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सुख-दुख

फ्रैंक हुजूर का शव देख रो पड़ीं उनकी दर्जनों बिल्लियां, देखें तस्वीरें

चंद्रभूषण सिंह यादव-

मेरी मां मरी थीं तो मै 08 साल का था इसलिए बहुत आभास नहीं हुआ, पिताजी 72 वर्ष की उम्र में मरे तो वर्षों की उनकी अस्वस्थता के बाद मृत्यु पर आंखे बरसीं लेकिन इन दो घटनाओं के बाद यदि अपने जीवन में सबसे अधिक रोया हूं तो एक साथी फ्रैंक हुजूर जी के मरने पर क्योंकि मैं जो हूं, जैसा हूं, वैसा ही मैंने फ्रैंक को भी पाया था।

दुखद संयोग ही था कि मैं उस दिन दिल्ली में ही था जिस दिन फ्रैंक हुजूर जी की मृत्यु हुई। 06 मार्च 2025 को फ्रैंक हुजूर जी के मृत्यु की खबर के बाद दिन भर आंखे भरती और बरसती रही। वेस्टर्न कोर्ट से जहांगीर पुरी स्थित बाबू जगजीवन राम अस्पताल की मर्चरी पर चार घंटे तक खड़ा रहा लेकिन कुछ तकनीकी कारणों से पोस्ट मार्टम उस दिन नहीं हुआ।

07 मार्च 2025 को पोस्टमार्टम होने के बाद फ्रैंक हुजूर जी के परिजन उनकी बाडी को लखनऊ लेकर आ गए और 08 मार्च 2025 को उनकी अंत्येष्टि लखनऊ के भैंसा कुण्ड पर की गई। उक्त अवसर पर मैं लखनऊ नहीं पंहुच पाया क्योंकि मैं दिल्ली में अध्ययन रत बिटिया कविता भूषण को होली की छुट्टी में घर लाने हेतु दिल्ली गया था जिसमें लौटने का टिकट 07 मार्च को ही था।जिस ट्रेन से मुझे लौटने का रिजर्वेशन था वह पुरानी दिल्ली से गोरखपुर आने वाली स्पेशल ट्रेन थी जो दिल्ली से सीतापुर से गोंडा होकर गोरखपुर आई। यदि साथ में बेटी न होती या ट्रेन सीतापुर से कटी न होती तो मैं भी अपने साथी के अंतिम विदाई में लखनऊ जरूर रहता। मैने लखनऊ में अध्ययनरत अपने दोनो बेटों कुंदन भूषण और कुणाल भूषण को सुबह ही सुशांत गोल्फ सिटी भेज दिया था और वे अपने प्यारे अंकल फ्रैंक हुजूर जी के अंत्येष्टि तक नम आंखों के साथ उपस्थित रहे।

फ्रैंक हुजूर जी की अंतिम यात्रा में भंते सुमित रतन जी से लेकर पूर्व मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य जी,कोंग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय जी, लोटन राम निषाद जी, डा दिलीप यादव जी, रत्नेश शेफर्ड जी, सुनील साजन जी, रामकरण निर्मल जी, जेबी यादव जी, कुलदीप यादव जनवादी जी, मारुति मानव जी, संतोष धरकार जी, ओमप्रकाश राजभर जी, सुनील पाल जी आदि सैकडो बुद्धिजीवी उपस्थित रहे लेकिन हम इंसानों के अलावे जो सबसे महत्त्वपूर्ण चीज रही ,वह बिल्लियों की श्रद्धांजली।

मैं जब इस चित्र को देख रहा हूं कि फ्रैंक हुजूर की एक प्यारी बिल्ली उनके ताबूत के ऊपर से उन्हे निहार रही है तो मेरा कलेजा टुकड़े -टुकड़े हो रहा है क्योंकि हम इंसान तो अपनी भावनाएं व्यक्त कर देते हैं पर वह जानवर जिसकी बोली या उसकी आंतरिक संवेदनाओ को हम नहीं समझ सकते हैं आखिर वह अपने पालनहार फ्रैंक हुजूर की डेड बाडी को देखकर क्या सोच रही होगी?

ताबूत के ऊपर लगे सीसे के ऊपर से अंदर चिर निद्रा में लीन फ्रैंक हुजूर को श्रद्धांजलि दे रही बिल्ली को देखकर बारंबार आंखे द्रवित हो रही हैं, लिखते हुए रो रहा हूं इस दृश्य पर कि यह बिल्ली क्या सोच रही होगी? अद्भुत इंसान था यह फ्रैंक हुजूर, ऐसा इस जीवन में शायद ही कोई मिलेगा जो इतना बड़ा साहित्य अनुरागी हो, पशु प्रेमी हो, प्रकृति संरक्षक हो और मित्रता में सब कुछ न्यौछावर कर डालने वाला हो। श्रद्धांजली है साथी! फ्रैंक हुजूर जी।

बिल्लियों में समाजवाद ढूंढता था!

