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उत्तर प्रदेश

योगी आदित्यनाथ का राजनीति में जो भी प्रतिद्वंदी बना उसका करियर ढलान पर चला गया, जानिए कैसे?

शिव प्रताप शुक्ला से लेकर मनोज सिन्हा और एके शर्मा तक.. फेहरिस्त लंबी है. यूपी की राजनीति में योगी आदित्यनाथ का जो भी प्रतिद्वंदी बना है उसका राजनीतिक करियर ढलान पर चला गया. यह सब कब क्यों और कैसे हुआ, सतेंद्र प्रताप जी बता रहे हैं, आप भी पढ़ें…

सतेंद्र प्रताप-

किस्मत कहिए, राजनीतिक सूझ बूझ कहिए या फिर बाबा गोरखनाथ का आशीर्वाद की जो भी योगी जी के सामने उनका प्रतिद्वंदी बना उसका राजनीतिक कैरियर ढलान पर ही चला गया। आज इसके बारे में विस्तार से जानते है….


1- शिव प्रताप शुक्ला

2002 में राजनाथ सिंह जी CM थे, गोरखपुर सदर से योगी जी के विरोधी BJP के दिग्गज नेता, 4 बार के विधायक (इसी सीट से) व केबिनेट मंत्री शिव प्रताप शुक्ला (वर्तमान में हिमाचल गवर्नर) को फिर से टिकट दिया गया। योगी जी ने अखिल भारतीय हिन्दू महासभा से अपना प्रत्याशी राधा मोहन दास अग्रवाल को खड़ा कर दिया और उन्हें जिता दिया, शिव प्रताप जी 3 नम्बर पर चले गए।

इसके बाद शिव प्रताप जी 15 साल संगठन की राजनितिं में ही रहे एक तरह से राजनितिं खत्म सी हो गयी थी, बाद में 2016 में राज्यसभा और फिर गवर्नर बनाकर सम्मान दिया गया।

2- मनोज सिन्हा

2017 यूपी में बीजेपी की जीत के बाद CM पद के लिए जो नाम सबसे ज्यादा चल रहा था वो मनोज सिन्हा जी का था, कहा तो ये जाता है कि बनारस में उन्हें CM प्रोटोकाल तक मिल गया था।

खैर, 2019 के चुनाव में वो भी लोकसभा चुनाव हार गए और बाद में LG बनकर एक तरह से सक्रिय राजनीति से विदाई हो गयी।

3- उपेंद्र दत्त शुक्ला

2018 में गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव में योगी जी के विरोधी गुट शिव प्रताप शुक्ला के करीबी उपेंद्र दत्त शुक्ला को टिकट दिया गया, वो ये चुनाव हार गए, बाद में उनकी कोरोना काल में मृत्यु हो गयी।

4- ए के शर्मा

मोदी, अमित शाह जी के सबसे खास ब्यूरोक्रेट्स एके शर्मा जी 2021 में गुजरात से समय से पहले VRS लेकर यूपी की राजनीति में आये, कहा गया कि CM बनेंगे, dy CM बनेंगे लेकिन इन्हें बनाया गया बीजेपी प्रदेश उपाध्यक्ष जिसमें पहले से ही 17 लोग थे, बाद में मान मनौव्वल के बाद किसी तरह MLC बनाया गया अभी कैबिनेट मंत्री हैं।

खैर, जिस हिसाब का परफॉर्मेंस है इनका ऊर्जा विभाग में ये तो 100% तय है कि उनका राजनीतिक कैरियर लम्बा नहीं है, छवि खराब हो चुकी है।

5- केशव प्रसाद मौर्या

2017 में यूपी बीजेपी की जीत के बाद सबसे अधिक CM के लिए चर्चा मीडिया में केशव जी के नाम की हो रही थी, प्रदेश अध्यक्ष भी थे लेकिन dy cm से संतोष करना पड़ा। पार्टी में पकड़ का ये हाल था 2018 में bjp के 200 विधायक धरने पर बैठवा दिए योगी जी के खिलाफ।

खैर, 2022 के चुनाव में ये खुद की सीट हार गए, DY CM तो बनाये गए लेकिन विभाग छोटा कर दिया गया, अब पीआर और केंद्रीय नेतृत्व के दम पर समा बांधने की असफल कोशिश करते रहते हैं।

6- पंकज चौधरी

यूपी में जब भी CM परिवर्तन की सुगबुगाहट शुरू होती थी तो अंदरखाने इनका नाम तेजी से उठता था CM पद के लिए। 2 बार से 4 लाख से लोकसभा जीत रहे थे इस बार किसी तरह 30 हजार से जीते है, इनकी भी सम्भवतः ये आखिरी पारी है।

7- बृज भूषण सिंह

पिछले 3 सालो से सरकार की सबसे ज्यादा आलोचना करने वाले व्यक्ति में शुमार थे, ऐसे राजनीति कुचक्र में फंसे की इस बार टिकट उनको न मिलकर उनके बेटे को मिला। 68 की उम्र है अगली बार तक 73 हो जाएंगे, एक तरह से सक्रिय राजनीति इनकी भी खत्म है।

इसी तरह हरिशंकर तिवारी का परिवार, सुनील सिंह, राधा मोहन अग्रवाल और भी लिस्ट लम्बी है प्रदेश की राजनीति में। कुछ ऐसे ही केंद्र की राजनीति के लिए योगी जी के लिए रास्ते धीरे-धीरे खुद खुल रहे, प्रतिद्वंदी कम होते जा रहे हैं।

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