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अज्ञेय, द वायर और अशोक यूनिवर्सिटी कांड – हम महात्मा गांधी के प्रति सिर्फ शर्मिंदा हैं!

रंगनाथ सिंह-

रीब डेढ़ दशक पहले महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर जेएनयू में कवि रमाशंकर यादव विद्रोही ने कहा था, “गांधी जी को कभी किसी ने टोपी लगाते नहीं देखा, गांधी जी की टोपी वाली तस्वीर कभी किसी ने नहीं देखी होगी मगर गांधी टोपी देश में मशहूर है। जिस आदमी ने गांधी टोपी का प्रचार किया होगा, वह जरूर टोपियों का बड़ा ठेकेदार रहा होगा। गांधी जी की टोपी को लेकर लोग टोपीवाले हो गये। उनके खानदान के लोग टोपी लेकर पेट से पैदा होते हैं। और गांधी जी को मरवा भी दिया गया और पागल भी घोषित कर दिया गया। इतना अपमान शायद ही किसी महान आदमी का हुआ होगा जितना इस महान आदमी का हुआ। इसलिए हम उन सबकी तरफ से महात्मा गांधी के प्रति सिर्फ शर्मिंदा हैं, सिर्फ शर्मिंदा हैं।”

कवि विद्रोही हमारे बीच नहीं रहे मगर गांधी जी को शर्मसार करने वाले गांधी टोपी के ठेकेदार आज भी हमारे बीच मौजूद हैं। गांधी टोपी ही नहीं गांधीवाद के ठेकेदार भी हमें शर्मसार करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। इस गांधी जयंती से पहले भी यही हुआ। विख्यात गांधीवादियों ने गांधी जी को शर्मसार किया और आज के विद्रोही उनके कृत्य पर शर्मिंदा हुए।

हुआ यूँ कि गांधी जयंती से एक हफ्ते पहले गांधीवादी पत्रकार ओम थानवी ने सर्वसाधारण को सूचना दी कि साहित्यकार सच्चिदानन्द वात्स्यायन अज्ञेय के निजी दस्तावेज उनके माध्यम से हरियाणा स्थित एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी को सौंप दिये गये हैं। थानवी जी की सूचना पर प्रतिक्रिया देते हुए युवा इतिहासकार शुभनीत कौशिक ने एक लेख लिखा जिसमें उन्होंने दिखाया कि अशोक यूनिवर्सिटी नामक इस निजी विश्वविद्यालय को कई अन्य विख्यात हस्तियों के निजी दस्तावेज सौंपे जा चुके हैं, जिनमें गांधी जी के परिवार से आने वाले गोपालकृष्ण गांधी समेत वीरभारत तलवार, चण्डी प्रसाद भट्ट, प्रभाकर माचवे, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, गिरीश कर्नाड, कुलदीप नैयर, दीपक कुमार, नंदिता हक्सर, अचिन विनायक और दिलीप सिमियन जैसे नाम शामिल हैं।

शुभनीत कौशिक ने बताया कि माकपा नेता सुभाषिनी अली ने आजाद हिन्द फौज की सम्मानित योद्धा कैप्टन लक्ष्मी सहगल के निजी दस्तावेज भी अशोक यूनिवर्सिटी को सौंप दिये हैं। इतना ही नहीं, पूर्व राष्ट्रपति एस. राधाकृष्णन और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के निजी दस्तावेज भी अशोक यूनिवर्सिटी के पास हैं। भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के निजी दस्तावेज अब प्राइवेट सेक्टर के हाथों में पहुँच चुके हैं!

