रवीश कुमार-
फ्रंटलाइन के चालीस साल हो गए हैं। इस अवसर पर पत्रिका ने एक विशेषांक निकाला है। इस अंक में श्रम और वास्तविक मज़दूरी पर सुधा भारद्वाज का एक लेख है। इस लेख के पाठक भले अलग लोग हैं लेकिन जिनके बारे में लिखा है उन्हीं से आपका शहर भरा-भरा लगता है। जहां आप भीड़ देखते हैं वो इन्हीं मज़दूरी की होती है जो कई साल से कई घंटे काम करने के बाद भी बेहद कम कमाते हैं।

हमें यह भी नहीं पता कि उन्हें इस बात से फर्क पड़ता है या नहीं कि वास्तविक मज़दूरी बढ़ने की दर काफी कम है। वे अपने जीवन की आर्थिक तकलीफों के बारे में क्या सोचते हैं और किसे ज़िम्मेदार मानते हैं।
छत्तीसगढ़ में भिलाई स्टील प्लांट में 1962 में 92,000 स्थायी कर्मचारी काम करते थे। आज यह संख्या घटकर 12000 रह गई है। जबकि 50,000 कर्मचारी कांट्रेक्ट पर हैं। कांट्रेक्ट पर होने का मतलब है कि आपको सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलती है, अच्छा वेतन नहीं मिलता है। काम करने वालों की मज़दूरी भी कम बढ़ती है।
सबसे बड़ी बात है कि अपनी आवाज़ उठाने के लिए मज़दूर संगठित नहीं हो सकते। इसके अलावा अब काम करने की प्रकृति बदल रही है। संगठित होने को ज़रूरी है कि कामगार एक जगह पर काम करें।
होम डिलीवरी, ओला, उबर के चालकों को संगठित नहीं किया जा सकता है। आज आप ओला उबर चालकों से बात कीजिए। बताएंगे कि उनकी कमाई कितनी कम हो गई है। इसका अंदाज़ा ओला उबर की खराब कारों से भी मिल जाता है। गाड़ियां खटारा नज़र आने लगी हैं। भारत की राजधानी की सड़कों पर आर्थिक अवसान के ये दृश्य आपको दिख जाते हैं।
सुधा भारद्वाज बता रही है कि कांट्रेक्ट की नौकरी और संगठित न होने के कारण आज मज़दूरों के पास मोल भाव करने की शक्ति चली गई है। वे धर्म का झंडा उठाकर जितने नारे लगा लें लेकिन वे इसके दम पर अपनी सैलरी नहीं बढ़वा सकते हैं।
सुधा लिखती हैं कि अगर आप वियतनाम से तुलना करें तो 2015-18 के बीच वहां वास्तविक मज़दूरी 3.7 फ़ीसद से बढ़ कर 12.4 फ़ीसद थी तो भारत में 2.5 फ़ीसद से 2.8 प्रतिशत के बीच रही। जबकि भारत में काम करने वालों का 83 फ़ीसद हिस्सा असंगठित क्षेत्र में काम करता है।
इंडियन एक्सप्रेस में छपे एक अन्य लेख में इसका ज़िक्र मिला कि भारत में प्रति व्यक्ति आय 2700 डॉलर सालाना है जबकि वियतमान में 4980 है।
दिसंबर महीने में इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट आई थी। इसके अनुसार प्राइवेट सेक्टर का मुनाफा पंद्रह साल में सबसे अधिक है लेकिन इसमें काम करने वाले कर्मचारियों की सैलरी में बढ़ोत्तरी नहीं हो रही है। उसमें ठहराव आ गया है।
2019 से 2023 के बीच छह सेक्टर की तीन हज़ार से अधिक कंपनियों में काम करने वाले लोगों की सैलरी में 0.8 फ़ीसद की वृद्धि हुई है।
आज के हिन्दू बिज़नेस लाइन में एक ख़बर है। अगर आप तीस दिन पहले हवाई जहाज़ का टिकट कटाते हैं और वही टिकट यात्रा के करीब कटाते हैं तो कीमत बढ़ जाती है। पिछले साल की तुलना में इस बार 50 फीसद तक बढ़ चुकी है। दिल्ली श्रीनगर का टिकट तीस दिन पहले कटाने पर 7782 रुपया था और तीन दिन पहले कटाने पर 12,292 रुपया है।
हवाई चप्पल पहनने वाला किस जेब से टिकट के पैसे देता होगा आप सोच ही सकते हैं।
इन सभी रिपोर्ट को मिलाकर देखने से पता चलता है कि भारतीयों की आर्थिक हालत ठीक नहीं है। बाकी धर्म के नाम पर दूसरे धर्म के लोगों के त्योहारों में घुस कर भजन कर चिढ़ाने का कार्यक्रम जारी है। गांधी की प्रार्थना अब रुकवा दी जाने लगी है। हम इन मामलों में काफी तरक्की कर रहे हैं।


