
चंद्र भूषण-
भारत में अभी मौद्रिक नीति और बैंकिंग का जो हाल है, उसे देखते हुए अट्ठारहवीं सदी के फ्रांसीसी उद्यमी, बैंकर और राजा के मुंहलगे वित्तमंत्री जॉन लॉ की याद आती है, जिनके किए-धरे की सजा फ्रांस को किसी न किसी रूप में आज तीन सौ साल बाद भी भुगतनी पड़ रही है। बात सन 1717 की है। अमेरिका में माइनिंग और प्लांटेशन की अपार संभावना को देखते हुए फ्रांस के केंद्रीय बैंक के गवर्नर और वित्तमंत्री जॉन लॉ ने पैरिस में रजिस्ट्रेशन के साथ मिसीसिपी कंपनी की शुरुआत की।
यह कोई सरकारी कंपनी नहीं थी। पूरी तरह एक प्राइवेट वेंचर था। लेकिन इसे प्रचारित इसी रूप में किया गया कि इसे फ्रांस के तत्कालीन राजा लुई पंद्रहवें का वरदहस्त प्राप्त है। मिसीसिपी कंपनी का घोषित लक्ष्य था- ‘मिसीसिपी नदी के मुहाने पर न्यू ऑर्लियंस नाम के शहर की स्थापना और इस इलाके की प्राकृतिक संपदाओं का दोहन।’ फ्रांस के तत्कालीन सिक्के लिवर में इस कंपनी के शेयरों का प्रारंभिक मूल्य 500 लिवर प्रति शेयर के हिसाब से घोषित किया गया।
उस समय यूरोप में ब्रिटिश, स्पेनिश और डच कंपनियों द्वारा खड़े किए जा रहे व्यापारिक साम्राज्यों के चर्चे थे। खुद फ्रांसीसी कंपनियों ने भी दक्षिणी-पूर्वी एशिया के बड़े इलाके पर अपना शासन स्थापित कर लिया था और धुआंधार कमाई कर रही थीं। फ्रांसीसियों को लगा कि स्वयं राजा और वित्तमंत्री के प्रयासों से स्थापित की जा रही मिसीसिपी कंपनी उनके लिए भारी संपदा के दरवाजे खोल देगी। नतीजा यह हुआ कि सिर्फ डेढ़ साल के अंदर इस कंपनी के शेयर बीस गुनी से भी ज्यादा कीमत पर, यानी 10 हजार लिवर प्रति शेयर से भी ज्यादा महंगे बिकने लगे।
यहां तक कि कुछ लोगों ने अपना घर-बार बेचकर सारा पैसा इस कंपनी के शेयर खरीदने में लगा दिया। लेकिन फिर खबरें आनी शुरू हुईं कि अमेरिका के जिस इलाके में कंपनी अपना डेरा डाल रही है, वह बिल्कुल दलदली और अनुपजाऊ है और सोने-चांदी की खदानें मिलने की संभावना वहां दूर-दूर तक नहीं है।
इसके बाद के दस साल मिसीसिपी कंपनी के शेयरों की पाताल यात्रा, कंपनी के शेयर ऊपर चढ़ाने के लिए भारी मात्रा में नए नोटों की छपाई तथा वित्तमंत्री जॉन लॉ और राजा लुई पंद्रहवें के दिलासों के नाम रहे। लेकिन कंपनी के पास उस वक्त अमेरिका में कमाने के लिए कुछ था ही नहीं, सो सारा हाइप मिलकर भी मिसीसिपी कंपनी के शेयरों को ऊपर नहीं चढ़ा सका। नतीजा यह हुआ कि अंतत: यह कंपनी डूब गई और इसके साथ ही कागज के फालतू नोटों से भरे फ्रांस के सरकारी खजाने की साख भी हमेशा के लिए ध्वस्त हो गई।
लोग आज भी सवाल करते हैं कि आखिर वजह क्या थी जो फ्रांस से कम ताकतवर होते हुए भी ब्रिटेन की ईस्ट इंडिया कंपनी और फिर खुद ब्रिटिश राजसिंहासन ने भारत पर इतने समय तक राज किया, लेकिन फ्रांस की सत्ता यहां बड़े दायरे में शुरू होकर सिर्फ पुदुचेरी तक सिमट कर रह गई। दरअसल, इसमें भी काफी बड़ी भूमिका इन्हीं वित्तमंत्री और रिजर्व बैंक के गवर्नर जॉन लॉ साहब की थी।
