सुभाष सिंह सुमन-
ब्लूमबर्ग की एक खबर बता रही है कि पिछले 10 सालों में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार में जितना पैसा डाला था, लगभग सारा का सारा उन्होंने निकाल लिया है। मतलब 2016 के बाद से जितने पैसे के भारतीय शेयर विदेशी निवेशकों ने खरीदे, लगभग उतने पैसे के शेयर बेच भी डाले। 10 सालों का नेट इन्वेस्टमेंट ऑलमोस्ट जीरो। 1 जून को बाजार बंद होने के बाद के आँकड़े उठाये हैं ब्लूमबर्ग ने। इस आँकड़े के हिसाब से भारतीय बाजार में अब विदेशी निवेशकों का निवेश बचा है 7.3 लाख करोड़ रुपये। आखिरी बार विदेशी निवेश इस स्तर पर 2016 में था। अभी जैसे लक्षण दिख रहे हैं, निकट भविष्य में विदेशी निवेशकों के लौटने की कोई सूरत नहीं बन रही है। लौटना छोड़िये, वे लोग भारतीय शेयर बेचना ही बंद कर दें, इसकी भी सूरत नहीं बन पा रही है। मुझे हैरानी नहीं होगी यदि कुछ दिन बाद ब्लूमबर्ग या कोई अन्य संस्थान आँकड़ा निकाले, तो पता चले कि मई 2014 में जो स्तर पिछली सरकार सौंपकर गयी थी, एफपीआई की होल्डिंग उससे भी नीचे चली गयी है। ध्यान दें कि आँकड़े पर्सेंटेज में नहीं, एब्सॉल्यूट हैं।
एफपीआई वाली बात पर कई बातें कही जा सकती हैं। जैसे वित्त मंत्री यही कह दें कि मैं शेयर बाजार में पैसे नहीं लगाती, मुझे क्या! वडनेरकर सर से शब्द उधार लेकर कहूँ तो कमलची तर्क दे सकते हैं कि शेयर बाजार अर्थव्यवस्था का बैरोमीटर नहीं है। है या नहीं, हम इसपर बहस नहीं करेंगे। हम एफडीआई का डेटा उठाकर धर देंगे। एफडीआई मने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश। एफपीआई मने विदेशी पोर्टफोलियो निवेश। एफपीआई आता है शेयर बाजार में। एफडीआई आता है रियल इकोनॉमी में। आसानी से समझने के लिए एफपीआई को शेयर मानें तो एफडीआई हुआ रियल एस्टेट जैसा। एफपीआई के आने-जाने की गति चंचल होती है। हालाँकि अभी डेढ़-दो साल से सिर्फ जाने वाली गति हो रही है। एफडीआई की गति स्थिर होती है। यह लंबी अवधि का निवेश होता है और लंबी अवधि के लिए पैसा कोई तभी लगाता है, जब उसका भरोसा ठोस होता है। भरोसा हल्का होगा, इस तरह का निवेश कम हो जायेगा।
टाइम्स ऑफ इंडिया की 29 मई की खबर है। उसमें बताया गया है- वित्त वर्ष 2025-26 के पहले 9 महीनों में यानी अप्रैल 2025 से दिसंबर 2025 तक की अवधि में नेट एफडीआई रहा सिर्फ 3 अरब डॉलर। विदेशी निवेश आता है तो जाता भी है। जितना आया, उसमें गये को घटा देने पर जो बचता है, वो नेट/शुद्ध है। अब सिर्फ एक फाइनेंशियल ईयर की बात होती तो बहुत चिंता की बात नहीं होती। लेकिन यह तो नया ट्रेंड सेट होता लग रहा है। उससे पहले 2024-25 के पूरे 12 महीने में नेट एफडीआई रहा सिर्फ 1 बिलियन डॉलर। उससे पहले के 12 महीने यानी 2023-24 में नेट एफडीआई रहा सिर्फ 2 बिलियन डॉलर। 20 साल के आँकड़ों में इस तरह के खराब आँकड़े नहीं मिलते कहीं भी। अपवाद के तौर पर भी नहीं। 2006-07 में सबसे कम रहा था, तो नेट एफडीआई 8 अरब डॉलर का था। उसके बाद किसी भी साल 12 अरब डॉलर से कम का नेट विदेशी निवेश नहीं रहा। बस पिछले 3 साल से ही 1-2-3 अरब डॉलर का मामला बन रहा है।
