Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

प्रिंट

आज के अखबार : नहीं बताते कि पुलवामा के मुकाबले ‘कार्रवाई’ में ज्यादा समय लग रहा है, तैयारी भी ‘ज्यादा’

अखबारों में लड़े जाते ‘युद्ध’ को समझिये और असली युद्ध से डरिये। यह कायरता नहीं, बुद्धिमानी है। वैसे भी, इससे आतंकवाद रुकना होता तो 1971 के बाद युद्ध की जरूरत ही नहीं पड़नी चाहिये थी। कारगिल होना ही नहीं चाहिये था पर हम तो गिरफ्तार आतंकवादी को उसके घर छोड़कर आये हैं। अगर वह विमान अपहरण के कारण हुआ था तो क्या अब काठमांडो या किसी और शहर से विमान अपहरण न होने की गारंटी है?

संजय कुमार सिंह

इंडियन एक्सप्रेस की आज की लीड का शीर्षक है, सेना जब पहलगाम का जवाब देने की तैयारी कर रही है तब वायु सेना, नौ सेना प्रमुखों ने प्रधानमंत्री को जानकारी दी। द हिन्दू की लीड का शीर्षक वही है जो इंडियन एक्सप्रेस का है। दि एशियन एज ने प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री दोनों की बातों को मिलाकर शीर्षक बनाया है। राजनाथ सिंह के हवाले से कहा गया है कि उन्होंने कार्रवाई की चेतावनी दी। द टेलीग्राफ की सेकेंड लीड का शीर्षक है, पाकिस्तानी दूत की परमाणु धमकी के बाद वायु सेना प्रमुख ने मोदी से मुलाकात की। मुझे लगता है कि वास्तविक स्थिति यही है और यह आठ में से एक अखबार में है। गौरतलब है कि, पुलवामा 14 फरवरी को हुआ था, जवाब में बालाकोट 26 फरवरी 2019 को। पहलगाम 22 अप्रैल को हुआ था आज 5 मई है। अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, बगलिहार बांध से पाकिस्तान का चिनाब का पानी रोका, झेलम का प्रवाह भी रोकेंगे। पहलगाम के बाद अखबारों में युद्ध की तैयारी या युद्ध का माहौल बनाया जाता दिख रहा है। अगर भारत को जवाबी कार्रवाई में पहले के मुकाबले ज्यादा समय लग रहा है तो इसे कैसे देखना है – एक मुद्दा हो सकता था लेकिन अमर उजाला ने आज बताया है कि हवाई हमला नहीं हुआ तो पानी रोक दिया गया है अभी और रोकेंगे। मुझे लगता है कि यह सरकार की ओर से बैटिंग या प्रचार है। वरना, खबर यह थी 14 दिन हो गये सरकार क्या कार्रवाई करेगी पता नहीं है। बालाकोट हमले को आप जैसे देखिये और अखबारों में जो छपा था उसमें तथ्य यह है कि एक भारतीय पायलट अभिनंदन वर्धमान को बंदी बना लिया गया था। कहने की जरूरत नहीं है कि उनके विमान को मार गिराया गया था। अब जब हमारे अखबार पाकिस्तान से युद्ध या पाकिस्तान पर हमले की तैयारियों का माहौल बना रहे हैं तो हमें याद रखना चाहिये कि बालाकोट हमले में हम भले ‘जीत’ गये हों, अभिनंदन को छोड़ देना पाकिस्तान की उदारता थी जिसे मजबूरी बनाकर पेश किया गया था और मजबूरी यही हो सकती है कि वह युद्ध नहीं चाहता है या उससे डरता है।

