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सुख-दुख

पत्रकारिता की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं की सत्ता ताकतवर हो गई, बल्कि पत्रकार कमजोर पड़ गए हैं!

पंकज शुक्ला-

पत्रकारिता की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं है कि सत्ता ताक़तवर हो गई है। सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि पत्रकार कमज़ोर पड़ गए हैं।

40, 50 या उससे अधिक उम्र के पत्रकारों की एक ख़ास जमात ने देश की पत्रकारिता को जितना नुक़सान पहुंचाया है, उसकी भरपाई शायद पत्रकारिता संस्थानों से निकलने वाली अगली दो-तीन पीढ़ियां भी न कर सकें।

एक समय था जब पत्रकारों की बीट हुआ करती थी। कोई कांग्रेस कवर करता था, कोई समाजवादी राजनीति, कोई वामपंथी दलों को, तो कोई बीजेपी, शिवसेना, टीडीपी या जेडीयू को। पत्रकार और नेता के बीच एक पेशेवर दूरी होती थी। दोनों एक-दूसरे की ज़रूरत थे, लेकिन एक-दूसरे के प्रतिनिधि नहीं।

आज तस्वीर बदल चुकी है। अब बहुत से पत्रकार किसी दल या विचारधारा को कवर नहीं करते, बल्कि उसी के प्रवक्ता की तरह व्यवहार करते दिखते हैं। किसी का सपना मुख्यमंत्री का सलाहकार बनने का है, किसी को राज्यसभा या किसी आयोग में जगह पाने की उम्मीद। कोई किसी सांविधानिक पद से संतुष्ट है, तो कोई किसी पुरस्कार या जूरी का सदस्य बनने की प्रतीक्षा में है।

  • कभी-कभी सोचता हूं, क्या इन्हीं महत्वाकांक्षाओं के लिए पत्रकारिता में आए थे हम?
  • क्या सिस्टम से सवाल पूछने, आम आदमी की आवाज़ उठाने और सत्ता के सामने सच रखने का जो संकल्प था, वह रास्ते में कहीं छूट गया?
  • क्या सच का साथ देने का साहस उम्र के साथ मर जाता है?
  • क्या नौकरी बचाने के लिए एक पत्रकार अपनी आत्मा गिरवी रख सकता है?
  • क्या थोड़ा-सा झुकने की सलाह मिलते ही वह पूरी तरह समर्पण कर देता है?

मुझे भी कई बार संकेतों में समझाया गया। कुछ साल पहले तो साफ़-साफ़ कहा गया, फलां-फलां से संबंध रखिए, राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिलने में आसानी होगी। लेकिन, ऐसा पुरस्कार किस काम का, जिसे पाने के लिए किसी राजनीतिक दल, किसी संगठन या किसी प्रभावशाली व्यक्ति की कृपा की आवश्यकता पड़े?

मेरे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार हमेशा अपनी स्वतंत्रता रही है- सोचने की स्वतंत्रता, लिखने की स्वतंत्रता और सही बात को पूरी मज़बूती से कहने की स्वतंत्रता। जहां यह स्वतंत्रता न मिले, वहां काम करने का अर्थ भी क्या रह जाता है?

और, किसी विचारधारा का बंधक बनकर मिला सम्मान, सम्मान कम और समझौते का प्रमाणपत्र अधिक लगता है।

जून का महीना शुरू हुआ है। यही वह महीना है जिसने मुझे पिछले वर्ष अपने जीवन का शायद सबसे कठिन पेशेवर निर्णय लेने पर मजबूर किया।

पूरे करियर में मैंने अपनी टीम और युवा पत्रकारों को एक बात सिखाई, किसी भी इंटरव्यू के लिए जाओ, लेकिन अपनी गरिमा की कीमत पर इंतज़ार मत करो। आधे घंटे से ज़्यादा किसी को आपका समय लेने का अधिकार नहीं है।

फिर एक दिन वही कसौटी मेरे सामने आ खड़ी हुई। इंतज़ार कराने वाला कोई अभिनेता, मंत्री या उद्योगपति नहीं था। वह उस अख़बार का प्रबंधन था, जहां से मैंने अपनी पत्रकारिता शुरू की थी और जिसे मैंने अपने 35 वर्षों के करियर में से लगभग 20 वर्ष दिए थे।

उस दिन मेरे पास कोई प्लान-बी नहीं था। मुझे मालूम था कि जो निर्णय मैं लेने जा रहा हूं, उसके बाद कठिन समय आ सकता है। लेकिन मुझे उस प्रसंग ने हिम्मत दी जिसमें एक फ़िल्म की समीक्षा अख़बार से सिर्फ़ इसलिए हटा दी गई क्योंकि उसमें उस सितारे की प्रशंसा नहीं थी, जो हाल ही में अख़बार के एक बड़े समारोह में शामिल हुआ था। हालांकि, ये समीक्षा मैंने नहीं, मेरे एक सहकर्मी ने लिखी थी।

मैंने तय किया कि मैं वही करूंगा जो वर्षों से दूसरों को सिखाता आया हूं। अगर पत्रकारिता करनी है, तो पत्रकार की तरह करनी है, किसी दरबार के सदस्य की तरह नहीं।

मैंने वह रास्ता नहीं चुना, जिस पर मेरे आसपास के बहुत से लोग चल रहे थे और अब भी चल रहे हैं। क्योंकि, पत्रकारिता का चेहरा चमकाने के लिए स्याही चाहिए होती है, कालिख नहीं।

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