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अपनी पत्नी एक रात के लिए दे दो, बदले में एक मिलियन डॉलर ले लो!

विजय सिंह ठकुराय-

क्या हो कि आप भीषण दरिद्रता में जीवन बिता रहे हों और आपको कहीं से ऐसा ऑफर मिले, जिसमें जीवन भर के कष्ट दूर कर देने लायक धन का लालच हो – अपनी पत्नी की एक रात के बदले।

सुनने में यह बड़ा अभद्र लगता है और कई लोग इस सिचुएशन को हाइपोथेटिकल करार देकर तुरंत मना कर देंगे। पर क्या हो, अगर ऑफर वास्तविक हो?

1993 में रिलीज हुई Indecent Proposal नामक फ़िल्म में कहानी है एक युगल “डेविड और डियाना” की, जो कर्जों में डूबे हुए हैं। घर बिकने की कगार पर है। जो कुछ जेब मे बचा होता है, उसे डबल करने के चक्कर में एक कैसिनों में जा कर ठन-ठन गोपाल हो जाते हैं।

उसी कैसिनो में मौजूद एक अरबपति बूढ़े “जॉन गेज” की नजर डियाना पर पड़ती है, जो एक नजर में उसे भा जाती है। और उसी रात जॉन इस युगल से दोस्ती करके बातों-बातों में एक मिलियन डॉलर का ऑफर देता है – डियाना की एक रात के बदले में।

फ़िल्म इंसानी जटिल मनोविज्ञान का क्या बख़ूबी चित्रण करती है – कुछ देर पहले उस अरबपति बूढ़े को इस ऑफर के लिए लताड़ के आये युगल की आंखों से नींद गायब हो गयी है। एक-दूसरे के मनोभावों को जान रहे दोनों बिस्तर पर करवटें बदल रहे हैं और अंततः एक-दूसरे से पूछ ही लेते हैं कि – तुम भी वही सोच रहे हो, जो मैं?

इस ऑफर को कबूल करने के बाद इस युगल की जिंदगी में कुछ भी सामान्य नहीं रहता और वो रात उनके आगे के पूरे जीवन को खराब कर देती है। प्राइम पर मौजूद इस फ़िल्म को प्रेम और लालच के मिश्रण से उत्पन्न त्रासदी को समझने के लिए देखा जा सकता है।

और इस फ़िल्म की सबसे खास बात यह है कि फ़िल्म खत्म होते-होते प्रथमदृष्टया एक सनकी अरबपति बूढ़ा प्रतीत होते जॉन गेज के व्यक्तित्व से आप प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाते और आपको उसके किरदार की गहराई से प्रेम हो चुका होता है।

फ़िल्म के अंतिम दृश्य में डियाना को बिना अपराधबोध महसूस कराए डेविड के पास वापस भेजने के लिए जॉन गेज जानबूझकर एक नाटक करता है। जब डियाना उससे दूर जा रही होती है तो गेज का ड्राइवर उससे अचरज भरे स्वर में पूछता है कि – तुमने ऐसा क्यों किया?

तो गेज जवाब देता है – क्योंकि कुछ देर पहले वो डेविड को जिन निगाहों से देख रही थी, उन निगाहों से वो मुझे कभी नहीं देखती।

फ़िल्म का सेंट्रल प्लाट इतना भर है कि – क्या पैसे से प्यार खरीदा जा सकता है? और मुझे लगता है कि इसी दृश्य में फ़िल्म अपना निष्कर्ष बता जाती है।

शायद पैसे से लोग खरीदे जा सकते हैं। उनका वक़्त, उनका साथ हासिल किया जा सकता है। पर उन निगाहों को हासिल कभी नहीं किया जा सकता – जिन निगाहों से कोई अपने प्रेम को देखता है।

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