ ज़-सर-ता-पा दिलसोज़ाँ दीद-ए-तर
बाहर-बाहर पानी आग अन्दर-अन्दर
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बहुत दिनों में मुहब्बत को यह हुआ मालूम
जो तेरे हिज्र में गुज़री वो रात रात हुई
‘फ़िराक़’ को कभी इतना ख़ामोश देखा था
ज़रूर ऐ निगहे-नाज़ कोई बात हुई
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वो लबों की लाल ज़िया-ज़िया, जो किरन हँसी की ज़रा-ज़रा
तेरी नीम-अदा भी अदा-अदा, तेरी इक झलक भी यमन-यमन
तुझे मंज़िलें भी हैं रहगुज़र, मुझे रहगुज़र भी मंज़िलें
यही फ़र्क़ है मेरे हमसफ़र, वो तेरा चलन ये मेरा चलन
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यादे-अय्याम की पुरवाइयो धीमे-धीमे
‘मीर’ की कोई ग़ज़ल गाओ कि कुछ रात कटे
आके महफ़िल में ‘फ़िराक़’ आज नहीं नग़्मा-सरा
जाके उसको भी बुला लाओ कि कुछ रात कटे
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बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं
तुझे ऐ ज़िन्दगी हम दूर से पहचान लेते हैं
तबीयत अपनी घबराती है जब सुनसान रातों में
हम ऐसे में तेरी यादों की चादर तान लेते हैं
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यूँ तो हर-इक का हुस्न काफ़िर है पर तेरी काफ़िरी नहीं मिलती
बासफ़ा दोस्ती को क्या रोएँ बासफ़ा दुश्मनी नहीं मिलती
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ज़रा विसाल के बाद आईना तो देख ऐ दोस्त
तेरे जमाल की दोशीज़गी निखर आयी
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हमसे क्या हो सका महब्बत में
ख़ैर, तुमने तो बेवफ़ाई की
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गरज कि काट दिये ज़िन्दगी के दिन ऐ दोस्त
वो तेरी याद में हों या तुझे भुलाने में
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शबे-फ़ुरकत बहुत घबरा रहा हूं
सितारों से उलझता जा रहा हूं
जो उलझी थी कभी आदम के हाथों
वो गुत्थी आज भी सुलझा रहा हूँ
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शामे-ग़म कुछ उस निगाहे-नाज़ की बातें करो
बेख़ुदी बढ़ती चली है राज़ की बातें करो
ये सुकूते-नाज़ ये दिल की रगों का टूटना
ख़ामुशी में कुछ शिकस्ते-साज़ की बातें करो।
जिसकी फ़ुरकत ने पलट दी इश्क़ की काया ‘फ़िराक़’
आज उस ईसा-नफ़स दमसाज़ की बातें करो
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जो दिलो-जिगर में उतर गई वो निगाहे-यार कहाँ है अब
कोई हद है ज़ख्मे-निहाँ की भी कि हयात वहमो-गुमाँ है अब
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तारे आँखें झपकावें हैं, ज़र्रा-ज़र्रा सोए हैं
तुम भी सुनो हो यारो! शब में सन्नाटे कुछ बोलें हैं
हम हों या क़िस्मत हो हमारी दोनों को इक ही काम मिला
क़िस्मत हमको रो लेवे है, हम क़िस्मत को रो लें हैं
जो मुझको बदनाम करें हैं, काश वे इतना सोच सकें
मेरा परदा खोलें हैं, या अपना परदा खोले हैं
सदक़े ‘फ़िराक़’, एजाज़े-सुख़न के कैसे उड़ा ली ये आवाज़
इन ग़ज़लों के परदों में तो ‘मीर’ की ग़ज़लें बोले हैं
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ग़ज़ल का साज़ उठाओ बड़ी उदास है रात
नवा-ए-‘मीर’ सुनाओ बड़ी उदास है रात
नवा-ए-दर्द में इक ज़िन्दगी तो होती है
नवा-ए-दर्द सुनाओ बड़ी उदास है रात
सुना है पहले भी ऐसे में बुझ गए हैं चराग़
दिलों की खैर मनाओ बड़ी उदास है रात
इसी खंडहर में कहीं कुछ दिये हैं टूटे हुए
इन्हीं से काम चलाओ बड़ी उदास है रात
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कर नज़र की इसी तरह तकमील
कभी औरों से मिल कभी मुझसे
सबसे रख रब्ते-ज़ाहिरी ऐ दोस्त
हाँ मगर रब्ते-बातिनी मुझसे
कह दिया आज दोस्त से सब कुछ
लेकिन इक बात रह गयी मुझसे
जैसे की ही नहीं इधर पहले
