
दैनिक भास्कर में खास है, कैलाश मानसरोवर यात्रा भी ‘जल्द ही शुरू होने की संभावना‘
संजय कुमार सिंह
आप जानते हैं कि आज महाराष्ट्र में मतदान है। झारखंड के बाकी सीटों के लिये दूसरे चरण का मतदान है और उत्तर प्रदेश के उपचुनावों की तारीख बढ़ाये जाने के कारण आज वहां भी मतदान है। अमर उजाला में सिंगल कॉलम की खबर का शीर्षक है, होटल से 9.93 लाख जब्त, भाजपा महासचिव पर केस। महाराष्ट्र चुनाव से एक दिन पहले वोट के लिए रकम बांटने के मामले में भाजपा महासचिव विनोद तावड़े व विपक्ष के बीच जमकर हंगामा हुआ। पुलिस ने पालघर होटल से 9.93 लाख रुपये की नकदी जब्त की है। चुनाव आयोग की शिकायत पर पुलिस ने तावड़े और पार्टी उम्मीदवार राजन नाइक पर मतदाताओं को नकदी बांटने के आरोप में मामला दर्ज किया। स्पष्ट है कि भजपा सचिव होटल में पैसे बांट रहे होंगे, उनके पास पैसे मिले भी हैं और सूचना मिलने पर विपक्ष ने पोल खोल दी होगी। पुलिस ने सामान्य तौर पर एफआईआर नहीं लिखी है। चुनाव आयोग की शिकायत पर एफआईआर दर्ज हो गई है तो मामला हल्का-फुल्का नहीं हो सकता है। नवोदय टाइम्स में यह खबर लीड है। शीर्षक है, वोटिंग से पहले कैश-क्रिप्टो की गूंज। बीवीए नेता का दावा – तावड़े ने मतदाताओं को बांटे पैसे, भाजपा नेता का इनकार।
आप समझ सकते हैं कि झारखंड में मतदान से पहले छाप पड़ रहे थे क्या मिला अभी तक नहीं बताया गया अभी 9.93 लाख रुपये जब्त हुए हैं, मतदाताओं को बांटने का आरोप है लेकिन खबर कितना बचा कर लिखा गया है। शीर्षक में पैसे बांटने का आरोप भी नहीं है जबकि एफआईआर हुई है तो बांटे ही जा रहे होंगे और जिन लोगों को मिले उनमें से किसी से पूछ कर खबर की पुष्टि की जा सकती थी। अब जब वीडियो बनाना बहुत आसान है और इस आधार पर प्रिंट में भी खबर हो सकती थी। यहां खबर पैसे बांटने का आरोप नहीं दावा है और किसी पाने वाले या लेने आये व्यक्ति से बात चीत कर उसकी पुष्टि या आरोप से इनकार नहीं किया गया है। अगर वहां मौजूद लोग कहते कि वे किसी होटल में नेता से मिलने, सुनने आये थे। उन्हें पैसे देने के लिए नहीं बुलाया गया था और वे भाषण सुनने या दर्शन लाभ करने आये थे तो यही खबर थी। यही बताई जानी चाहिये थी। यकीन करना पड़ेगा। पर आरोपों की ना तो पुष्टि की गई है ना खंडन हुआ है। उल्टे जिसपर आरोप है उसका इनकार छापा गया है। ठीक है कि आदर्श पत्रकारिता के लिए यह जरूरी है लेकिन आदर्श पत्रकारिता करते हुए आप खबर को बदल नहीं सकते हैं या जो खबर है उसे नहीं बतायें गूंज, दावा और इनकार जैसे शब्दों के बाद खबर में दम ही नहीं है। नवोदय टाइम्स की खबर के अनुसार, एक होटल में मतदाताओं को कथित तौर पर नकदी बांटने के आरोप में विनोद तावड़े, पार्टी उम्मीदवार राजन नाइक और अन्य के खिलाफ दो प्राथमिकी दर्ज की। जाहिर है, इनकार को स्वीकार नहीं किया गया और तभी एफआईआर हुई है वरना एफआईआर की क्या जरूरत थी?
