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उत्तर प्रदेश

कानपुर का ये अस्पताल तो बड़ा क्रूर है, इस पत्रकार को सुसाइड के ख्यालात तक पहुंचा दिया

कानपुर के वरिष्ठ पत्रकार ब्रजेश शर्मा की बीते दिनों भड़ास पर एक खबर प्रकाशित हुई थी. वे बिना डॉक्टरी सलाह के दवा खाने के बाद संक्रमित होकर शहर के एक निजी अस्पताल में भर्ती हो गए थे. महंगी दवाओं और तमाम इलाज के खर्च का इन्होंने किसी से भी मदद लेने से मना कर दिया था. इन्हें सरकारी सिंस्टम पर बड़ी उम्मीद थी. जिन कार्डों और सरकारी इलाज में मदद की योजना के दम पर भर्ती हुए, वह सब काम नहीं आया. एक जगह से मदद की रोशनी दिखी तो पाया कि यह अस्पताल उस मदद के लिए रजिस्टर्ड नहीं है. इनकी माताजी की तीन महीने से पेंशन भी नहीं आई.

ब्रजेश ने पहले जितना जो जमा रखा धन शुरू में दे दिया था. अस्पताल प्रबंधन को इसकी जानकारी देकर रुपयों का बंदोबस्त करने के लिए मोहलत मांगी गई. यहां अस्पताल प्रबंधन ने गेम कर दिया. इनसे दवा-इंजेक्शन इत्यादि का बिल जमा करने को कहा और बाकी 10 दिन का समय दिया. ब्रजेश के साथ पूरा परिवार खुश होकर इधर उधर से कुछ बहुत रुपये जुटाए और जमा कर दिया. रात को निकलने की बारी तो अस्पताल के गुर्गों ने पैसे दिए बिना हिलने तक से मना कर दिया है. ब्रजेश और उनका परिवार अस्पताल में किस हाल में है… नीचे पढ़िए….


ब्रजेश शर्मा-

बीती रात को मेरे साथ हुआ वाक्या..

हॉस्पिटल का वार्षिक रजिस्ट्रेशन जो कर रहा है सीएमओ ऑफिस से एक फोन आया हॉस्पिटल के मैनेजर के पास

ब्रजेश शर्मा एडमिट हैं उनसे मेडिसिन का चार्ज ले लीजिए बाकी हॉस्पिटल का आप मैनेज करिए

मेरे पास एक बड़ा हॉस्पिटल का बंदा आया, परिचय बताते हुए मेडिसिन का पेमेंट करने को कहता है. बाकी हॉस्पिटल का दस दिन के अंदर भुगतान जमा करने को कहता है.

हम बड़े खुश,,, शुरू हो गए जो काम थे पूरे करने में, दस हजार मम्मी से लिए.. सत्रह मेरे पास थे, गगन भाई, दो टीम के सदस्यों ने भी हेल्प की, एक हेल्प बाकी रह गई. फिर हमने अपने एक मित्र से दोपहर तक के लिए तीन हजार लिए और मेडिसिन का फुल एन फाइनल पेमेंट कर दिया.

अब चलने की बारी आई. तो जिस वार्ड में थे वहीं रोक दिया गया. कहा गया.. आपको हॉस्पिटल के बिल में छब्बीस हजार की छूट दी जा रही है. आप चालीस हजार तुरंत जमा करो नहीं तो यहीं रुको.

गेट बंद कर दिए गए, पत्नी को हमने जाने को कहा तो बोले इनको भी रुकने दो. कुछ हुआ तो क्या करोगे..

कोई सही से बात नहीं कर रहा था.

मैने अनिकेत सर (अस्पताल मालिक) को फोन लगाया, उन्होंने रिसीव करते नाम सुना तो बोले ब्रजेश एक रात रुकना ही पड़ेगा. मैं सुबह बात करूंगा, सभी का स्वभाव एक मरीज के लिए जानवर की तरह हो गया था.

मरता क्या न करता,,, अकेले वह भी बीमारी की वजह से चुपचाप खून का घूंट पीकर रुक गया.

अगर आहना हॉस्पिटल को इस तरह करना था तो, इतना षड्यंत्र क्यों रचा.. मुख्यमंत्री योगी के नियमों से बहुत पावरफुल हैं.

डॉक्टर अनिकेत त्रिपाठी जी ने भी कहा ब्रजेश रात भर रुक जाओ.

पत्रकार हूं. लेकिन एक भी बार परिचय तक नहीं दिया, कोई ड्रामेबाजी जैसा रौब नहीं झाड़ा. शालीनता से इलाज कराया और मुझे बचाने वाले भी इसी अहाना हॉस्पिटल में रहने वाले धरती के भगवान ही हैं, पर अंत में क्रूरता व्यवहार कर दिया.

थक हार कर, सोचा लाओ सब सो जाएं तो हम भी कोई गलत कदम उठा लें, पर आंखों में आंसू भर आए और सामने मेरे तीनो बच्चे पत्नी, बहन, मां और भाई बहु खानदान रोते बिलखते दिखने लगा. हिम्मत टूट गई, गलत कदम उठाने की, सोचता रहा, तभी याद आया की नींद की टेबलेट दी जा रही थी, तो उसको उठाया और पानी के साथ ले ली पर दिमाग में टेंशन इतनी कि नींद की टेबलेट भी टेंशन के आगे खामोशी में तब्दील हो गई.

कितना बदल गया है उत्तर प्रदेश, सरकार योगी बाबा की. बाबा का शासन, नियम जनता के लिए विकास सबकुछ पर अत्याचार खामोशी से दहाड़ता हुआ दिख रहा है.


नीरज तिवारी-

यूपी के कानपुर से वायरल सच, पहले बचाया फिर छूट का लालच देकर बिल भरवाया और फिर देहरी पार नहीं करने दी…

ब्रजेश की यह पिछली खबर भी पढ़ें…

बिना डॉक्टरी सलाह के दवा न खाएं वरना इस वरिष्ठ पत्रकार की तरह भुगतना पड़ सकता है!

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