कितना अद्भुत था इस फ्रैंक हुजूर का व्यक्तित्व जो बिल्लियों में समाजवाद ढूंढता था। मैं बिल्लियों से फ्रैंक के बेपनाह प्रेम को देखकर यूं कहूं कि फ्रैंक हुजूर यदि किसी को सबसे अधिक चाहता था तो वह उसका साहित्यानुराग तो था ही इसके अतिरिक्त उसकी जान “अखिलेश यादव जी” और “बिल्लियों” में कैद थी।

मैं जब दिलकुशा गार्डेन वाले मंत्री आवास में फ्रैंक हुजूर जी से मिला था तो मुझे लगता है कि बिल्लियों की संख्या लगभग 60 से ऊपर हो गई थी।इन बिल्लियों के देवता फ्रैंक हुजूर की सभी बिल्लियों के अलग – अलग नाम होते थे जिन्हे शायद वे जानती भी थीं क्योंकि जिस नाम को लेकर वे जिसे बुलाते थे वही बिल्ली उनके पास आती या देखती थी।

फ्रैंक हुजूर जी की बिल्लियों का जब समृद्ध भंडार था तो उनमें स्टेलिन से लेकर हिटलर तक,लालू से लेकर बोका तक थे।बोका नामक बिल्ली के मारने पर नास्तिक फ्रैंक हुजूर उसे “लॉर्ड बोका” घोषित कर उसकी समाधि तक बनवा दिए थे जहां नित्य शाम में दीपक जलता था, इतना प्रेम और अनुराग बिल्लियों से था उनका।

मुझे लगता है कि फ्रैंक हुजूर भारत के पहले ऐसे व्यक्ति थे जिनके घर में 60 से अधिक प्रत्येक रंग की विभिन्न तरह की बिल्लियां थीं।मुझे याद है एक बार इलाहाबाद के फ्रैंक हुजूर जी के एक साथी जिनका नाम शायद कोई विमल करके था वे अपने कुछ साथियों के साथ आ गए थे,मैं भी था, तब तक मेरे एक बचपन के साथी इंजीनियर बृजेश यादव जी गाजियाबाद से लखनऊ आकर मुझे फोन कर दिए कि कहां है, तो मैंने फ्रैंक साहब का ही पता उन्हे दे दिया था जिस नाते वे भी वही आ गए थे। हम सभी लोग रात में फ्रैंक साहब के वहां ही दावत किए। चूंकि भोजन करते -करते रात के 12 बज गए थे जिस कारण फ्रैंक साहब ने मुझसे कहा कि आपलाेग इतनी रात को क्या जाइएगा,यहीं सो जाइए।

रात में सोने की वह घटना मुझे जीवन भर याद रहेगी क्योंकि जिस डबल बेड पलंग को सोने के लिए फ्रैंक साहब ने हम दोनों को दिया था ,उस पर रात भर बिल्लियों को धमा चौकड़ी होती रही। रात में हमलोगों के सोने से भरी जगह के अलावे पूरे पलंग पर बिल्लियां ही सोई हुई थीं। करवट बदलने पर उनका गरम शरीर जब स्पर्श होता था तो हमलोग उठकर बैठ जाते थे। हमलोगों के साथ रातभर बिल्लियों के साथ सटने और हटने का खेल चलता रहा।

फ्रैंक हुजूर जी ने दिलकुशा गार्डेन के अपने आवास के बाहर अपना जो नेम प्लेट लगाया था उस पर “Socialist Factor FH & Cat Family”(सोशलिस्ट फैक्टर ,एफएच अर्थात फ्रैंक हुजूर एवं कैट फेमिली अर्थात बिल्ली का परिवार) लिखा था। फ्रैंक साहब की बिल्लियों का जो पितामह “बोका” था उसकी मृत्यु पर उसे बाकायदे भगवान घोषित कर “लार्ड बोका” बना उन्होंने उसे ससम्मान दफना कर समाधि बनाई थी। समाधि के पास उसकी हुबहू सीमेंट निर्मित मूर्ति रखी गई थी जिस पर रोज शाम को दीपक जलता था।इस पूरे प्रकरण में कोई अंधविश्वास नहीं था बल्कि एक बिल्ली के प्रति उनका स्नेह और लगाव था।

