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सुख-दुख

‘जनसत्ता’ में जिसे छापने से मना किया उसकी पहली कहानी छपी तो सीधे ‘हंस’ में!

प्रमोद द्विवेदी-

माल के जिद्दी किस्सागो निकले ये भाईसाहब! नाम तो जान ही गए होंगे। प्रदीप श्रीवास्तव। खबरनवीसी में जवानी गुजार दिए, पर ठाने बइठे रहे कि कथाकार बनकर मनबै।

आज हंस में उनकी कहानी देखी- हैमलिन की एक रात…हम हैरान थे कि यह तो वही प्रदीप जी हैं जिनकी कहानी हमने जनसत्ता में यह कहकर ससम्मान रोक दी थी कि अभी वो बात नहीं। प्रदीप जी रिसिया गए और कहा भी आप सब अपने को बड़का साहित्य संपादक मानते हैं। हम अपनी कहानी छपवा कर दिखाएंगे…।

आज उन्होंने यह चैलेंज पूरा करके दिखाया और पहली कहानी छपी तो सीधे हंस में। उनसे बात भी हुई और माना कि जो हुआ सो ठीक हुआ।

अब बात कहानी की। सब जानते हैं कि हैमलिन दंतकथा या लोककथा का शहर है। चूहों और बांसुरी वाले की कहानी बचपन में सबने पढ़ी होगी। कथाकार उस जगह जाकर उसी लोककथा को मन में बसाए है। यहां उसके साथ एक विलायती लड़की है। अब कथा पुरुष और स्त्री संबंध पर आ टिकती है। कोई चौंकाने वाला मोड़ नहीं। बस एक दिन के आदिम सम्मिलन के बाद विदा लेते हुए क्लीआ नाम की सुंदरी कह जाती है- भविष्य को मुट्ठी में कैद कर लेने की बजाय क्षण को जीना सीखो…।

जाहिर है, कहानी कोई बड़ा संदेश देकर नहीं जाती। इसकी खूबसूरती है कि इसे एक बार पढ़ना शुरू करेंगे तो पूरा पढ़ जाएंगे। कहानी खुद ही गाइड बनकर आपको हैमलिन की सैर करा देती है। एक रिपोर्टर होने का कौशल दिखाते हुए प्रदीप जी ने बारीक वर्णन सहज भाषा में किए हैं।

अच्छा ही हुआ, रिपोर्टरई से पिंड छूटा। मन लागा किस्सागोई में।

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