जो भी हो, तब सरकार की बहादुरी का पूरा प्रचार हुआ। प्रधानमंत्री ‘घुस कर मारूंगा’ का दावा करते हुए (शायद चुनाव आयोग की मदद से भी) चुनाव जीत गये। अब भारतीय सीमा सुरक्षा बल का एक जवान 10 दिन से ज्यादा से पाकिस्तान के कब्जे में है। जवान की हैसियत लड़ाकू पायलट जैसी होती तो उसे भी छोड़ दिया जाता और मीडिया भारत या नरेन्द्र मोदी के दबदबे के गीत गाता। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। खबर तब छपी जब कॉन्स्टेबल पूर्णम कुमार साव की गर्भवती पत्नी रजनी पठानकोट में अधिकारियों से मिली और उसे उम्मीद दिलाई गई कि भारतीय सेना पति को जल्द छुड़ा लाएगी। लगातार तीन चुनाव जीतने का रिकार्ड बनाने के बाद जवान की 10 दिन की कैद कम तो नहीं हो सकती है। आज खबर है कि सीमा सुरक्षा बल ने भी एक पाकिस्तानी रेंजर को दबोच लिया है। इस तरह, कह सकते हैं कि युद्ध चल रहा है और दोनों के एक-एक जवान दोनों के कब्जे में हैं। यह अभिनंदन को कैद किये जाने की तरह अंतरराष्ट्रीय मुद्दा नहीं है। यही नहीं, पाकिस्तान लगातार युद्ध विराम का उल्लंघन कर रहा है। इंडियन एक्सप्रेस की आज की खबर के अनुसार नियंत्रण रेखा की नई जगहों पर भी टकराव शुरू हो गया है। इसके बावजूद अखबारों की खबरों से लग रहा है कि भारत युद्ध या हमले की तैयारी कर रहा है। ऐसी खबरों में कल एक खबर थी, ऑर्डिनेंस फैक्ट्री में लंबी छुट्टी रद्द किये जाने की। कहने की जरूरत नहीं है कि हमला अचानक होता है और जवाबी हमला भी अचानक होना चाहिये। पर तुरंत नहीं हुआ तो अब जल्दबाजी नहीं है आराम से होगा। आईटी सेल ऐसा प्रचार भी कर सकता है। फेसबुक पर किसी ने लिखा भी है, ‘वेट एंड सी’ यानी इंतजार कीजिये और देखिये। 10 साल से ज्यादा से मैं यही देख रहा हूं कि जो हो रहा है वह मीडिया में ही। मंदिर, उद्घाटन से लेकर कुम्भ तक और अब वह पाठ्य पुस्तकों में भी चला गया है। जो हटाया गया है अपनी जगह है पर मुद्दे की बात है कि ‘घुस कर मारूंगा’ का डर होता तो पहलगाम क्यों होता और हो गया तो जो समय लग रहा है वह घुस कर मारूंगा के पहले से ज्यादा हो चुका है लेकिन ‘खबर’ नहीं है।

कहने की जरूरत नहीं है कि शुरुआती घोषणाओं और प्रचार के मुकाबले अभी ऐसी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है, समय लग रहा है, देश परेशान है और पाकिस्तान युद्धविराम का उल्लंघन कर रहा है यानी डर तो नहीं ही रहा है। हमारे ज्यादातर अखबार युद्ध विराम उल्लंघन की खबरों को कम महत्व देते हैं और सरकारी कार्रवाई को ज्यादा। द हिन्दू ने पाकिस्तानी कार्रवाई को महत्व दिया तो उसकी आलोचना की गई और उसका असर भी दिख रहा है। ऐसे में आज नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, बगलिहार से पानी रोकने पर बौखलाया पाकिस्तान। इसके साथ एक शीर्षक वह है जो राजनाथ सिंह का कहा है, पीएम मोदी के नेतृत्व में आप जो चाहते हैं वह निश्चित रूप से होगा। यही शीर्षक टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड का है। अनुवाद किया जाये तो यह है, मोदी के तहत पहलगाम का पलटवार वही होगा जो आप चाहते हैं। यहां ‘आप’ क्या-क्या चाहते हैं और आप ‘कौन-कौन’ हैं, समझना मुश्किल नहीं है। तथ्य है कि आप चाहते हैं इसी लिये मोदी ने जातिवार जनगणना की भी घोषणा कर दी है और इसपर भाजपा व संघ परिवार की पुरानी राय अखबारों में भले नहीं है या कम है, सोशल मीडिया पर खूब है। प्रचारक इसके खिलाफ हैं और खुलकर बोल रहे हैं। इसपर अपूर्व भारद्वाज ने जो लिखा है उसकी शुरुआती लाइनें इस प्रकार हैं, शेखर गुप्ता आहत हैं। बहुत आहत हैं। क्योंकि अब नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी बनते जा रहे हैं। जाति जनगणना? “बैड आइडिया” था राहुल का। अब मोदी ने उसे भी अपनाया।

आज नवोदय टाइम्स की एक खबर का शीर्षक है, 1984 के दंगों पर बोले राहुल – कांग्रेस ने कई गलतियां कीं, जिम्मेदारी स्वीकार करता हूं। कहने की जरूरत नहीं है कि कांग्रेस की कथित गलतियों के कारण इंदिरा गांधी और फिर राजीव गांधी की हत्या हो चुकी है। 1984 के लिए राहुल गांधी को जिम्मेदारी स्वीकार करने की जरूरत नहीं है और जरूरत है तो गोधरा और गुजरात नरसंहार के लिए भी किसी को जिम्मेदार होना होगा। आप जानते हैं कि इस या इससे संबंधित सवालों से बचने के लिए ही प्रधानमंत्री प्रेस कांफ्रेंस नहीं करते हैं या किस सवाल पर कई साल पहले इंटरव्यू से उठ गये थे। फिर भी मीडिया ने नरेन्द्र मोदी को विश्व गुरु साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी तो राहुल गांधी को पप्पू बनाने में लगे रहे। इस क्रम में राहुल तो छोड़िये, कांग्रेस की खबरों को भी प्रमुखता नहीं मिलती है। जनगणना की मांग करने के लिए कांग्रेस और राहुल गांधी की कितनी आलोचना हुई। पर उसे स्वीकार कर लिया गया है। अब उसका मजाक अखबारों में तो नहीं ही है, दि एशियन एज की खबर किसी और अखबार में पहले पन्ने पर नहीं है। खबर का शीर्षक है, कांग्रेस की राज्य इकाइयों से कहा गया कि जातिवार जनगणना पर भाजपा के यूटर्न का खुलासा किया जाये। भाजपा या नरेन्द्र मोदी ने एक बार यू-टर्न नहीं लिया है। कई बार ले चुके हैं पर वह खबर नहीं बनती है। इस बार भी नहीं बनेगी। जातिवार जनगणना का विरोध अलग तरह से हो रहा है (संभवतः करवाया जा रहा है) लेकिन वह अलग मुद्दा है।