अमेरिका में अपनी नाकामी छिपाने के लिए उन्होंने बहुत जगह हाथ मारा और हर जगह फायदे का ढिंढोरा पीटते हुए फ्रांस की साख को नुकसान पहुंचाया। भारत में क्लाइव के सामने टिकने के लिए डुप्ले को जिस धनबल की जरूरत थी, वह पैरिस से उसे कभी मयस्सर ही नहीं हुआ। नतीजा यह हुआ कि भारत में हर लिहाज से मजबूत होने के बावजूद उसे अंग्रेजों के हाथों पिट जाना पड़ा। इसका दूसरा पहलू यह रहा कि फ्रांसीसियों की मौजूदगी से अंग्रेजों के साथ सौदेबाजी की जो थोड़ी-बहुत ताकत भारतीय राजाओं के पास थी, वह भी जाती रही।
बताया जाता है कि लुई पंद्रहवें के पोते लुई सोलहवें ने 1789 में, यानी मिसीसिपी कंपनी की बर्बादी के कोई साठ साल बाद फ्रांसीसी संसद का आयोजन जॉन लॉ के तजुर्बे से पैदा हुई फ्रांसीसी खजाने की भरी देनदारी को नीचे लाने के लिए ही किया था, ताकि देश को दिवालिया होने से किसी तरह बचाया जा सके। सभी जानते हैं कि इस आयोजन की परिणति फ्रांस की राज्य क्रांति में हुई।
तब से लेकर आज तक फ्रांसीसी जनता अपनी हुकूमत को आर्थिक और मौद्रिक मामलों में बौड़म ही मानती आ रही है और थोड़े-थोड़े समय बाद किसी न किसी किस्म का उपद्रव इस देश की स्थायी नियति बना हुआ है।
जॉन लॉ वाले तजुर्बे से दुनिया ने राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के संचालन के लिए दो अहम निष्कर्ष निकाले। एक, किसी कारोबारी को देश की अर्थनीति की कमान तब तक न सौंपी जाए, जब तक वह शपथपूर्वक यह घोषित न करे कि राजनीतिक भूमिका में रहते हुए वह अपने कारोबार के साथ कोई सीधा रिश्ता नहीं रखेगा। और दूसरा यह कि कम से कम अहम फैसलों के स्तर पर देश के मौद्रिक ढांचे को उसके सरकारी ढांचे से, खासकर वित्त मंत्रालय की पहुंच से जितना हो सके, उतना दूर रखा जाए।
ज्यादा समय नहीं हुआ, जापान में केंद्रीय बैंक के एक गवर्नर को वहां की संसद ने ‘टू क्लोज टु ट्रेज़री’ (सरकारी खजाने अथवा सत्तापक्ष के कुछ ज्यादा ही करीब) कहकर इस पद से हटा दिया था। शक्तियों का यह विभाजन भारत में भी हाल-हाल तक बना हुआ था, लेकिन रघुराम राजन के अंतिम दिनों में यह मिटने लगा और उनके जाने के बाद से लगभग पूरी तरह मिट गया है। आज कोई नहीं जानता कि नोटबंदी के फैसले में रिजर्व बैंक के गवर्नर ऊर्जित पटेल की रत्ती भर भी भूमिका थी या नहीं।
निवर्तमान आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास इस पद पर आने तक भारत के वित्त सचिव थे, जबकि उनकी जगह ले रहे संजय मल्होत्रा सरकारी दायरे में उनसे नीचे के पद पर, राजस्व सचिव रहे। इन लोगों से अपेक्षा ही यही की जाती है कि ये सरकारी आदेशों का पालन पूरी मुस्तैदी से करेंगे। लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक की स्वायत्तता के अपहरण की यह प्रक्रिया वास्तविक के साथ-साथ प्रतीकात्मक रूप में भी कहां तक जाएगी, कहा नहीं जा सकता। बिल्कुल संभव है कि आने वाले वर्षों में इसके गवर्नर पद पर हम किसी शेयर ब्रोकर को विद्यमान देखें!
मौद्रिक नीति के निर्धारण के लिए जो कमेटी (एमपीसी) बनाई गई है, उसमें भी रिजर्व बैंक और सरकारी प्रतिनिधियों की भूमिका बराबर-बराबर की है। साथ में कुछ बड़े उद्योगपतियों का दखल भी देश की आर्थिक और मौद्रिक नीतियों के निर्धारण में बहुत ज्यादा बढ़ गया है। ऐसे में नोटबंदी और मुद्रा नीति के रिश्तों से जुड़ी कोई भी बात करते हुए फ्रांस के तीन सौ साल पुराने दोनों व्यक्तित्वों जॉन लॉ और लुई पंद्रहवें की एक याद तो बनती है।