नवोदय टाइम्स ने राहुल गांधी का तंज भी प्रकाशित किया है, पांच करोड़ किसके सेफ से निकला है। इसके साथ लीड में भाजपा ने फोड़ा क्रिप्टो बम जारी की ऑडियो क्लिप। आज के समय में ऐसे क्लिप की जांच और पुष्टि के बगैर कोई मतलब नहीं है और मतदान से एक दिन पहले जारी करने का मतलब आप समझ सकते हैं। यही नहीं, कन्हैया कुमार के वीडियो के मामले में इतने साल बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई है तो उसके सही होने की संभावना आप समझ सकते हैं। दूसरी ओर, अगर यह फर्जीवाड़ा है तो उसके खिलाफ भी अभी तक कार्रवाई हो जानी चाहिये थी पर वह भी नहीं हुई है। एक हैं तो सेफ हैं का अगर मजाक बनाया जा रहा है तो ऐसे उदाहरण कम नहीं हैं।
ऐसे में मतदान से पहले ईडी सीबीआई के छापे की खबरें हम देख चुके हैं। अब नकदी बांटते पकड़े जायें तो ऑडियो क्लिप से आरोप। नकदी बांटने का पता पुलिस और भिन्न विभागों को तो नहीं ही लगा, जब लोगों ने खुलासा कर दिया तो भी एफआईआर नहीं हुई और चुनाव आयोग के दखल से एफआईआर हुई है। पैसे बांटने वाला इनकार कर रहा है दूसरी ओर ऑडियो पर संबंधित लोगों का कोई स्पष्टीकरण नहीं है। दिलचस्प यह कि नवोदय टाइम्स में आज पहले पन्ने पर ही एक खबर का शीर्षक है, सावधान! आरबीआई गवर्नर की फर्जी सलाह बाजार में है। आरबीआई ने सोशल मीडिया पर प्रसारित गवर्नर दास के फर्जी वीडियो को लेकर किया आगाह। अब जिस देश में रिजर्व बैंक के गवर्नर के फर्जी वीडियो का प्रसारण नहीं रोका जा सकता है, सरकार लोगों को आगाह कर रही है वहां मतदान के दिन ऐसे वीडियो की खबर ‘व्यवस्था की खामी’ है। शायद चुनाव आयोग को देखना चाहिये।
नकद बांटने के आरोप के साथ भाजपा के आरोपों को जो प्रचार नवोदय टाइम्स ने दिया है वह आज किसी और अखबार में नहीं है। द टेलीग्राफ की खबर का शीर्षक है, महायुती पर मतदान से पहले नकद बांटने का गुस्सा। इसमें विनोद तावड़े की फोटो है और उसके कैप्शन में नहीं कहा गया है कि उन्होंने आरोपों से इनकार किया। यही बताया गया है कि वोट के लिए नकद देने के आरोप के बाद उन्होंने मीडिया से बात की। खबर में लिखा है कि विपक्ष के हमले से बचने के लिए पार्टी को एक जबरदस्त अभियान चलाना पड़ा जिसका उद्देश्य नुकसान की भरपाई करना था। अखबार ने पीटीआई के हवाले से लिखा है, पालघर के जिला अधिकारियों ने कहा कि पुलिस टीम ने विरार में एक होटल से 9.93 लाख रुपये नकद और कुछ आपत्तिजनक दस्तावेज बरामद किये जहां कुछ भाजपा कार्यकर्ता कथित रूप से पैसे बांट रहे थे। बीवीए के प्रमुख हितेन्द्र ठाकुर ने तावड़े पर आरोप लगाया कि वे पैसों से मतदाताओं को प्रभावित कर रहे थे। जब चुनाव के समय ईडी, सीबीआई के छापे पड़े और वह भाजपा के हित में या विपक्ष के नुकसान के लिए हो तो ऐसी बरामदगी का अपना महत्व और मतलब है। फिर भी खबर को सिंगल कॉलम में निपटा दिया जाना या पार्टी के डैमेज कंट्रोल उपायों के साथ लीड बनाना समझा जा सकता है।