इन आँकड़ों से अंदाजा लगा सकते हैं कि अर्थव्यवस्था में कुछ तो बहुत गंभीर दिक्कत/दिक्कतें हैं। ये तीनों आँकड़े हैं अलग-अलग, लेकिन आपस में गुथे हुए हैं। एफपीआई जा रहे हैं, क्योंकि उन्हें भारतीय बाजार पर अब भरोसा नहीं हो रहा है। भारत का जो शेयर बाजार दुनिया के सभी उभरते बाजारों में विदेशी निवेशकों के लिए आँखों का तारा था, वही अब आँखों में बाल जैसा हो गया है। रुपये की गिरावट पर कह सकते हैं कि यह तो 1990 के बाद से न्यू नॉर्मल हो चुका है, लेकिन किसी ने भी 6 महीने में रुपये को 9-10% गिरते आजतक नहीं देखा। डॉलर के सामने रुपये का कमजोर होना बड़ी बात नहीं, लेकिन 6 महीने में 10% कमजोर हो जाना बहुत बड़ी बात है। और एफडीआई। नेट एफडीआई 1-2-3 अरब डॉलर पर आ जाना अत्यंत असामान्य और चिंताजनक है। इसके लिए क्या बहाना बनाइयेगा? ट्रंप टैरिफ और ट्रेड वॉर जनवरी 2025 के बाद की बात है। एफडीआई उसके दो वित्त वर्ष पहले से जमीन सूंघ रहा है।
इनसे भी बुरी बात मालूम क्या है? हमारी सरकार डिनायल मोड में है। कोई एनालिस्ट, कोई इकोनॉमिस्ट, कोई इंस्टीट्यूशन, कोई जर्नलिस्ट इन्हें इनकी कमियाँ दिखा दे, ये उसे खारिज करने में लग जाते हैं। विदेशी एंटिटी है तो उसे सोरोस का एजेंट बता दो। भारतीय एंटिटी है तो उसे देशद्रोही का सर्टिफिकेट दे दो। सरकार पर भारी उसके अंध समर्थक हैं। पढ़े-लिखे दिखने वाले, लेकिन मस्तिष्क से शून्य ऐसे समर्थकों के लिए ही वडेनरकर सर ने शब्द दिया है कमलची। कलम से जिसका काम हो रहा, वो कलमची। कमल से जिसका चूल्हा जल रहा, वो कमलची।
पिछले सप्ताह मैंने बताया था कि कैसे हमने दुनिया के 5वें सबसे बड़े शेयर बाजार की पोजीशन से छलांग लगायी और 6ठे पर उतर गये। अब हमने एक सप्ताह के भीतर एक और छलांग लगा दी है। अब हम 7वें पायदान पर हैं। मुझे लग रहा था इसमें एक-डेढ़ महीने का समय लगेगा, लेकिन हमने एक सप्ताह में ही डंका बजाकर दुनिया को अपनी ताकत दिखा दी है। अब हमें कोई हल्के में लेने का साहस नहीं कर सकता है।
ब्लूमबर्ग बता रहा है- कल सोमवार (1 जून) को दक्षिण कोरिया का शेयर बाजार 5 ट्रिलियन डॉलर के पार हो गया। हमने तो पहले ही 5 ट्रिलियन डॉलर को पार कर लिया था, लेकिन मजा नहीं आ रहा था। इस कारण अब हम घटकर 4.8 ट्रिलियन डॉलर पर आ गये हैं। पिछले सप्ताह ताइवान का शेयर बाजार 5 ट्रिलियन डॉलर वाला बना था।
अमेरिका अब भी सबसे बड़ा बाजार है। उसके बाद चीन है। फिर जापान का नंबर है। उसके बाद हांगकांग है। एक सप्ताह पहले तक हांगकांग के बाद हमारा ही नंबर आता था। अब ताइवान का आ गया है। 31 मई तक ताइवान के बाद हम थे, लेकिन अब कोरिया है। हम अब कोरिया के बाद हैं।
यह तो सिर्फ दो उपलब्धि मितरों। देशद्रोही सब आपको इससे पहले की उपलब्धियाँ नहीं बतायेगा। लेकिन हम देशभक्त सब जानकर मानेंगे। अप्रैल में प्रति व्यक्ति अमीरी के मामले में हमने डंका बजाया था। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने बताया था- बांग्लादेश 2,910 डॉलर के साथ 148वां अमीर देश है। हम 2,810 डॉलर के साथ 150वें पायदान पर। अमृतकाल में बांग्लादेश पहली बार प्रति व्यक्ति अमीरी के मामले में भारत से आगे निकला।
अर्थव्यवस्था पर कुछ लोगों ने फेक न्यूज फैला दिया था। बता दिया था कि हम जापान से आगे निकल गये हैं और दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गये हैं। मोदीजी संत आदमी, कैसे बर्दाश्त करते इस फेक न्यूज को। तुरंत ऐसी दूरदर्शी आर्थिक नीतियाँ अपनाये मितरों कि जोरदार ही डंका बज गया। जिस ब्रिटेन से कुछ साल पहले हम आगे निकले थे, तुरंत ही हम उसके पीछे हो गये। अब हम चौथे नहीं, 4 से बड़े छठे पायदान पर हैं।
रुपये की गिरावट को गिनती में शामिल कर दें, तो डंका बजने की आवाज और तेज हो जायेगी। क्या अमेरिकी डॉलर और क्या चीनी युआन, पाकिस्तानी रुपये के सामने भी हमारा रुपया गिरा हुआ है। लोग इस पर हल्ला मचाने लगते हैं, बिना ये बात जाने कि अमृतकाल से पहले ही अमिताभ बच्चन ने गिरे हुए रुपये को नहीं उठाने का सिद्धांत प्रतिपादित कर दिया था।



