शीतल पी सिंह-
न्यूज़ लांड्री नामक पोर्टल ने एक बड़ी मेहनत से रिसर्च की गई फील्ड रिपोर्टिंग के ज़रिए बीते लोकसभा चुनावों में की गई तकनीकी बेईमानी का पर्दाफाश किया है।
उन्होंने तीन लोकसभा सीटों का सैंपल आकलन किया। इनमें से एक मेरठ में BJP बहुत थोड़े मार्जिन (क़रीब दस हज़ार)से जीती थी, इसके दो बूथों पर 27% फ़र्ज़ी वोटर पाए गये। चुनाव से पहले यहाँ के 61,365 मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए थे और क़रीब एक लाख नये मतदाताओं को मतदाता सूची में शामिल किया गया था।
आपको कभी पता भी चलता है कि आपके आस पास कौन वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने कटवाने में सक्रिय रहता है? यहाँ RSS और BJP के सांगठनिक लोग हर चुनाव से पहले हर जगह इस काम को बड़ी गंभीरता से हर बार करते पाये जाते हैं। बाक़ी सारे दल जो विपक्ष में हैं वे सिर्फ़ सोशल मीडिया पर शेखियां बघारते मिलते हैं और हार जाते ही ईवीएम पर ठीकरा फोड़ कर संतुष्ट हो जाते हैं।
दरअसल बीजेपी/RSS एक बहुत बड़ी चुनावी मशीनरी में बदल चुकी है। जो असाधारण रूप से साधन संपन्न है और उनके पास केंद्रीय सरकार है जो किसी भी क़िस्म के नैतिक आवरण से अप्रभावित है। चुनाव आयोग उनका है जो उन्हीं की राय से चुनाव कार्यक्रम की तारीख़ों का ऐलान करता है। उनके कार्यकर्ता इस जानकारी से पहले से लैस होते हैं और वे अपने वोटर बढ़वाने और विपक्षी वोटरों के नाम कटवाने का दौर पूरा करते हैं। औसतन हर विधानसभा में पचास हज़ार मतदाताओं का लक्ष्य होता है जिसमें दस बीस फ़ीसदी की कमी बेसी हो भी जाए तो भी प्रत्येक विधानसभा में बीजेपी औसतन पच्चीस हज़ार वोट के साथ बढ़त हासिल करने की सहूलियत से चुनाव मैदान में उतरती है।
मतदान केंद्रों पर कर्मचारियों की नियुक्ति आदि में कर्मचारियों की जाति /धर्म की भूमिका को वरीयता यही चुनावी मशीन दिलाती है। अगर पंद्रह बीस फ़ीसदी मतदान केंद्र भी कंप्रोमाइज हो सके तो यहाँ बूथ स्तर की धांधली कर ली जाती है। विपक्षी मतदाताओं से अतिरिक्त पूछताछ करना, तमाम को इस या उस बहाने से लौटा देना। स्त्रियों के मतदान में हस्तक्षेप करना, अपने फ़र्ज़ी मतदाताओं से कई बार मतदान करवा लेना आदि प्रक्रियाएं इसी श्रेणी में आती हैं।
मतदान केंद्रों पर विपक्षी दलों के एजेंटों की नियुक्ति में भी यह मशीन पैसे या प्रशासनिक डर से कई बार हस्तक्षेप कर लेती है और कई बूथ ऐसे होते हैं जहां मतदान केंद्रों के विपक्षी एजेंट तक असल में बीजेपी के ही होते हैं। ऐसे बूथों पर मनमर्जी का मतदान दर्ज करवा लिया जाता है। अनेक जगहों पर विपक्षी दलों के लोग भी यही सब कर लेते हैं परन्तु उसका प्रतिशत कम होता है। हाँ उन राज्यों में जैसे बंगाल आदि में इस मामले में बराबरी का मुक़ाबला होता है जो नतीजों में भी झलकता है।
विपक्षी राजनीतिक दलों में चुनाव की संपूर्ण प्रक्रिया को लेकर 24x7x365 न वैसी गंभीरता दिखाई देती है न सांगठनिक क्षमता जैसी RSS/BJP में है। सिर्फ़ चुनाव के वक़्त जाति धर्म धन बाहुबल के आधार पर करोड़पतियों में टिकट बांट देना (कई बार पैसे लेकर) और ट्विटर जो अब X हो गया है पर पेड कर्मचारियों से ट्वीट झाड़ने वाली राजनीति के दिन ख़त्म हो चुके हैं!


