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फ्रैंक हुजूर : एक निष्कपट साथी और निडर लेखक को उदास मन से सलाम!

ओम शंकर-

एक निडर लेखक, एक संवेदनशील योद्धा, फ्रैंक हुजूर को भावभीनी श्रद्धांजलि और आखिरी सलाम

आज हृदय भारी है, मन शोकाकुल है। फ्रैंक हुजूर—एक अद्वितीय पत्रकार, लेखक, नाटककार और समाजसेवी—अब इस दुनिया में नहीं रहे। उनका असमय निधन केवल साहित्य और पत्रकारिता जगत की अपूरणीय क्षति नहीं है, बल्कि उन सभी के लिए एक गहरी पीड़ा है, जिन्होंने उन्हें व्यक्तिगत रूप से जाना और उनके विचारों से प्रेरणा ली।

फ्रैंक हुजूर से मेरी पहली मुलाकात 2014 की गर्मियों में लखनऊ में उनके निवास पर हुई थी, एक सामान्य मित्र के माध्यम से। लोग उन्हें इमरान खान और मुलायम सिंह की जीवनी लिखने के लिए जानते थे, लेकिन मुझे उनके प्रति आकर्षण उनके साहित्यिक योगदान के साथ-साथ उनकी बिल्लियों के प्रति अगाध प्रेम ने भी किया। उनके घर में 60-70 हर प्रकार की सुंदर – सुंदर बिल्लियाँ थीं, जिन्हें वो अपना परिवार मानते थे। जब आप उनके घर जाते तो आपको अनुभूति होती कि शायद आप बिल्लियों के देश में आ गए हैं, जिनके वो दयालु सम्राट थे।

जिसदिन उनको लखनऊ स्थित उनके बंगले से जबरन निकाला गया था, और उनके बिल्लियों के आशियाने को सरकारी तंत्रों द्वारा उजाड़ा गया था, वो काफी उदास थे और बहुत रोया था। क्योंकि इससे उनकी कई बिल्लियां उनसे बिछड़ गई थीं और एक – आध की तो सड़क दुर्घटना में मौत भी हो गई थी।

वे न केवल भारत के सबसे बड़े “कैट लवर” थे, बल्कि समाज के हाशिए पर खड़े लोगों के प्रति भी उनका प्रेम और संवेदनशीलता अद्वितीय थी।

पहली बार जब मैं उनसे मिलने उनके घर पहुँचा, तब वे अपनी पुस्तक Hitler in Love with Madonna लिखने में मग्न थे। उनका व्यक्तित्व बड़ा हीं आकर्षक था। ब्रिटिश शैली का सूट, उनके बाएँ हाथ में सिगार, और दाएँ हाथ में कलम—किसी युगांतरकारी विचारक की छवि प्रस्तुत कर रहे थे।

वे सिर्फ एक लेखक नहीं थे, बल्कि एक विचारक, एक स्वप्नद्रष्टा, और सामाजिक न्याय के लिए लड़ने वाले योद्धा थे। उनकी शख्सियत में राजसी ठहराव जरूर था, लेकिन उनके विचारों में समाज की पीड़ा और संघर्ष की ज्वाला जलती थी।

फ्रैंक का जीवन संघर्षों से भरा था। अपार प्रतिभा के बावजूद, जीवन ने उनके साथ कई बार अन्याय किया। एक करीबी मित्र, जिसके आग्रह पर वो लंदन छोड़कर लखनऊ बसने आए थे, उनके द्वारा किए विश्वासघात ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया था, और वे कभी पूरी तरह से इस घाव से उबर नहीं पाए। यही पीड़ा शायद उनके मौत का कारण भी बना।

वे अदम्य साहस के धनी थे, लेकिन उन्होंने जिन आंतरिक लड़ाइयों का सामना किया—चाहे व्यक्तिगत हो या सामाजिक— वो द्वंद और उनका प्रभाव उनके Hitler in Love with Madonna

जैसे लेखनों और विचारों में साफ झलकता था। उनका निधन एक ऐसी त्रासदी है, जो साहित्य और समाज दोनों के लिए एक अपूर्णनीय क्षति है।

