यशवंत सिंह-
एक साल पहले कैंसर योद्धा रवि प्रकाश का इंटरव्यू किया था। उन्होंने सब कुछ बोला। बहुत कुछ बताया। उनकी जिजीविषा देखकर मैं आश्वस्त था कि ये शख़्स मौत को मात देगा और कैंसर पीड़ितों का भगवान बनेगा। वे कैंसर पीड़ितों के भगवान तो बन गये लेकिन मौत को मात देने की ज़िद को बिसार दिये।

रवि प्रकाश हमारे दौर के सरोकारी पत्रकार और संपादक थे। कैंसर को लेकर जो उन्होंने बहुमुखी काम किया उसके लिये उन्हें अमेरिका में बुलाकर सम्मानित किया गया। पीढ़ियाँ याद रखेंगी इस शख़्स के योगदान को। रवि को देखिए सुनिए और सलाम कीजिए-
अरविंद मोहन-
रवि प्रकाश पर लिखने से बचना चाहता था। उसका दर्द, दिलेरी और चौथे स्टेज वाले कैंसर से लड़ाई पर काफी कुछ कहा गया है। जब उसने यही सब दिखाने बताने के लिए दिल्ली में एक नये किस्म की प्रदर्शनी लगाई तब भी जाने की हिम्मत नहीं हुई। कुछ अपनी तबियत भी कारण था।
मुझे ९७ या ९८ का रवि याद आता है। मैं हिन्दुस्तान में आ गया था और गांव गया हुआ था। मोतिहारी के हमारे संवाददाता शंभुनाथ झा जी रवि को लेकर मिलने आए। अच्छी बातचीत के बाद उन्होंने रवि के परिचय के साथ बताया कि ये छौडादानो या घोड़ासहन से हिन्दुस्तान के लिए खबर भेजते थे। अभी इनको हटा दिया गया है।
बाकी परिचय के बाद रवि ने बताया कि उसने दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से भौतिक विज्ञान में एम एसी किया है। तुरंत मैंने कहा कि भाई तुम्हारी पैरवी मैं छौडादानो के स्ट्रिंगर के लिए नहीं कर सकता। अगर दिल्ली आओ तो तुम्हारे लिए अपनी क्षमता भर मदद करुंगा।
पटना आने पर दफ्तर गया तो पता किया। बताया गया कि बार्डर इलाके के स्ट्रिंगर्स के लिए पैरवी तब तक न करिए जब तक ठीक से नहीं जानते हों। दूसरी ओर यह भी सही है कि स्ट्रिंगर्स को नियमित पर्याप्त भुगतान की जगह डेस्क के लोग उनसे विदेशी सामान मांगते हैं। खैर। रवि ने काम शुरू कर दिया और तराई में नेपाल चुनाव की अच्छी रिपोर्टिंग की।
एक दिन अचानक रवि दिल्ली के दफ्तर में पहुंचे। उन दिनों चन्द्रशेखर जी के लेखन का संकलन और युवा भारत के प्रकाशन का काम हो रहा था। अनिल अत्री भी जुड़े थे और हरिवंश जी तथा रायबहादुर राय जी संपादन में लगे थे।
इस प्रोजेक्ट के पूरा होने पर साथी अतुल कुमार के सहारे रवि अमर उजाला बरेली में रहे। संभवतः यही उन्होंने जागरण/अमर उजाला आवाजाही भी की।
उसी समय संपादक मृणाल पांडे ने अचानक एक दिन बिहार जा सकने वाले कुछ नये पत्रकार बुलाने को कहा क्योंकि बोर्ड की बैठक के सिलसिले में पटना और रांची के संपादक और प्रबंधक भी दिल्ली में थे और नियुक्ति टालने का बहाना नहीं था।
मैंने कुछ को बुलाया और दो लोग अचानक मिलने आ गये। रवि छोटे बेटे और पत्नी के साथ थे क्योंकि उसी दिन शाम की गाड़ी से वे लोग गांव जाने वाले थे।
जबरन इंटरव्यू में खड़ा कराने के बावजूद उसने सबको प्रभावित किया और अगले दिन उसका नियुक्ति पत्र मेरे पास ही आया। उसको रांची में पोस्टिंग मिली थी। रांची पहुंचकर वह स्वाभाविक रूप से हरिवंश जी से मिला। फिर हिंदुस्तान और प्रभात खबर की दुविधा और हरिवंश जी द्वारा उसे लपकना कुछ अच्छा नहीं लगा।
पर इसके बाद का रवि सचमुच हिंदी पत्रकारिता के राइजिंग स्टार में एक बन गया। बाद में उसे परेशानी भी हुई लेकिन जिस तरह उसने कैंसर से लड़ाई लड़ी और बहुत मामूली हैसियत के परिवार ने उसकी मदद की उसने छोटे भाई रवि को बड़ा स्टार बना दिया। अब यह सितारा हम सबसे बहुत दूर चला गया है। उसे प्रणाम।
विनोद कुमार-
रवि प्रकाश नहीं रहे . कैंसर से उनकी मौत हो गयी और उनके आत्मीय मित्र उनके बारे में लिख रहे है . उनकी जिजीविषा और संघर्ष के बारे में . उनके जीवन के अनछुए पहलुओं के बारे में . वे खुद भी लंग्स कैंसर के शिकार होने के बाद सतत लिखते रहे . अपने अनुभव जनित पीड़ा और बीच बीच में मिलने वाले थोड़ी राहत कं बारे में .
