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द वायर ने भूल-चूक मानने के बजाय लेखक को अबला समझकर थेथरई की है!

रंगनाथ सिंह-

सुगना की खबर अंशतः सही निकली। दि वायर ने डैमेज कंट्रोल का दयनीय प्रयास किया है मगर डेढ़ सयानों की तरह। वायर द्वारा आज छापे गये फर्रे से पता चला कि दो अक्टूबर (गांधी जयंती) को डिलीट किया गया लेख ‘बोले भारत’ पर छपने के अगले दिन वायर ने एक ईमेल शुभनीत कौशिक को भेजा। शुभनीत जी ने उसका टका सा जवाब दिया। आज वायर ने अपना ईमेल और उसपर आया दो टुक जवाब ढाल की तरह छापा है! शुभनीत कौशिक के जवाब से जाहिर है कि वह ‘तुम्हारी है तुम ही सम्भालो ये दुनिया’ मोड में जा चुके हैं।

वायर के फर्रे से पुनः प्रमाणित हुआ है कि ज्यादा चालाक को तीन जगह लगती है। वायर ने मूल मुद्दे पर कुछ कहने के बजाय सारी जिम्मेदारी शुभनीत कौशिक पर डालने की कोशिश की है। किसी भी पॉवर सेंटर की यह बुनियादी प्रवृत्ति होती है कि वह डैमेज कंट्रोल करने का सबसे आसान तरीका विक्टिम ब्लेमिंग को समझता है।

वायर के मठाधीशों को लगता है कि वागाडम्बर के खोल में छिपकर वह दूसरों की आँख में धूल झोंक सकते हैं। वायर के अनुसार वे जेएनयू से पीएचडी लेखक को लिखना सिखा ही रहे थे कि उनका लेख अन्यत्र प्रकाशित हो गया! चिढ़ाने के अन्दाज में वायर ने लेखक से तीसरा ड्राफ्ट माँगा है! वायर ने लेखक के चेहरे पर पैसा चमकाने का भी प्रयास किया है! इतने ही रईस हो तो दुनिया को बता क्यों नहीं देते कि शुभनीत कौशिक को प्रति लेख कितना भुगतान करते रहे हो! वायर पर उनके 10-20 लेख तो अब तक छप ही चुके हैं। कभी तो भुगतान हुआ होगा।

एक सुतरी सरीखी वेबसाइट का जमींदार होने का अहंकार वायर के फर्रे के पोर-पोर से टपक रहा है। इस विषय से जुड़े प्रमुख मुद्दों पर हम आगे बात करेंगे, आज बस इतना बताना चाहूँगा कि वायर ने जिस लेख को डिलीट किया, वह “बोले भारत” पर कैसे छपा। यह भी इसलिए बताना पड़ रहा है कि वायर ने भूल-चूक मानने के बजाय लेखक को अबला समझकर थेथरई की है।

शुभनीत कौशिक से मेरा कोई टॉकिंग टर्म नहीं है। उनका फोन नम्बर आज भी मेरे पास नहीं है। न चैटिंग-मैसेजिंग का नाता है। उनकी वॉल पर देखा कि उन्होंने प्रमुख बुद्धिजीवियों द्वारा निजी दस्तावेज अशोक यूनिवर्सिटी को देने के विषय पर लिखा है।

मैंने उनके कमेंट बॉक्स में लिखा कि यह जरूरी मुद्दा है, मैं भी इसे आगे बढ़ाऊँगा। मैं उस विषय पर कुछ लिखता इससे पहले ही उनकी वॉल से पता चला कि वह लेख डिलीट हो गया है! यह सूचना मिलने पर मैंने स्वतःसंज्ञान लेते हुए ‘बोले भारत’ के प्रधान सम्पादक समरेंद्र जी से पूछा कि क्या आप वह लेख छाप देंगे?

विवादित विषय होते हुए भी उन्होंने इसकी सहमति दी। उसके बाद मैंने शुभनीत कौशिक को मैसेज किया कि आपको कोई समस्या न हो तो वह लेख ‘बोले भारत’ पर छपने के लिए दे दें। उस समय मुद्दा ये नहीं था कि लेख में लिखा क्या है, मुद्दा था कि किसी प्रमाणिक लेखक के विचार को कोई मठाधीश सेंसर कैसे कर सकता है!