मेरे अंग्रेजी अखबारों में यह खबर सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस में लीड है। पांच कॉलम में इसका शीर्षक है, “आज मतदान है, होटल के कमरे में नकद मिलने के बाद भाजपा महासचिव तावडे के खिलाफ मामला दर्ज”। फ्लैग शीर्षक है, मुंबई के पास विरार के एक होटल में बीवीए कार्यकर्ताओं से घिरे। अब इस शीर्षक की तुलना नवोदय टाइम्स से कीजिये तो लगता है कि नवोदय टाइम्स की खबर मामले को रफा-दफा करने, हल्का बनाने के लिए लिखी गई है। मामला वही है, सूचनाएं वही हैं पर टेलीग्राफ और नवोदय टाइम्स की प्रस्तुति का अंतर देखिये। यह हिन्दी और अंग्रेजी का अंतर भी हो सकता है। मैं इसी अंतर को रेखांकित करना चाहता हूं। कई बार ऐसा अंतर अंग्रेजी-अंग्रेजी और हिन्दी-हिन्दी में भी होता है। इंडियन एक्सप्रेस ने उपशीर्षक में बताया है, तीन एफआईआर में नाम, उन्होंने आरोपों को खारिज किया, निष्पक्ष जांच की मांग की, विपक्ष ने भाजपा को निशाना बनाया। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर है। दो कॉलम की फोटो के साथ तीन कॉलम की इस खबर का शीर्षक है, “मतदान से पहले विवाद : वोट के लिए नकद के हंगामे में तावड़े”। खबर में लिखा है, तावड़े ने कुछ भी गलत करने से इनकार किया और पुलिस से सीसीटीवी की जांच करने और चुनाव आयोग से निष्पक्ष जांच कराने के लिए कहा। अब निष्पक्ष जांच तो कितने लंबित हैं उनकी गिनती नहीं है पर यहां खबर तो है।
आज की दूसरी बड़ी और महत्वपूर्ण खबर मणिपुर की है
नये सिरे से हिंसा शुरू होने और सहयोगी पार्टी के समर्थन वापस लेने के बाद वहां की स्थिति पर नजर रखना किसी के लिए भी महत्वपूर्ण और दिलचस्प है। द हिन्दू में आज छपी खबर के अनुसार, मुख्यमंत्री एन बिरेन सिंह ने बैठक में शामिल नहीं होने वाले मणिपुर के मंत्री समेत 11 विधायकों को नोटिस भेजा। यह बैठक राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति पर चर्चा के लिए बुलाई गई थी। नोटिस एनपीपी के विधायक को भी भेजा गया है जो भाजपा नेतृत्व वाली सरकार से समर्थन वापस लेने की घोषणा कर चुका है। इसमें दिलचस्प यह है कि एनपीपी ने अपने सात में से तीन विधायकों को नोटिस भेजकर पूछा है कि समर्थन वापस लेने के बावजूद वे बैठक में क्यों गये? इतना ही नहीं, एनपीपी ने यह आरोप भी लगाया है कि हमारे एक विधायक ने बैठक में हिस्सा नहीं लिया था पर उनके फर्जी दस्तखत से उन्हें बैठक में शामिल बताया गया है। जो भी हो, मणिपुर का मामला पहले ही सरकार के नियंत्रण से निकल चुका था। डबल इंजन की सरकार ने उसे कितनी योग्यता से हैंडल किया अब जग जाहिर है। आज इस खबर को भी उतना महत्व नहीं मिला है जितना मिलना चाहिये था। दिलचस्प यह भी है कि दि एशियन एज की खबर के अनुसार कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखकर मणिपुर को बचाने की अपील की है। उन्होंने यह पत्र राज्य में हो रही हत्याओं और आफस्पा के खिलाफ आंदोलन के आलोक में लिखा है। इसके बावजूद इस खबर को तो छोड़िये, ताजा हालात बताने वाली खबर भी ढूंढ़नी पड़ रही है।

कुछ अखबारों ने दिल्ली में प्रदूषण को महत्व दिया है