फ्रैंक हुजूर जितना जिंदादिल और प्रसन्न चित्त इंसान मैने कम देखा है लेकिन उस व्यक्ति में दुःख और तकलीफ का आभास मुझे तब दिखा जब सपा सरकार बदलने के बाद बीजेपी सरकार आने पर उनका आवास छीन लिया गया और उनके सामान बाहर फेंक दिए गए।इस मकान बदलने में यदि सबसे अधिक कुछ प्रभावित हुआ था तो वह उनका बिल्ली परिवार था।चूंकि बिल्लियां पिजड़े में रहती नहीं थीं इसलिए जब दिलकुशा गार्डेन का आवास बदला तो फ्रैंक साहब की दर्जनों बिल्लियां मिस कर गईं जिनमे एक से एक नामों वाली बिल्लियां थीं। नए आशियाने से आकर उन मिस बिल्लियों को महीनो ढूंढते रहे फ्रैंक साहब,पर बहुतायत नहीं मिलीं।

सुशांत गोल्फ सिटी में वर्षों रहने के बाद जब वहां का आवास खाली कराया गया तो एक बार फिर दर्जनो बिल्लियां मिस कर गईं।नए ठिकाने पर आने के कुछ सालों बाद एक बार फिर जब ठिकाना अभी कुछ महीनो पूर्व बदला तो पुनः बिल्लियां मिस कर गईं।

बिल्लियों के इस भगवान फ्रैंक हुजूर के साथ लगातार घरों को छीनने या बदलने का जो सिलसिला चला उसमें यह महान कैट लवर अपनी बिल्लियों के खोते जाने से अत्यधिक परेशान था तो वही जो उनके दूसरे सबसे प्रिय पात्र माननीय अखिलेश यादव जी थे,उनसे इधर के दिनो मे एक तरफा अनुराग ने और तोड़ दिया था। जैसा कि मैंने ऊपर लिखा है कि फ्रैंक हुजूर जी का साहित्य के अतिरिक्त जो सबसे प्रिय चीजे थीं वह “बिल्लियां” और “अखिलेश यादव” जी ही थे। वे इन दोनो से जितनी मुहब्बत करते थे उतनी किसी और चीज से नही थी ऐसे में लगातार बिल्लियो की मिसिंग और अखिलेश यादव जी के प्रति एक पक्षीय अनुराग ने इधर के दिनो मे फ्रैंक हुजूर को तोड़ सा दिया था।

फ्रैंक हुज़ूर जैसा दीवाना शायद ही कोई मिलेगा जो अपने मन मे सजी मूरतों को लेकर इतना न डूबा होगा कि उनमें डूब ही जायेगा। संपूर्ण भारत में बिल्लियों का सबसे बड़ा शौकीन,सबसे ज्यादा बिल्लियों को अपने घर में पालने वाला, यह बिल्लियों का भगवान “फ्रैंक हुजूर” अब सुपुर्द-ए -खाक हो चुका है। यह अद्भुत प्रकृति प्रेमी प्रकृति में समाहित हो चुका है जो मेरा अभिन्न साथी था। कितना लिखूं, क्या – क्या लिखूं और कुछ बातें लिखने का सामर्थ्य भी नहीं फिर ऐसे में मेरी अश्रुपूरित श्रद्धांजलि है।


समाजवादी लेखक स्मृतिशेष फ्रैंक हुज़ूर जी विगत 06 मार्च 2025 को दिल्ली में हृदयाघात से इस दुनिया से अलविदा कर गए। अंतर्राष्ट्रीय स्तर की अंग्रेज़ी मासिक पत्रिका “सोशलिस्ट फैक्टर” और हिंदी के साप्ताहिक समाचार पत्र “सोशलिस्ट फैक्टर” में वे संपादक रहे। उनकी किताब “टीपू स्टोरी” चर्चित हुई। फ्रैंक हुजूर जी देश के पिछड़े समाज में पैदा हुए अद्वितीय लेखक और सामाजिक चिंतक थे जो समाज की वर्तमान दशा से इतने पीड़ित थे कि 48 साल की उम्र में ही वे समाज के बारे में सोचते -सोचते प्रकृति में समाहित हो गए।

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1 Comment

1 Comment

  1. Madan Tiwary Advocate

    March 10, 2025 at 11:03 am

    आंखे भींग गई, बिल्लियों का तो सबकुछ खत्म हो गया, उनके लिये तो ये पिता थे, असहनीय पीड़ा अनुभव कर रहा हूँ बिल्लियों के लिये ।

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