शुभनीत जी ने कुछ घण्टे बाद मेरा फेसबुक मैसेज देखा और मुझसे ईमेल माँगकर लेख भेजा। उन्होंने यह भी बताया कि वायर के कहने पर मूल लेख में सम्पादन करके उन्हें भेजा था मगर उन्होंने वह सेकेण्ड ड्राफ्ट भी अस्वीकार कर दिया। (वायर के बयान से इसकी पुष्टि भी हो गयी।) मैंने उनसे कहा कि आपके पास जो आखिर ड्राफ्ट हो वह भेज दें। उन्होंने ईमेल पर अपना लेख भेज दिया। वह छप भी गया। उस लेख के परिचय में साफ लिखा है कि यह मूल लेख का सम्पादित रूप है। लेख छपने के बाद भी मेरा शुभनीत जी से कोई संवाद नहीं हुआ। वायर से उनके ईमेल के लेन-देन की बात भी आज वायर के माध्यम से पता चली।

मेरा पहला प्वाइंट यही था कि एक तो हिन्दी में कविता-कहानी नुमा चीजों के इतर विषयों पर लिखने वाले प्रमाणिक लोग कम हैं, और जो हैं उन्हें भी ऐसे सेंसर किया जाएगा तो कैसे चलेगा! शुभनीत कौशिक को हम जैसे लोग केवल उनके लेखों के माध्यम से जानते हैं। पिछले कुछ सालों में हिन्दी समाज के प्रबुद्ध वर्ग में उन्होंने सम्मानजनक जगह बनायी है। जिससे व्यक्तिगत परिचय न हो, उसका लेख स्वतःसंज्ञान लेकर छपवाने का मकसद उस सेंसरशिप का प्रतिकार करना था जो एडिटर रूपी हेडमास्टर लेखकों को स्कूली छात्र समझकर उनपर थोपना चाहता है!

वायर वाले यह कभी नहीं समझेंगे कि छपने के अधिकार का समर्थन करने के लिए लेखक की विचारधारा से सहमत होना आवश्यक नहीं है। मैं अभी नाम नहीं दे रहा हूँ मगर मुद्दा उठ गया है तो बताना चाहूँगा कुछ समय पहले जब मैं एक हिन्दी न्यूजसाइट का सम्पादक था, जिसकी पाठक संख्या वायर से न्यूनतम दस गुना ज्यादा होगी, तब मेरे एक मित्र ने एक सम्मानित माओवादी शुभचिंतक के लेख के बारे में कहा कि वह तीन-चार जगह से रिजेक्ट हो चुका है! जाहिर है कि उन्होंने पहले अपने हमख्याल लोगों के पास वह लेख भेजा होगा। मैंने उनसे कहा कि जबतक मैं मीडिया में कहीं भी हूँ, किसी प्रमाणिक लेखक का लेख न छपे ऐसा नहीं हो सकता। लेखक की विचारधारा से पूरी तरह असहमत होते हुए भी हमने वह लेख छापा।

शुभनीत कौशिक हो या कोई और, यदि वह हिन्दी में स्तरीय लेखन करता है, तो उसकी विचारधारा, सम्प्रदाय, जात, मजहब कुछ भी हो, मैं उसके साथ खड़ा रहता हूँ। आगे भी खड़ा रहूँगा। मेरा सुझाव है कि भांति-भांति के एडिटरों को खुद को हेडमास्टर और लेखकों को नर्सरी का बालक समझना छोड़ देना चाहिए। इन्हीं कारणों से हिन्दी में नए मौलिक विचारक पनप नहीं पाते।

ओपनियन पीस में कोई आंकड़ा गलत जा रहा हो, कोई नाम गलत जा रहा हो तो उसे दुरुस्त किया जाता है, मगर छपने से पहले। छपने के बाद किसी भी लेख की पूरी जिम्मेदारी सम्पादक की होती है, अगर वह रीढ़ वाला है तो। बिना रीढ़ वाला सम्पादक छपने के बाद दो-चार फोन कॉल आने पर मूल लेख का नया ड्राफ्ट लिखवाने लगता है। लेखक को नसीहत देने लगता है। अपने आकाओं के नाराज होने पर सारा ठीकरा लेखक पर फोड़ना चाहता है।

वायर के मालिकान को अगर ड्राफ्ट लिखवाने का इतना ही शौक है तो यह हुनर पहले अपने स्टाफ राइटर को सिखाएँ। अपने स्टाफ को प्रूफ रीडिंग और एडिटिंग के बीच फर्क सिखाएँ। वायर के स्टाफ राइटरों का यह हाल है कि पिछले कुछ सालों में उनसे ज्यादा लेख किसी अन्य प्रकाशन संस्थान ने डिलीट नहीं किये होंगे। ये तीसरा ड्राफ्ट छापेंगे!

मैंने अपने लेख में संकेत दिया था कि मूल मुद्दा है- वैचारिक दोहरापन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दमन और शोध कार्य पर कसता पूँजीवादी शिंकजा। कहना न होगा, इनपर बात जारी रहेगी।

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