रवि प्रकाश से मेरा एक ढीला ढाला सा रिश्ता रहा . वे भी प्रभातखबर से जुड़े पत्रकार रहे . जब मैं उस अखबार से निकल गया . इस रिश्ते से हम कभी मिलते तो उनके चेहरे पर चिरपरिचित मीठी मुस्कान रहती थी . मैं हरिवंश जी से लड़ कर एक तरह से बेआबरू हो कर निकला था . यह वे जानते थे . कुछ अवसरों पर उनसे बात भी हुई . वे मेरे मित्र सूची में थे .
मैंने कैंसर को करीब से देखा है . शेषा जी को 2008 में कैंसर हुआ और पांच वर्ष ईलाज चला . वे बच तो गई लेकिन शारीरिक रूप से कमजोर हो गयी .
मेरे करीबी कई लोगों की मौत कैंसर से हुई है . घर से शुरू करें तो मेरी सास कैंसर से मरी . हेमंत की पत्नी और 74 के बिहार आंदोलन में चर्चित नूतन की मृत्यु कैंसर से हुई . मित्र दिलीप मंडल की पत्नी ने एक बार कैंसर को मात दे दी , लेकिन उन्हें दुबारा हुआ और वे नहीं रही . हाल में हमारे पुराने परिचित अशोक चौधरी की पत्नी की मौत कैंसर से हुई . साथी फैसल
अनुराग इससे जूझते रहे हैं .
शेषा जी के ईलाज के दौरान मैं ने करीब से इस रोग की भीषणता को महसूस किया . टाटा कैंसर हास्पीटल मुंबई में उनका ईलाज चला जहां रवि प्रकाश का भी . शुरुआती छह महीने हमें लगातार वहां रहना पड़ा . प्रभावित हिस्से को काट कर निकालना . कीमो थिरैपी . रेडियो थिरैपी . बालों का खत्म होना . फिर से उगना . मानसिक और शारीरिक यंत्रणाएं . इन सब को झेलते जीते जी एक दूसरी दुनिया का हिस्सा बन जाना .
मुंबई में हम बुर्जेस होम में रहते थे जो कैंसर मरीजों के लिए उस वक्त एक बड़ी राहत जैसा तीन मंजिला इमारत था दादर में . उसके भीतर एक कैंटिन भी था . और दूसरी मंजिल के एक कमरे से हम कैंपस के बाहर मुंबई की चहल पहल भरी दुनिया को मौन भाव से देखा करते थे . लेकिन भीतर की दुनिया भी हमेशा अवसाद से भरी नहीं होती . नीचे के विंग में बिल्कुल विपन्न मरीज मुफ्त रहते थे और उपर वाले दोनों विंग में थोड़ा पैसा लगता था . हालांकि नीचे और उपर की सारी सुविधाएं एक जैसी .
कैंटीन के अलावा ऊपर खुद से खाना बनाने की भी सुविधा थी . वहां साथ रहते आपस में सौहार्द पूर्ण रिश्ते भी बन जाते . नीचे के विंग के मरीज की सेवा में लगी एक लड़की कभी कभार चिढ़ाने के अंदाज में कहती – तुम तो उपर वाले हो . लेकिन हमारा रोजमर्रा का जीवन संघर्ष एक जैसा था . जल्दी से कुछ खा पी कर हॉस्पीटल ले जाने वाली बस में सवार होना और फिर कैंसर हास्पीटल के अलग अलग कमरों के चक्कर लगाना . कभी किसी तरह की जांच के लिए , कभी , रेडियो थिरैपी के लिए तो कभी डाक्टर से मुलाकात के लिए .
रवि प्रकाश भी इन्हीं सबसे गुजरे होंगे . उन्होंने अलग से यह भी किया कि वे अपनी भोगी हुई यातनाओं और उम्मीदों को लिखते भी रहे .
कैंसर के मरीज और परिजन इस तथ्य को जानते हैं कि यह जानलेवा रोग है . बावजूद इसके वे भरसक इससे लड़ते हैं . चूंकि लड़ाई लंबी चलती है , इसलिए उनके स्वभाव में एक ठहराव भी आ जाता है . संभावित मौत उन्हें बहुत ज्यादा विचलित नहीं करती. वैसे भी जीवन और मृत्यु एक सिक्के के दो पहलू हैं – जब तक जीवन है , मृत्यु की परछाई भी नहीं , लेकिन मौत तो जीवन नहीं . रवि प्रकाश उसी दूसरी दुनिया में चले गये . .
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