मुझे हमेशा यह महसूस हुआ कि उनका संघर्ष केवल व्यक्तिगत नहीं था, बल्कि सामाजिक संरचना की उन दीवारों से भी था, जो आज भी वंचित और हाशिए पर खड़े लोगों को आगे बढ़ने से रोकती हैं। शायद इसलिए भी, क्योंकि वे उस विशेषाधिकार प्राप्त उच्च जातीय वर्ग से नहीं आते थे, जो आज भी भारतीय पत्रकारिता और साहित्य के बड़े हिस्से पर हावी है। वे एक स्वनिर्मित व्यक्ति थे, जिन्होंने कभी सत्ता और अन्याय के सामने सिर नहीं झुकाया।

फ्रैंक हुजूर अपने पीछे एक युवा, सुंदर पत्नी मुक्ता सिंह और एक मासूम पुत्र, मार्कोस को छोड़ गए हैं। उनके परिवार पर जो दुःख का पहाड़ टूटा है, उसे शब्दों में व्यक्त करना मेरे लिए असंभव है। मैं प्रकृति से प्रार्थना करता हूँ कि उन्हें इस अपार कष्ट को सहन करने की शक्ति मिले।

आज हमने सिर्फ एक लेखक नहीं, बल्कि एक क्रांतिकारी विचारक, एक सच्चाई का पैरोकार, और पिछड़े-दलित-शोषितों की आवाज़ खो दी है। वे इस देश के वंचितों की तकदीर बदल सकते थे। उनके शब्दों में क्रांति की शक्ति थी, उनकी लेखनी में अन्याय को चुनौती देने का साहस था, और उनके विचारों में समाज को नई दिशा देने की क्षमता थी, जो आज के समय में बहुत कम लोगों के पास है। लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था।

आज मैं स्तब्ध हूँ, हतप्रभ हूँ। यह दुनिया अब पहले जैसी नहीं रही। उनकी अनुपस्थिति एक ऐसा खालीपन छोड़ गई है, जिसे कोई भर नहीं सकता। जहाँ पहले उनके शब्दों की आंधी थी, वहाँ अब एक अटूट सन्नाटा है।

फ्रैंक हुजूर, आप सदा अमर रहेंगे। आपकी लेखनी, आपकी संवेदनाएँ, और आपके सपने इस दुनिया में हमेशा जीवित रहेंगे। आप शांति से विश्राम करें, फ्रैंक साहब।


डॉ जयंत जिज्ञासु-

भाई फ़्रैंक हुज़ूर जी नहीं रहे! हृदयाघात से उनका आकस्मिक निधन हो गया। यह बहुत त्रासद है! एक प्रतिभासंपन्न साथी और ईमानदार मित्र को खोना थोड़ा और खाली होने जैसा है। इस अतिशय कोलाहल से भरी आसपास की दुनिया में यही जाना कि मित्रता की एक कसौटी यह भी है कि आपकी अनुपस्थिति में आपको लेकर मित्र कैसी बातें सुनते हैं और करते हैं। अन्य साथियों के ज़रिए ही अक़्सर मालूम हुआ कि वे जिनसे जुड़े रहते थे, उन्हें प्रसन्न और ऊंचाई पर देखना चाहते थे। एक ऐसे दोस्त जो हर परिस्थिति में दोस्ती निभाते थे। पर, उनके हाथ में यश नहीं था या कि कम था कि जो उनसे मदद पाए लोग थे, उनमें से बहुतेरे भस्मासुर निकले और उनके ही विरुद्ध षड्यंत्र में शामिल होते गये। समय रहते वे “विषकुम्भम पयोमुखं” से स्वयं की रक्षा नहीं कर पाए। ऐसे में सहज जीवन जीना सहल नहीं रह जाता! जब बहुत अपने से आप छले जाते हैं, तो क्षण-क्षण अंदर ही अंदर अस्तित्व का क्षय होता रहता है!