दि एशियन एज में पांच कॉलम में छपी खबर के अनुसार एक्यूआई अभी भी चिन्ताजनक, 488 है। कल मुझे पता चला कि दिल्ली में एक्यूआई 500 से कई गुना ज्यादा है पर इसे 500 के अंदर ही बताया जाता है। टाइम्स ऑफ इंडिया की इस खबर के अनुसार, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड एक्यूआई की निगरानी शून्य से 500 के पैमाने पर (ही) करता है। इसलिए दुनिया भर में दिल्ली में प्रदूषण के कारण एक्यूआई 1193, 1117, 1083, 1038, 1022 बताया जा रहा है तो भारत में इसे 500 के नीचे रखने की व्यवस्था कर ली गई है। इस संबंध में टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर का ये कतरन और दुनिया भर में रह रहे दिल्ली के बच्चों के व्हाट्सऐप्प ग्रुप में घूम रहा यह आंकड़ा देखने लायक है। कुल मिलाकर विदेशों में बदनामी से बचने का यह सरकारी उपाय गौरतलब है। यह छह लेन की एक किलोमीटर सड़क को छह किलोमीटर सड़क बनी कहने जैसी ईमानदारी है। बस जानकारी में होनी चाहिये। यहां यह भी बताना उचित होगा कि इन दिनों पैसे वालों और बीमार लोगों के घर में उपयोग की जाने वाली हवा साफ करने की मशीन में एक्यूआई का स्तर तीन अंकों में ही बताया जाता है और पिछले साल लोगों ने चर्चा की थी कि यह 999 से भी ज्यादा और चार अंकों में है। कल मुझे इस खबर और व्हाट्सऐप्प पर आये इस इंस्टाग्राम पोस्ट से नई जानकारी मिली।
प्रदूषण के बावजूद डीजल की गाड़ियां, मेट्रो का किराया बढ़ाना
कहने की जरूरत नहीं है कि दिल्ली में और देश के कई अन्य शहरों में प्रदूषण की समस्या आज से नहीं है। दिल्ली में प्रदूषण कम करने के लिए ही कई साल पहले अनलेडेड पेट्रोल की शुरुआत की गई और तब डीजल की गाड़ियां नहीं होती थीं और दिल्ली के पेट्रोल पंप पर डीजल आम तौर पर नहीं मिलते थे। तब यहां डीजल की बसें ही चलती थीं जो डीटीसी की होती थीं। डीटीसी की बसों में डीजल भरने की व्यवस्था डिपो में होती है। (ट्रकों का मुझे नहीं पता, उनके शहर में और भिन्न सड़कों पर प्रतिबंध का पता है)। इसका पता मुझे तब चला जब एक मांगी हुई गाड़ी का ‘पेट्रोल’ खत्म हो गया। तब मैं जनसत्ता में था और दफ्तर एक्सप्रेस बिल्डिंग में था। गाड़ी रुकी पुरानी दिल्ली स्टेशन से लौटते हुए दरियागंज में। मुझे पता था पास ही पेट्रोल पंप है। हमलोग धक्का लगाकर बहादुर शाह जफर मार्ग के पंप पर पहुंचे तो पता चला, वहां पेट्रोल नहीं मिलता था। उसके बाद दिल्ली में डीजल वाली गाड़ियां चलीं, भ्रष्टाचार हुआ, रेडलाइन बसें चलीं, सैकड़ों मौतें हुईं और जो ईमानदारी स्थापित करने के नाम पर सत्ता में या वह इमरजेंसी की बात करता रहा। दुनिया भर में चल रहे प्रयास और विकास से गाड़ियां तो अब इलेक्ट्रीक हो गई हैं, पुरानी चलाने पर प्रतिबंध है और विन्टेज कारों का शौक बेमतलब हो गया है लेकिन डीजल की कारें भी चल रही हैं, भले पेट्रोल वाले के 15 साल के मुकाबले 10 ही साल।

जो भी हो, सब सोच समझ कर किया गया होगा पर प्रदूषण कम नहीं हो रहा है, बढ़ा ही है। उसे कम करने बताने का तरीका अपना लिया गया है सो अलग। जब मैं नहीं जानता था तो आम लोग कितना जानते समझते होंगे इसपर मैं क्या कहूं। प्रदूषण पर राजनीति अपनी जगह है। मामला तो राष्ट्रीय है और कार्रवाई राष्ट्रीय स्तर पर ही करनी होगी। ऐसा कोई तरीका नहीं है कि डबल इंजन वाले वाले गाजियाबाद, नोएडा, फरीदाबाद, गुड़गांव में तो प्रदूशण रहे पर दिल्ली का कम हो जाये। इतने बड़े स्तर पर काम करने के लिए इच्छा शक्ति चाहिये जो मंदिर बनाने और मानसरोवर यात्रा कराने जैसा आसान नहीं है। इसलिए बात दिल्ली की होती है। पराली पंजाब में ही जलाई जाती है और प्रतिबंध के बावजूद पटाखे पूरे एनसीआर में समान रूप से चलते हैं क्योंकि रोकने वाले एक ही जगह से नियंत्रित हो रहे थे। ऐसे में प्रदूषण कभी कम होगा की उम्मीद ही बेमानी है।
