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फ्री स्पीच की सिकुड़ती जगह!

रंगनाथ सिंह-

हार्वर्ड इंटरनेशनल रिव्यु (Harvard International Review) में एक 28 वर्षीय भारतीय युवती का लेख छपा। संपादकों ने बाहरी दबाव के बाद लेखक से लेख में बदलाव करने के लिए कहा। लेखिका ने बदलाव करने से मना कर दिया। संपादकों ने कहा कि जब तक वह बदलाव नहीं कर देती तब तक लेख नहीं छपेगा!

जाहिर है कि ये बदलाव संपादकों द्वारा नहीं कराया जा रहा था बल्कि किसी बाहरी शक्ति की माँग पर कराया जा रहा था! अगर इस लेख को संपादकों ने खारिज किया होता तो समझ में आता कि लेख संपादकीय नीति के अनुरूप नहीं है इसलिए नहीं छपा। संपादकों द्वारा स्वीकृत करने के बाद छपे लेख को बाहरी दबाव में दुबारा लिखवाना या हटवाना अलग मसला है।

इसी हफ्ते वाशिंगटन पोस्ट के मालिक जेफ बेजोस ने भी अखबार के ओपिनयन सेक्शन को सैनिटाइज करने की घोषणा की। अखबार मालिक का हक है कि वो जिसे चाहे उसे संपादक रखे मगर बेजोस जी ने जो तर्क दिया है वह अस्वीकार्य है। बेजोस जी का तर्क है कि अब से वो केवल फ्री स्पीच और फ्री मार्केट के समर्थन वाले पीस पर जोर देंगे! ऊपर से सुनने में यह भला लगता है मगर वाशिंगटन पोस्ट पहले एक तरह के विचारों को जगह नहीं देता था और अब शायद दूसरे तरह के विचारों को जगह नहीं देने की तरफ बढ़ रहा है!

लिबरल ईकोसिस्टम की बुनियाद फ्री स्पीच पर खड़ी हुई थी। भारत में भी रूसो-वोल्टेयर-दीदेरो इत्यादि का नाम फ्री स्पीच के ज्वलंत स्तम्भ के तौर पर रटाया जाता है। मगर इसी लिबरल ईकोसिस्टम ने आइडेंटिटी की आड़ में फ्री स्पीच के रास्ते में एक के बाद एक ब्रेकर खड़े किये और आज यह हालत है कि आइडेंटिटी पॉलिटिक्स फ्री स्पीच की राह में सबसे बड़ा रोड़ा बन चुकी है।

इस प्रवृत्ति का साइड-इफेक्ट ये भी हुआ कि कुछ समूहों की रिग्रेसिव प्रैक्टिस को आलोचना से छूट दी जाने लगी तो देर-सबेर वही छूट दूसरे समूह अपनी रिग्रेसिव प्रैक्टिस के लिए भी माँगने लगे। बहुत सारे प्रतिगामी विचारों के बचाव में आज यही दलील दी जाती है कि जब यह छूट बबलू को मिल सकती है तो हमें क्यों नहीं! लिबरल बुद्धिजीवियों के पास इस दलील का कोई माकूल जवाब नहीं है।

अगर लिबरल बौद्धिक वर्ग ने इस समस्या का समाधान निकालने में देरी की तो दुनिया वापस से उसी दौर में पहुँच जाएगी, नवाजगरण या प्रबोधन युग में जहाँ से निकलने का दावा करती है। फिर फ्री स्पीच कहीं फ्री नहीं रहेगी।

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