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सुख-दुख

गहरी नींद (सुषुप्ति) में हम अपने सत्य स्वरूप (आत्मा) के सबसे निकट होते हैं!

वेदों के अनुसार, नींद केवल थकान मिटाने का साधन नहीं, बल्कि आत्मा की मूल अवस्था की झलक है। गहरी नींद (सुषुप्ति) में हम अपने सत्य स्वरूप — आत्मा — के सबसे निकट होते हैं। यह अवस्था ध्यान और ब्रह्मज्ञान का एक द्वार भी है।

वेदों में जीवन को जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुर्य — इन चार अवस्थाओं में बाँटा गया है।
जाग्रत (waking): जब हम शरीर और बाहरी दुनिया से जुड़कर अनुभव करते हैं।
स्वप्न (dreaming): जब मन अपनी ही स्मृतियों में विचरण करता है।
सुषुप्ति (deep sleep): जब मन और इंद्रियाँ विश्राम में होती हैं, न कोई स्वप्न, न कोई इच्छा — केवल शुद्ध “अविद्या” या “आनंद”।
तुर्य (transcendental state): यह चतुर्थ अवस्था है जो आत्मा का साक्षात्कार है — जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति से परे।

माण्डूक्य उपनिषद:
“सुषुप्तिस्थान एकीभूत: प्रज्ञानघन एव आनन्दमयो ह्यानन्दभुक् चेतोमुख: प्राज्ञस्तृतीय: पाद:”
(तीसरी अवस्था — सुषुप्ति — में सब एकरूप हो जाते हैं, केवल आनंद और चेतना रह जाती है।)

नींद को आत्मा के परमात्मा में लीन होने जैसी अवस्था भी कहा गया है।

बृहदारण्यक उपनिषद (4.3.19):
“यत्र ह्ययं सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तदायत्त: प्राग्नेनात्मना सम्पन्न:”
(जब यह व्यक्ति गहरी नींद में होता है, तब वह न कोई इच्छा करता है, न कोई स्वप्न देखता है; तब वह परमात्मा में लीन होता है।)

ऋग्वेद में नींद को ईश्वर की कृपा से मिला हुआ विश्राम बताया गया है।

ऋग्वेद 10.85.44:
“स्वप्नेन प्रचोदयात्”
(हे देव! हमें शुभ स्वप्नों और शांत निद्रा द्वारा प्रेरित करें।)

ऋग्वेद 5.55.3:
“त्वं नः सुप्तेषु जागर्ति” –
(हे ईश्वर! जब हम सोते हैं, तब भी तू हमारे लिए जागता है।)

गहरी नींद की अवस्था को आत्मज्ञान का संकेत भी माना गया है, क्योंकि उसमें अहंकार नहीं रहता।

छान्दोग्य उपनिषद (6.8.1):
“य: सुषुप्ति: स एक आत्मा”
(जो गहरी नींद में रहता है — वही आत्मा है।)

नींद से जुड़ी कुछ ऋचाओं के शुद्ध संस्कृत श्लोक और उनके सरल हिंदी भावार्थ –

ऋग्वेद 10.85.44:

संस्कृत:
“स्वप्नेन प्रचोदयात् पथि देवयानस्य।”

हिंदी भावार्थ:
हे देव! हमें शुभ स्वप्नों और शांति से भरी नींद के माध्यम से उस दिव्य मार्ग पर प्रेरित करें जो आत्मा को ईश्वर से मिलाता है।

माण्डूक्य उपनिषद (Verse 5):

संस्कृत:
“सुषुप्तिस्थान एकीभूत: प्रज्ञानघन एव आनन्दमयो ह्यानन्दभुक् चेतोमुख: प्राज्ञस्तृतीय: पाद:”

हिंदी भावार्थ:
सुषुप्ति (गहरी नींद) की अवस्था में सब कुछ एक हो जाता है, कोई द्वैत नहीं रहता। केवल चेतना का घना रूप और आनंद ही रह जाता है। इस अवस्था में आत्मा ही मात्र आनंद का अनुभव करती है — यही प्राज्ञ है, जो तीसरी अवस्था कहलाती है।

छान्दोग्य उपनिषद (6.8.1):

संस्कृत:
“य: सुषुप्ति: स एक आत्मा, नान्य: अस्ति कश्चन।”

हिंदी भावार्थ:
जो सुषुप्ति की अवस्था में स्थित आत्मा है — वही एकमात्र सत्य आत्मा है, उसके सिवा और कोई नहीं। यह आत्मा ही वास्तव में सब कुछ है।

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