आज अखबारों ने बताया है कि फिरोजपुर छावनी में आधे घंटे का ब्लैक आउट का अभ्यास हुआ। यह 1971 के युद्ध में भी होता था लेकिन तकनीक के आज के जमाने में इसका मकसद या लाभ अपनी जगह, पहले पन्ने की खबर बनाना तो निश्चित रूप से उल्लेखनीय है। लेकिन बादलों में अगर रडार काम नहीं करते हैं तो अन्य तकनीक के बारे में बात करना बेकार है और अभ्यास सही व जरूरी ही होगा। तो खब भी जरूरी है। इससे तैयारियों का प्रचार तो हो ही रहा है। पाकिस्तान इसका कैसे क्या लाभ उठायेगा वह मुद्दा नहीं है। बीबीसी की एक खबर का अंश है, बच्चों को परीक्षा के टिप्स देने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस बयान ने फिजिक्स के छात्रों को दुविधा में डाल दिया है। इस दुविधा को दूर करने की किसी कार्रवाई की जानकारी मुझे नहीं है और मैं आज भी दुविधा में हूं। बीबीसी से सरकार की नाराजगी भी छिपी हुई नहीं है। पर वह भी अलग मुद्दा है। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड की बात हो चुकी है और यह भी बताना होगा कि वक्फ मामले की सुनवाई आज होनी है इसकी याद दिलाने वाली खबर सेकेंड लीड है। शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट को आज फैसला करना है कि वक्फ अपीलों पर अंतरिम आदेश की जरूरत है कि नहीं। संसद में जल्दबाजी में और लगभग जबरन वक्फ कानून पास कराये जाने के बाद मामले का सुप्रीम कोर्ट में जाना सरकार के काम की प्राथमिकताओं का एक नमूना है तो उसपर समय मांगना अपने बचाव की योग्यता है। बीच के समय में देश का माहौल जैसा बना और बदला वह उसकी राजनीति का नमूना है और देश में शायद ही कोई हो जो इन सबसे प्रभावित नहीं है। पर प्राथमिकता सिर्फ उन खबरो को मिली है जो युद्ध का माहौल बनाने में मददगार लग रहे हैं। और खबरें भी ऐसी नहीं हैं जो जनता को सतर्क कर रही हों और युद्ध के लिहाज से तैयार करने की पील कर रही हों।  

हिन्दुस्तान टाइम्स की आज की लीड का शीर्षक है, महत्वपूर्ण बांध से भारत ने पाकिस्तान को पानी का प्रवाह रोका। अखबार ने इसे इस्लामाबाद के लिए एक और निर्णायक झटका देना कहा है। सेकेंड लीड का शीर्षक है, सेना प्रमुख ने पाकिस्तान को वायु सेना की तैयारियों के बारे में जानकारी दी। कहने की जरूरत नहीं है कि भारत को जो करना है कर देना चाहिये और यह उसका अधिकार तो है ही उसकी जरूरत भी है। जैसा मैंने कहा, इसमें (मोदी सरकार के) भारत के पैमाने से भी देर हो चुकी है और प्रचार ज्यादा हो रहा है। ऐसी एक और खबर हिन्दुस्तान टाइम्स में है, सीमा शुल्क विभाग तीसरे देश के जरिये पाकिस्तानी आयात को रोकने के लिये काम कर रहा है। कहने की जरूरत नहीं है कि सरकार को कार्रवाई करनी चाहिये पर तुच्छता शोभा नहीं देती। जो स्थितियां हैं उसमें तुच्छता का भी प्रचार किया जा रहा है। दूसरी ओर, पाकिस्तानी दूत ने पूरी तकात लगाने की बात की है और इसमें परमाणु खतरा शामिल है। मुझे लगता है कि इसे लीड बनाया जाता और भारत की कार्रवाई को कम महत्व दिया जाता तो युद्ध की जरूरत ज्यादा लगती पर उल्टा हो रहा है। समझना मुश्किल नहीं है कि विमान मार गिराये जाने के बाद हमला आसान नहीं है। संभव है इसी कारण देर हो रही हो और संपादक स्वतंत्र रूप से काम कर रहे होते तो कुछ और छवि बनती। अभी तो लगता है जैसे सब एक व्यक्ति के निर्देश पर काम करते हैं। इसलिये खबरें कम होती हैं, साजिश, रणनीति और राजनीति के संकेत ज्यादा होते हैं।

Local News Community
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन