
वैभव अग्रवाल-
यूक्रेन-रूस युद्ध की कहानी जितनी लंबी है, उतनी ही कड़वी सच्चाई इससे जुड़ी है। लेकिन अफसोस, आज भी लोग सिर्फ वही देख रहे हैं जो उन्हें सोशल मीडिया पर परोसा जा रहा है। किसी के लिए जेलेंस्की हीरो है , किसी के लिए ट्रंप .. पर अगर आप निष्पक्ष दृष्टि रखते है, तभी आगे पढ़े।
रूसी हमला गलत था। यूक्रेन को आत्मरक्षा का अधिकार था। यह तो सीधी बात है। .. लेकिन क्या कोई इस पर चर्चा कर रहा है कि यूक्रेन के अल्ट्रा-नेशनलिस्ट ग्रुप्स ने सालों तक डोनबास और अन्य रूसी-भाषी इलाकों में क्या किया? क्यों नाटो और अमेरिका ने इसे रोकने के बजाय आग में घी डालने का काम किया? .. जिधर कई बार रूस ने समझौते तोड़े, तो खुद कई बार रूस के साथ भी पश्चिमी देशों द्वारा, नाटो का विस्तार कर , वादाखिलाफी की गई।
युद्ध रोकने के प्रयास भी न के बराबर हुए। अमेरिका और यूरोप के देश, और खुद यूक्रेन के जेलेंस्की इसे टाल सकते थे, लेकिन उन्होंने उल्टा बयानबाजी से माहौल और भड़काया, जिससे पुतिन को हमला करने का और बहाना मिल गया।
युद्ध से सबसे ज्यादा फायदा किसे हुआ?
अमेरिका: रूस को कमजोर कर दिया, यूरोप को और कमजोर कर दिया, नाटो को अपने पिंजरे में कैद कर दिया।.. कुल मिला अपनी स्थिति और बेहतर कर ली।
रूस: झटका खाया लेकिन अभी भी खड़ा है। पर आर्थिक प्रतिबंधों के चलते हालात लचर है।
यूरोप: पहले से आर्थिक रूप से संघर्ष कर रहे ब्रिटेन और यूरोपियन यूनियन की हालत और बिगड़ गई।
यूक्रेन: अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा हो गया!
अब नाटो में शामिल, यूरोपीय देश, नाटो के भरोसे ना बैठ, अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने पर मजबूर होंगे, जिससे उनका आर्थिक विकास और प्रभावित होगा।
जहां तक जेलेंस्की की बात है, वो पूरी तरीके से कूटनीति में फेल हुए। उन्होंने यह सोच पुतिन को भड़काया, की नाटो उनके साथ युद्ध लड़ेगा, लेकिन नाटो ने हाथ खींच लिया, अपनी सेनाएं ना दे, केवल हथियार और वित्तीय सहायता दी।
पूरा यूरोप कितना भी, जेलेंस्की के साथ आ जाए, बिना अमेरिकी मदद के रूस को हराना असंभव है, इसलिए जेलेंस्की ने ट्रंप जैसे नेता को भड़काने की जो गलती की, जो भविष्य में भारी पड़ सकती है। जेलेंस्की को अमेरिका में मीटिंग के दौरान डिप्लोमेसी पर ध्यान देना चाहिए था।
कुल मिलाकर, यह युद्ध कई स्तरों पर कूटनीतिक विफलता का उदाहरण है। रूस ने आक्रमण कर गलती की, यूक्रेन ने संतुलित रणनीति नहीं अपनाई, और अमेरिका-यूरोप ने इसे रोकने के बजाय और भड़काया। नतीजा यह हुआ कि रूस, यूक्रेन और यूरोप सभी को नुकसान हुआ, जबकि अमेरिका और मजबूत हो गया।
इससे सीख यही मिलती है कि युद्ध की बजाय कूटनीति को प्राथमिकता दी जानी चाहिए और बड़ी ताकतों के प्रभाव में आने से बचना चाहिए।
प्रशांत टंडन-
जेडी वेंस – जेलेंस्की सेमी फाइनल 15 फरवरी को म्यूनिख सिक्युरिटी कांफ्रेंस में हो चुका था. जो ओवल ऑफिस में हुआ उसके बाद जेडी वेंस की लोकप्रियता रिपब्लिकन समर्थकों में बढ़ी है. चुनाव से पहले रिपब्लिकन डिप्लोमेसी कन्वेन्शन में वेंस उक्रेन को अमेरिकी फंडिंग का विरोध कर चुके थे.
ट्रंप पुतिन की साइड में खड़े क्यों दिखाई दे रहे हैं? रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद 1000 से भी ज़्यादा अमेरिकी कंपनियों ने या तो रूस में अपना कारोबार समेट लिया या बहुत ज़्यादा स्केल डाउन कर लिया. अमेरिकी कंपनियां फिर से रूस में व्यापार बढ़ाना चाहती हैं. ट्रंप इसके लिये रास्ता बना रहे हैं.
अमेरिकी ब्यूरोक्रेसी और मीडिया अभी भी सोवियत रूस से कोल्ड वॉर के साये से बाहर नहीं निकल पाये हैं. लेकिन ट्रंप ने चुनाव अभियान के दौरान ही कम से रिपब्लिकन समर्थकों को रूस और पुतिन के प्रति पूर्वाग्रह से बाहर निकाल लिया था. उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की इसमे बड़ी भूमिका रही है. उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान ही साफ़ कर दिया था कि यूक्रेन को आर्थिक मदद बंद करनी चाहिये.
सोशल मीडिया और मीडिया जो भी कहे ओवल ऑफिस में जो हुआ उससे ट्रंप और वेंस की अपने समर्थकों में लोकप्रियता बढ़ी है.
धीमे धीमे साफ़ हो रहा है कि रिपब्लिकन पार्टी में जेडी वेंस की ट्रंप के उत्तराधिकारी बनेगे.
ट्रम्प का ये आखिरी टर्म में और अगले राष्ट्रपति के रिपब्लिकन उम्मीदवार के लिए जेडी वेंस मज़बूत दावेदारी पेश करेंगे. ट्रंप का समर्थन तो होगा ही.



Avinash
March 11, 2025 at 12:01 pm
Yes yes you are right