कैलाश मानसरोवर यात्रा भी जल्द ही शुरू होने की संभावना
अखबारों की खबर पर नजर रहती है तो यह पता है कि आज दैनिक भास्कर में खास है, विदेश मंत्री जयशंकर और चीन के समकक्ष (शुद्ध अनुवाद है) वांग यी की मुलाकात में सहमति बनी है और रिश्तो में सुधार के तहत भारत-चीन के बीच सीधी उड़ान, कैलाश मानसरोवर यात्रा भी जल्द ही शुरू होने की संभावना है। खबर के लिहाज से इसमें कुछ अनुचित नहीं है पर दिल्ली ही नहीं देश भर में वायु प्रदूषण और जलवायु को लेकर दुनिया भर में चल रही चिन्ता के बीच भारत सरकार कैलाश मानसरोवर यात्रा शुरू करने के प्रयास कर रही है और यह खबर पहले पन्ने पर है। इसकी शुरुआत इस तरह है, “पूर्वी लद्दाख में एलएसी से सैनिकों की वापसी के बाद भारत-चीन के रिश्ते सुधार के नये स्तर पर हैं। ब्राजील में जी20 शिखर सम्मेलन से इतर भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने चीन के विदेश मंत्री वांग यी से मुलाकात की। इसमें दोनों देशों ने सीमा मुद्दे पर विशेष प्रतिनिधियों की बैठक बुलानेका निर्णय लिया है जो करीब पांच साल बाद होगी।” बगैर बैठक अगर दोनों देशों की सेना वापस हुई हैं तो बैठक के बाद क्या सब हो सकता है उसके अनुमान के लिहाज से यह निश्चित रूप से बड़ी खबर है। लेकिन हम जानते हैं भारत की सेना अपने स्थान से कभी बढ़ी नहीं थी (ऐसी कोई खबर नहीं है) चीन की सेना ने हमारी चौकी पर हमला कर सैनिकों को जरूर मारा था (ऐसी खबर रही है जिसके बाद प्रधानमंत्री ने कहा था, …. ना कोई घुसा हुआ है)। फिर भी अब यह प्रचार किया जा रहा है कि दोनों पीछे हटे। इसका मतलब है भारत अपनी जगह से पीछे हटा। दूसरी ओर चीन भले नहीं घुसा था पर पीछे गया है तो अब यही लगता है कि घुसा था अब वापस गया। पर भारत अगर पीछे हुआ है तो वास्तव में क्या हुआ है यह अखबारों ने नहीं बताया है। फिर भी सूत्रों की खबर और उसका प्रचार जारी है।
ऐसा प्रचार प्रधानमंत्री भी करते हैं और झारखंड में घुसपैठ की हवा बनाने में लगे रहे। इस संबंध में छापा भी पड़ा। आज इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के अनुसार झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भाजपा से पूछा है, घुसपैठिये कहां है? अभी तक कोई नहीं मिला है। मुख्यमंत्री के इस बयान के बाद प्रधानमंत्री के आरोप के असत्य होने की संभावना और बढ़ गई है लेकिन यह खबर अखबारों में नहीं है। इसकी जगह सरकारी खबर और झूठ (कम से कम अपुष्ट) आरोप खबर बनकर प्रमुखता पा रहे हैं। दूसरी ओर सरकार का विरोध करने वाले देश विरोधी ठहरा दिये जाते हैं जबकि देशहित के खिलाफ काम कर रही सरकार खुद को देशभक्त कहने की हिमाकर कर पा रही है। मेरा मानना है कि मीडिया के सहयोग के बिना यह संभव नहीं था।