सोशलिस्ट फ़ैक्टर नामक मैग्ज़ीन के संपादक के साथ-साथ वे इमरान वर्सेस इमरान (जीवनी), हिटलर इन लव विद मैडोना (नाटक), सोहो: जिस्म से रूह का सफ़र (संस्मरण), द टीपू स्टोरी (जीवनी), द सोशलिस्ट मुलायम सिंह यादव (जीवनी), आदि के लेखक रहे।

इंसान चला जाता है, सारी नाराज़गी उस व्यक्ति के साथ ही ख़त्म हो जाती है, उनके जाने के बाद आप किससे नाराज़ होंगे! हम इस बात को समझ लें कि अमृत पीकर हम नहीं आए हैं, एक रोज़ सबको जाना है और उसकी कोई मुनादी नहीं होगी, तो यह अगली ईगो हम छोड़ सकें! किसी मनुष्य से आप ग़लती करने की मानवीय वृत्ति भी छीन लेंगे? कोई बड़े हैं चाहे उम्र से या अनुभव से या शक्ति से, तो उन्हें और विनयशील व उदारहृदय होना चाहिए, बड़प्पन दिखाना चाहिए व सम्वाद के लिए पहल करनी चाहिए। पर, ऐसा हो नहीं पाता, यही विडम्बना है! जिन्हें हम बहुत मानते हैं, उनसे गुस्सा भी हम उतना ही ज़्यादा होते हैं। पर, इतना याद रहे कि हमारे बीच से कोई भी कभी भी जा सकता है, और अफ़सोस के सिवा कुछ नहीं शेष रह जाएगा और हमारा अफ़सोस देखने के लिए भी वह आदमी नहीं होगा हमारे सामने तो फिर ग्लानि ही बचेगी हमारे हिस्से!

लग जाते हम गले प किसे कौन टोकता
अपनी अना का ख़ून कोई दिल्लगी नहीं।

एक नेता हर दल के नेताओं से मिलता है शिष्टाचारवश, और उसे यह कहते हुए न्यायोचित ठहराता है कि सार्वजनिक जीवन में हमें अपने बड़ों से मिली सीख का पालन करना चाहिए कि विचारधारात्मक विरोध का अर्थ सामने वाले को दुश्मन समझना नहीं है। पर, उसी दल का एक साधारण कार्यकर्ता अगर भिन्न दल के कार्यकर्ता या नेता से सौजन्यतावश मिलता है तो उसकी पूरी प्रतिबद्धता व वफ़ादारी संदिग्ध होने लगती है। निष्ठा बहुधा नेता की नज़र में संदिग्ध नहीं होती है, बल्कि ठकुरसुहाती करने वाले मेडियोकर व छिछले लोग उस नेता को अपने ही कार्यकर्ता को लेकर असुरक्षित महसूस कराने के लिजलिजे काम में संलिप्त हो जाते हैं। जहां ऐसा टॉक्सिक वातावरण बना दिया जाए, वहां सच्चे अर्थों में जो लोग पार्टी हित में काम करते हैं, उनका जीना दूभर हो जाए।

एक परिपाटी फिर से बने कि राजनैतिक दलों के लिए काम करने वाले भले लोग संविधान प्रदत्त अपने मौलिक अधिकारों को निलम्बित करने का अधिकार किसी भी ताक़तवर से ताक़तवर व्यक्ति को न दे ताकि वह सहज रह कर काम कर सके और उसका वाग्स्वातंत्र्य, असहमत होने का हक़ व सहमत होने का विवेक भी स्वाभिमान के साथ बहाल रह सके! अंततः, संवाद ही लोकतंत्र की प्राणवायु है।

पिछले कुछेक वर्षों से फ़्रैंक हुज़ूर जी अपने वृहत् सोशल सर्कल से थोड़े अलग-थलग से दिखाई पड़ते थे। और, यह कहीं-न-कहीं उन्हें अंदर से कमज़ोर कर रहा था। वे अपनी पुरानी दुनिया में लौट कर भी आत्मावलोकन करते रहते थे। इतना ही कह सकता हूं कि वे एक भले आदमी थे जो भस्मासुरों के शिकार हो गये और संवादहीनता के चलते अपने प्रिय व्यक्ति जिनकी वे इज़्ज़त भी करते थे और जिनसे नाराज़ भी होते थे (यह हक़ भी उन्हें उनके प्रिय व्यक्ति ने ही कभी दिया था); से दूर होते चले गए! उनके प्रिय व्यक्ति भी कोमल मन के इंसान हैं और उन्हें अभी जो कुछ महसूस हो रहा होगा, उसकी कल्पना कोई नहीं कर सकता!

