
सुदीप ठाकुर-
कभी कुछ अनायास कहा गया एक वाक्य अपने भीतर कितने गहरे अर्थ समेटे होता है, यह अशोक वाजपेयी से बेहतर भला कौन जानता होगा। अपने साहित्यिक उपक्रमों और आयोजनों के साथ ही अशोक वाजपेयी कभी कभी कुछ ऐसा भी कह जाते हैं, जो एक नई बहस छेड़ सकता है। नई बहस न सही, लेकिन उनका कहा किसी चल रही बहस को और घनीभूत कर सकता है।
गजानन माधव मुक्तिबोध की साठवीं पुण्यतिथि पर राजधानी के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में रज़ा फाउंडेशन के कई सत्रों के एक वृहत आयोजन में एक सत्र के प्रतिभागी पत्रकार-कथाकार-उपन्यासकार-कवि और इन दिनों अपनी टिप्पणिय़ों से जरूरी हस्तक्षेप करने वाले प्रियदर्शन का परिचय उपन्यासकार और समीक्षक के रूप में देते हुए वाजपेयी ने कहा प्रियदर्शन अपनी आजीविका के लिए पत्रकारिता भी करते हैं। कुछ शब्द इधर उधर हो सकते हैं, लेकिन वाजपेयी ने अपनी चिरपरिचित मुस्कान के साथ जो कहा उसका सार यही है कि प्रियदर्शन एक चैनल में काम करते हैं, और मैं तो टीवी चैनल देखता नहीं। इस बीच, दर्शकदीर्घा से आवाज़ें आईं एनडीटीवी!
अशोक वाजपेयी के प्रियदर्शन के इस संक्षिप्त परिचय के दो शब्दों पर गौर कीजिए कि वे आजीविका के लिए पत्रकारिता करते हैं। बेशक यह आयोजन और सत्र पत्रकारिता पर नहीं था। यह पूरी तरह से मुक्तिबोध के साहित्यिक योगदान पर था।
प्रियदर्शन को भी जिस विषय पर बोलना था उसका पत्रकारिता से कोई सीधा संबंध नहीं था। फिर भी, एक सवाल मन में उठता है, कि क्या पत्रकारिता सिर्फ आजीविका के लिए की जाती है? वाजपेयी ने यह सब जिस तरह कहा उसमें साहित्य के मुकाबले पत्रकारिता को कमतर समझे जाने का भाव था। चूंकि यह भाव था तो इसे एक पत्रकार होने के नाते मैंने इसे इसी तरह ग्रहण किया।
दरअसल इसी से सूत्र मिला कि क्या सचमुच पत्रकारिता सिर्फ़ रोजगार देने और रोज़गार हासिल करने तक सीमित है? और फिर आजीविका के लिए किए जाने वाले किसी भी काम को कमतर क्यों समझा जाए, पत्रकारिता को भी? क्या सिर्फ़ इसलिए कि पत्रकारिता में हाल के वर्षों में भारी गिरावट आई है, इसलिए इस पेशे को सिर्फ़ आजीविका तक सीमित कर दिया जाए? क्या पत्रकारिता के कोई सरोकार नहीं हैं या बचे नहीं हैं?
पहले आजीविका की बात। इस देश के करोड़ों लोग अपनी आजीविका के जरिये बहुत कुछ रच रहे हैं। कोरोना काल और लॉकडाउन के दौर ने पहली बार देखा कि जो लोग आजीविका के लिए अपने गांव-घर से महानगरों की ओर आए थे, उनका किस तरह का रचनात्मक योगदान था इन महानगरों के जीवन को बेहतर बनाने में। आजीविका का अपना एक रचनात्मक पक्ष है। खेतिहर मजदूर से लेकर कारखानों के मजदूर तक अपनी आजीविका के साथ कुछ न कुछ रच रहे हैं। किसान और मजदूर के पास तो यह लक्जरी भी नहीं है कि वह कह सके कि मैं तो यह सिर्फ आजीविका के लिए कर रहा हूं, मेरा रचनात्मक कर्म कुछ नहीं है, जबकि वह जो रच रहा है, वह रचनात्मक है। इसे सिर्फ़ रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के जरिये तक सीमित क्यों रखा जाए? ‘आजीविका’ को एक मानवीय शब्द के रूप में क्यों न देखा जाए? किसी कर्म को आजीविका तक सीमित करने का अर्थ उसमें से संवेदना को बाहर कर देना भी तो है।
अब पत्रकारिता की बात। निस्संदेह हजारों लोगों के लिए पत्रकारिता आजीविका है। लेकिन इसके साथ प्रतिबद्धता और सरोकार भी जुड़े हैं। पत्रकारिता में गिरावट पर बहस हो सकती है, पर यह तो नहीं कहा जा सकता कि पत्रकारिता में रचनात्मकता और सरोकार खत्म हो गए हैं। बेशक, आज वह दौर नहीं है, जब हिन्दी साहित्य और पत्रकारिता में गहरे संबंध थे। साहित्य ने अनेक अच्छे संपादक पत्रकार दिए हैं। लेकिन आज भी हजारों पत्रकारों के लिए पत्रकारिता सिर्फ आजीविका का मामला नहीं है। वह आज भी ‘बिटवीन द लाइन’ कुछ अपने जन सरोकारों और मानवीय मूल्यों के लिए गुंजाइश निकालने का प्रयास करते हैं, निकालते भी हैं।
इस आयोजन में एक सत्र में गजानन माधव मुक्तिबोध की जीवनी, मैं अधूरी दीर्घ कविता के लेखक जय प्रकाश ने भी अपना वक्तव्य पढ़ा है। खुद वाजपेयी ने इसे मुक्तिबोध की सबसे विश्वसनीय जीवनी कहा। 1958 में राजनांदगांव के दिग्विजय कॉलेज में प्राध्यापक के रूप में आने से पहले मुक्तिबोध नागपुर में थे। कई शहरों और कई तरह के उपक्रम करने के बाद मुक्तिबोध नागपुर आए थे। नागपुर के शुरुआती वर्ष बेहद मुश्किल में गुजरे थे। इसका चित्रण जय प्रकाश ने मैं अधूरी दीर्घ कविता के पहले खंड में किया है। इसी खंड के उपशीर्षक ‘पत्रकारिता की राह पर’ में वह लिखते हैं, “मुक्तिबोध के भीतर अभिव्यक्ति की विकट छटपटाहट थी। संभवतः साहित्य की भूमि उनकी अभिव्यक्ति के लिए पर्याप्त नहीं थी। पत्रकारिता की ज़मीन पर उतने ही आवेग के साथ सक्रिय होना उन्हें एक सम्पूर्णता के एहसास से भर देता था; अन्यथा उन्हें लगता, वह जैसे अतृप्त रह गए हैं। पत्रकारिता में रुचि और साहित्य-कर्म के साथ दूसरी कर्मभूमि के रूप में उसका चुनाव उनके लिए शगल नहीं था, बल्कि उनकी आंतरिक विवशता थी।….”
जाहिर है, पत्रकारिता मुक्तिबोध के लिए सिर्फ आजीविका नहीं थी। उन दिनों नागपुर से निकलने वाले नया ख़ून में मुक्तिबोध भले ही छद्म नाम से नियमित लेख और संपादकीय टिप्पणियां लिख रहे थे। नेमिचंद जैन को 6 फरवरी, 1952 को लिखे मुक्तिबोध के पत्र के हवाले से जय प्रकाश ने लिखा है, … सुयोगवश मुक्तिबोध खुद को पहले की अपेक्षा अधिक आत्मनिर्भर अनुभव करते थे, और उन्हें उम्मीद थी कि उनके अपने कुछ संपर्क विकसित हो रहे थे। उन्होंने लिखा कि, “लोगों के बीच अब मैं एक ‘चतुर राजनयिक’ और ‘निपुण पत्रकार’ के रूप में ज्यादा जाना जाता हूं। हां, मेरा असली पत्रकारिता करियर नागपुर में शुरू हुआ है। मुझे खुशी है कि हर हफ्ते कोई पांच हजार लोगों द्वारा मुझे उत्साह से पढ़ा जा रहा है।”
‘नया ख़ून’ से पहले मुक्तिबोध जबलपुर में ‘जयहिन्द’ में काम कर चुके थे। दरअसल पत्रकारिता मुक्तिबोध के लिए सिर्फ आजीविका का मामला नहीं था। यह संयोग ही है कि जिन शरद कोठारी के जरिये मुक्तिबोध के राजनांदगांव के दिग्विजय कॉलेज में आने का सुयोग बना वह मुक्तिबोध से नया खून के जरिये ही संपर्क में आए थे।
अच्छा तो यह होता कि मुक्तिबोध की पत्रकारिता पर भी इस आयोजन में बात होती। मुक्तिबोध की तर्ज पर आज यह पूछना सबसे मौजूं है, कि पार्टनर तुम्हारी पत्रकारिता क्या है?



