हैदर नकवी-
आज बात उस पत्रकार की, जो सिर्फ नाम के नहीं, काम के भी बेमिसाल थे—सुनील बाजपेई जी। हम सबने उन्हें प्यार से नाम दिया था—“कानपुर के जेम्स बॉन्ड”। वजह? उनकी अनोखी रिपोर्टिंग स्टाइल!
ये पैदल रिपोर्टिंग करते थे—मीलों चलते, जेब में हमेशा भुने हुए चने रखते। जैसे लोग पान मसाले के लिए पूछते हैं, वैसे ये चने बांटते थे। खबर निकालनी हो तो घण्टों किसी भी दफ्तर, कोर्ट या गली-मोहल्ले में खड़े रह सकते थे।
इनकी खासियत थी कि जो खबर पकड़ते, उसे नवजीवन अख़बार में वैसा ही लिखते—बिना किसी मिलावट के। और अख़बार में वह खबर वैसे ही छपती भी थी। एक बार तो हाल ये हुआ कि एक तत्कालीन मुख्यमंत्री, जो तब प्रदेश की सत्ता चला रहे थे, इनकी खबर से इतने नाराज़ हुए कि अख़बार के दफ्तर की बिजली ही कटवा दी!
सुनील भाई की खबरों का असर इतना था कि सरकार को उनकी सुरक्षा के लिए एक गनर देना पड़ा। लेकिन हकीकत में गनर की जिम्मेदारी सिर्फ सुरक्षा की नहीं थी, बल्कि ये देखना भी था कि सुनील भाई अंदर की खबरें निकालते कैसे हैं!
अब सुनील भाई ठहरे घाघ पत्रकार!

रोज़ मीलों पैदल चलते, और उनके साथ वो गनर भी चलता। खाने में उसे मिलता सिर्फ भुने हुए चने! धीरे-धीरे बेचारा परेशान हो गया। एक दिन अफसरों के पास जाकर हाथ जोड़कर बोला—“साहब, मेरी ड्यूटी कहीं और लगा दो!” और उसने खुद अपनी तैनाती हटवा ली!
सुनील भाई की सबसे बड़ी ताकत थी—उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं था! उनका बेखौफ अंदाज़ ऐसा था कि बड़े-बड़े लोग इनसे कांपते थे! सरकारी दफ्तरों में जैसे ही इनका कदम पड़ता, अफसर फाइलें छुपाने लगते! किसी को नहीं पता होता था कि कौन सा कागज इनके हाथ लग जाएगा और अगले दिन खबर बन जाएगी!
एक बार इन्होंने शहर के एक बड़े उद्योगपति और माफिया के ख़िलाफ़ खबर छाप दी। नतीजा? उसने सुनील भाई पर एक करोड़ रुपये की मानहानि का नोटिस भेज दिया!
लेकिन सुनील भाई को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा।
उन्होंने वो नोटिस उठाया और सीधा उस उद्योगपति के घर पहुंच गए! बोले—“70 रुपये की गोली आती है, उससे मार दो! लेकिन मैं लिखना बंद नहीं करूंगा!”
यह सुनकर उस माफिया की हिम्मत जवाब दे गई और उसने नोटिस वापस ले लिया! इनके चक्कर में एक बार मैं भी पिटने से बचा!
एक बार शहर के नारी निकेतन में एक महिला के साथ हुई दरिंदगी की खबर उन्हें लगी। अब अंदर कैसे जाया जाए? दीवार कूदकर चले गए!
अंदर महिला से मिले, पूरी बात सुनी। मैं बाहर मोटरसाइकिल पर उनका इंतजार कर रहा था।
अचानक आवाज़ आई—“गाड़ी स्टार्ट करो!”
मैंने देखा—सुनील भाई आगे-आगे दौड़ रहे थे और उनके पीछे पुलिस और नारी निकेतन का स्टाफ!
सुनील भाई के किस्से अनगिनत हैं, लेकिन उनकी शख्सियत आज भी वैसी ही है—बिल्कुल अडिग, बेखौफ और ईमानदार! न कोई लालच, न कोई समझौता—बस खबरों के लिए जीना!
आज के दौर में ऐसे पत्रकार बिरले ही मिलते हैं, लेकिन जो भी हैं, वो मिसाल हैं!