शुभनीत कौशिक ने अपने लेख में दिखाया कि सरकारी अभिलेखागारों के मुकाबले अशोक यूनिवर्सिटी में इन दस्तावेज पर शोध करने में छह से दस गुना ज्यादा खर्च आ सकता है। नौकरी मिलने के बाद भी लाइब्रेरी और अभिलेखागार जाने की आदत के चलते शुभनीत कौशिक का शोध कार्य के छह से दस गुना महँगा होने पर चिन्तित होना स्वाभाविक था। शोध कार्य के कई गुना महंगे होने के अलावा एक अन्य नुक्ते की वजह से यह प्रवृत्ति बेहद चिन्ताजनक है। जिन लोगों ने अपने या अपने पुरखों के निजी दस्तावेज अशोक यूनिवर्सिटी को सौंपे हैं, उनमें से कई ऐसे हैं जो उच्च शिक्षा के निजीकरण के मुखर विरोधी रहे हैं। कुछ ऐसे हैं जो पूँजीपतियों द्वारा शिक्षा और चिकित्सा इत्यादि को हड़पते जाने की नियमित आलोचना करते रहे हैं।

इन लोगों द्वारा अपनी कथनी के ठीक उलट करनी करने से शायद गांधी जी पर्याप्त शर्मसार नहीं हुए थे, इसलिए इन्होंने गांधी जी को उनकी जयंती से पहले और शर्मसार करने वाला कृत्य कर डाला। शुभनीत कौशिक का उक्त लेख न्यूजसाइट ‘दि वायर’ पर 29 सितम्बर को प्रकाशित हुआ। मगर गांधी जी की आत्मा को शांति पहुँचाने के लिए उस लेख को प्रकाशित होने के थोड़ी देर बाद ही डिलीट कर दिया गया! देश के सबसे बड़े राजनीतिक शक्तियों और पूँजीपतियों के खिलाफ हर वक्त खगडहस्त मुद्रा में रहने वाले दि वायर ने एक युवा इतिहासकार के जेनुइन कंसर्न की हत्या कर दी और कोई मलाल भी नहीं किया!

द वायर पर लगी ख़बर का स्क्रीनशॉट जो डिलीट हो गई

कहाँ तो शुभनीत जी द्वारा उठाए सवालों पर प्रबुद्ध समाज को चर्चा करनी चाहिए था, कहाँ उन सवालों को ही दफन करने का प्रयास किया गया! शुभनीत कौशिक के उस लेख का लिंक आखिर में दिया गया है और उसे पढ़कर आप खुद देख सकते हैं कि उसमें ऐसे कौन से सवाल थे, जो डिलीट किये जाने योग्य थे! लेख पढ़कर आप देखेंगे कि उसमें वही बात कही गयी है जो इन अग्रणी गांधीवादियों और मार्क्सवादियों ने दशकों से अपने पाठकों को बता रखी हैं। शुभनीत कौशिक की गलती केवल इतनी थी कि उन्होंने सुभाषिनी अली, वीरभारत तलवार, चण्डी प्रसाद भट्ट, अचिन विनायक, नन्दिता हक्सर इत्यादि की बातों को गम्भीरतापूर्वक ले लिया। नतीजा ये हुआ कि उनके लेख से भारत के लेफ्ट-लिबरल जमात की आँत उलटकर जनता के सामने खुल गयी। दुनिया को इनके आँत में छिपे दाँत दिख गये। दुनिया को दिख गया कि ‘फ्री स्पीच’ के ठेकेदारों को अपनी जमात की आलोचना में छपा एक सामान्य लेख भी बर्दाश्त नहीं होता।

मेरी राय में शुभनीत कौशिक भाग्यशाली हैं कि उनका केवल एक लेख डिलीट हुआ। भारत की लेफ्ट-लिबरल जमात ने बड़े-बड़े इतिहासकारों को यह कहकर डिलीट कर दिया कि वे ‘राष्ट्रवादी’ हैं! मानो, अपने देश से प्यार करना कोई अपराध है! कवि विद्रोही के जीवनकाल में गांधी टोपी के जो ठेकेदार देश को शर्मसार कर रहे थे, वे आज भी उतने ही सक्रिय हैं। उनके शर्मनाक कृत्यों पर आज भी विद्रोही जी की शब्दों में केवल यही कहा जा सकता है कि हम महात्मा गांधी के प्रति शर्मिंदा हैं, सिर्फ शर्मिंदा हैं।

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