निगाहें-यार यूँ फिरी मुझसे
मैं ख़ुद अपना ही दोस्त कब हूँ ‘फ़िराक़’
क्या करे कोई दोस्ती मुझसे
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सोज़े-पिनहाँ हो,चश्मे-पुरनम हो
दिल में अच्छा-बुरा कोई ग़म हो
फिर से तरतीब दें ज़माने को
ऐ ग़में ज़िन्दगी मुनज़्ज़म हो
इन्किलाब आ ही जाएगा इक रोज़
और नज़्मे-हयात बरहम हो
दर्द ही दर्द की दवा ना बन जाये
ज़ख्म ही ज़ख्मे-दिल का मरहम हो
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मुझे छोड़ कर जाय है तेरी याद कि जीने का एक आसरा जाय है
मुझे गुमरही का नहीं कोई खौफ़ तेरे घर को हर रास्ता जाय है
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किसी का यूँ तो हुआ कौन उम्र भर फिर भी
ये हुस्नो-इश्क़ तो धोका है सब मगर फिर भी
हज़ार बार ज़माना इधर से गुज़रा है
नई-नई-सी है कुछ तेरी रहगुज़र फिर भी
लिपट गया तेरा दीवाना गरचे मंज़िल से
उड़ी-उड़ी-सी है कुछ ख़ाके-रहगुज़र फिर भी
तेरी निगाह से बचने में उम्र गुज़री है
उतर गया रगे-जाँ में ये नश्तर फिर भी
अगरचे बेख़ुदी-ए-इश्क़ को ज़माना हुआ
फ़िराक़ करती रही काम वो नज़र फिर भी
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दुनिया दुनिया गफ़लत तारी
आलम आलम बेख़बरी
हुस्न का जादू कौन जगाये एक ज़माना सोता था
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एक पैग़ामे-ज़िन्दगानी भी
आशिक़ी मर्गे-नागहानी भी
दिल को शोलों से करती है सेराब
ज़िन्दगी आग भी है पानी भी
दिले को आदाबे-बन्दगी भी न आय
कर गये लोग हुक्मरानी भी
सर से पा तक सिपुर्दगी की अदा
एक अन्दाज़े-तुर्कमानी भी
पास रहना किसी का रात की रात
मेहमानी भी मेज़बानी भी
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हिज़ाबों में भी तू नुमायूँ नुमायूँ
फरोज़ाँ फरोज़ाँ दरख्शाँ दरख्शाँ
लपट मुश्क-ए-गेसू की तातार तातार
दमक लाल-ए-लब की बदक्शाँ बदक्शाँ
सरासार है तस्वीर जमीतों की
मुहब्बत की दुनिया हरासाँ हरासाँ
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सज़ा-ए-हुस्न-परस्ती बजा, बजा भी नहीं
कि जुर्मे-इश्क़े-बुताँ हैं बुरा, बुरा भी नहीं
अरे ख़ुदा तो अमीरों का है ख़ुदा वाएज़
जिसे ग़रीबों का कहिए ख़ुदा, ख़ुदा ही नहीं
वो जैसे है ही नहीं इस अदा से सामने है
अगर कहूँ कि वो मुझसे खफ़ा, खफ़ा भी नहीं
अदा, अदा से अदा हो तो हम अदा समझें
नहीं अदा-दर-अदा जो अदा, अदा भी नहीं
अज़ब ये दौर है या रब कि ख़ुश-जमालों को
वफ़ा, वफ़ा भी नहीं है, जफ़ा, जफ़ा भी नहीं
भला है कौन, बुरा कौन, इस ज़माने में
बुरा, बुरा भी नहीं है, भला, भला भी नहीं
निगाहे-नाज़ से क्या सुन के दिल उदास हुआ
अगर कहें कि कुछ उसने कहा, कहा भी नहीं
ज़माँ-मकाँ का ये परदा हिजाबे-अकबर है
हज़ार बार ये परदा उठा, उठा भी नहीं
वो आँख कहती है ऐसे का क्या ठिकाना है
‘फ़िराक़’ आदमी तो है भला, भला भी नहीं
#
ऐ शबे-ग़म के जागने वालो तुमको तो ख़ुद है मालूम
जाते-जाते ग़म जाता है आते-आते नींद आती है
अलविदाअ ऐ जनम-साथियो अलफ़िराक़ ऐ हमदर्दो
इन अनसुनी पुकार देर से मुझको कहीं बुलाती है
अब तुमसे रुख़सत होता हूँ आओ सँभालो साज़े-ग़ज़ल
नये तराने छेड़ो मेरे नग्मों को नींद आती है
दुनिया-दुनिया आलम-आलम जिस के आज अफ़साने हैं
उस ‘फ़िराक़’ की राम-कहानी किसकी समझ में आती है
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आने वाली नस्लें तुम पर फ़ख़्र करेंगी हम-असरो
जब ये ध्यान आएगा उनको तुमने फ़िराक़ को देखा था
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पूछते हो कौन हूँ कोई बता दे तुमको काश
शायरे-आज़म फ़िराक़े-ख़ातिमुलमुतग़ज़्ज़लीन
[ख़ातिमुलमुतग़ज़्ज़लीन: महाकवि ‘फ़िराक़’ जो ग़ज़ल कहने वालों में अन्तिम हैं।]


