
चंदन पांडेय-
सब अब लेखक संगठनों को कोस रहे हैं। संगठन अपने कायदों पर ही चलेगा। उसके नियम होंगे। सम्भव है कि उनका संविधान भी हो।
आज के समय में किसी संगठन के लिए यह विचार करना भी साहस का काम है कि वह लिट फेस्ट आदि के विरोध में कुछ तय करे।
मुझे तो अलबत्ता यह लगता है कि लोगों को संगठन में शामिल करने और रखने के नाम पर कभी-कभी बेजा छूट संगठन देते हैं। दो वर्ष पहले वरिष्ठ कवि और प्रलेस के वरीय पदाधिकारी कुमार अम्बुज से एक मुलाकात की स्मृति है। वे इस पर चिंतित थे। कुछ बातों के बाद इशारों में ही उन्होंने समझाया था। बातचीत में नीलेश रघुवंशी भी शामिल थीं।
कहीं आना जाना एक बात है और अपने संगठन के नियम के खिलाफ जाना बिल्कुल जुदा बात। आप स्वच्छंद होना चाहते हैं तो लेखक संगठन से या किसी संगठन से जुड़िये ही मत। यह क्या बात हुई कि दोनों तरफ रह लिए!
एक उदाहरण बड़े कवि के आयोवा जाने का याद आता है। बतौर कवि आप कहीं भी जायें लेकिन एक वामपंथी संगठन के साथ जुड़कर आयोवा वाले संस्थान में जाना विडंबना की अति है। दोनों दो छोर हैं। आयोवा रायटर्स रेज़िडेंसी की राजनीति किसी से छिपी नहीं है।
बड़े-बड़े नामों का लेखक संगठनों में उच्च पदों पर होना भी समझ नहीं आता। मसलन कोई बच्चा अगर कक्षा में पढ़ने में तेज है तो उसे ही क्लास का मॉनिटर बना दो, क्रिकेट टीम का कप्तान बना दो, फुटबॉल का कप्तान बना दो। बड़ा लेखक होना और सांगठनिक ओहदों के लिए उपयुक्त होना दो अलग-अलग बातें हैं। बहुत कम लोग दोनों में सिद्ध होते होंगे।
नाम नहीं लूंगा लेकिन एक संगठन का सम्मेलन था। शायद जयपुर में या कि लखनऊ में। दोस्तों ने बताया तो मैंने अपनी यात्रा योजना कुछ इस तरह बनाई कि संगठन के उस कार्यक्रम में मैं भी शामिल हो सकूँ। अच्छा लगता है। बड़ी लंबी जुटान थी। तमाम जगहों से लोग आए थे। शहर के लोग भी थे। बहुत सारे लोग मिले। प्रभात फेरी में शामिल हुआ। लेकिन मजेदार यह लगा कि राष्ट्रीय अध्यक्ष साहब अपने लाव लश्कर के साथ शाम को पधारे।
दूसरी बात मुझे यह लगती है कि सांस्कृतिक संगठनों में आजीवन अध्यक्ष उपाध्यक्ष प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष आदि नहीं बनाना चाहिए। हद से हद दो वर्ष का कार्यकाल हो और फिर वह भी अपेक्षाकृत युवाओं के लिए हो। कितना अच्छा लगेगा कि तीस पैंतीस चालीस का कोई नौजवान सांस्कृतिक संगठनों का नेतृत्व करे और समय सीमा के भीतर दूसरे नेतृत्व का चयन करे।
जब भी मैं किसी बुजुर्ग को किसी संगठन के नेतृत्व में देखता हूँ तो एक एहसास उनके कठपुतली होने का होता है। लगता है कि यह साहब तो नाम भर का राजा हैं।
दूर से देख रहा हूँ क्योंकि किसी संगठन का सदस्य नहीं हूँ लेकिन लग रहा है कि संगठन अगर ऐसे कठोर निर्णय लेने लगें तो नई पीढ़ी का यक़ीन उनपर पुख्ता होगा।
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