हम सब बहुत वलनीरेबल हैं, कोई भी वलनीरेबल हो सकता है। वलनीरेबिलिटी चेरिश करने की चीज़ भले न हो, उसकी रिस्पेक्ट तो की ही जानी चाहिए।

भाभी मुक्ता जी, इस वेदना में हमें शरीक़ समझें! इस वज्रपात को सहने की किसी तरह शक्ति मिले! एक निष्कपट साथी को उदास मन से सलाम!


आसमोहम्मद कैफ-

फ्रेंक नही है अब, उनकी किताब पढ़ना बस !

2016-17 के दिनों में फ्रैंक हुजूर से मेरी मुलाकात हुई थी! वो लखनऊ रहते थे और एक पत्रिका चलाते थे, मैं उन दिनों एक दैनिक उर्दू अखबार में स्थानीय संपादक था। मुझे लखनऊ के एक मित्र शान ने मिलवाया था, फ्रेंक दिलचस्प इंसान थे। मेरी पट गई! इनकी पत्नी मुक्ता सिंह अभिनेत्री थी, इनका घर बिल्लियों और किताबों से भरा रहता था, मेरा ज्यादातर वक़्त इनके साथ ही गुजरने लगा। हम दोस्त बन गए! साथ में क्रिकेट खेलते थे, यह तस्वीर मेरी ही क्लिक की हुई है, इन्होंने कई अच्छी किताबें लिखी! पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की जीवनी भी, यूपी में खूब पढ़ी गई ‘टीपू स्टोरी’ भी!

अखिलेश यादव की सरकार ने भी इन्हें आगे बढ़ाया, मदद की। बाद में इनकी अखिलेश यादव के कुछ करीबियों से ठन गई, सामाजिक न्याय के शुद्ध सिपाही थे, मूल नाम मनोज यादव था! राहुल गांधी से नजदीकी हो रही थी, सामाजिक न्याय के लिए काम कर रहे थे। राहुल गांधी से मिलने दिल्ली आए थे, लौट कर गए तो हल्का दर्द बताया, प्रोफेसर रतनलाल और अनिल जयहिंद ने जैसे साथियों ने डॉक्टर को दिखाने के लिए कहा तो कहने लगे कि लखनऊ जाकर दिखाता हूँ! हल्का सा दर्द हुआ, और एक महत्वपूर्ण व्यक्ति हमें छोड़ गया!

फ्रेंक हुजूर आजकल खराब आर्थिक स्थिति से जूझ रहे थे, सरकार बदली तो उनको आवंटित घर भी बदल गया था। पैसे नही थे इसलिए पत्रिका बंद हो गई थी, इसमें कोई शक नही कि विद्वान व्यक्ति थे, सामाजिक न्याय की विचारधारा से समझौता नही किया! दुःख की बात यह है कि जब भी आजकल बात करते थे तो अपनी तकलीफ के बारे में बताते थे, जिसमें आर्थिक समस्या सबसे बड़ी थी! अपनी बिल्लियों के बारे में काफी चिंतित रहते थे, उन्हें इस बात का दुःख था कि वो कभी अपना घर नही बना पाए! अब उनकी बातचीत में निराशा होती थी, फ्रेंक टूट गए थे! इसलिए दुनिया से रूठ गए!

तकलीफ़ तो है, मगर सोचना का मक़ाम भी है, आखिर कोई कब तक झेल पाएगा! विचारों की लड़ाई के सभी योद्धा ऐसे ही मर जाएंगे! क्योंकि क़ातिल सिर्फ पराए नही है! कुछ अपने भी है! सवाल तो होंगे, आपने उन्हें संवारा क्यों नही! उन्हें गले से लगाया क्यों नही ! काश सहारा दे दिया होता!

बाय बाय फ्रेंक! तुम्हारी याद आएगी!

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