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सियासत

सीज़फायर का सच : इस सीज़फायर में भारत एक तरह से मूर्ख बन रहा है!

संकटकाल था। देश और सरकार के साथ खड़ा था। यह मेरा नागरिक कर्तव्य था। संकट समाप्त। हालात सामान्य। अब पूछे जाएंगे सवाल, तीखे कड़े सवाल। ट्रम्प ने क्यों की युद्धविराम की घोषणा। रूबियो ने क्यों की? क्यों घोषित नीति से हटकर तीसरे देश को ये मौक़ा दिया गया? देश का सम्मान क्यों गिरवी रखा गया? जवाब दो प्रधानमंत्री महोदय! -वरिष्ठ पत्रकार अशोक कुमार पांडेय


संत समीर-

शर्त यह है कि पाकिस्तान अब आतङ्कवाद नहीं करेगा और भारत सीज़फायर पर राज़ी। श्रेय लेने के लिए बीच में अमेरिका। बहुत से लोग इस युद्ध विराम से ख़ुश हो सकते हैं, पर यह मतलब बिलकुल नहीं लगाना चाहिए कि पाकिस्तान सचमुच सुधर गया है। पाकिस्तान की सहमति की इस भाषा को इस्लामी नज़रिये में अल-तकिया, अल-तकियाह या अल-तकैया कहा जाता है। इस सीज़फायर में भारत एक तरह से मूर्ख बन रहा है। देखते रहिए, कुछ दिनों की शान्ति के बाद आतङ्क की कहानी फिर शुरू होगी। मेरी नज़र में न तो पाकिस्तान ने सबक़ सीखा है और न ही भारत का बदला पूरा हुआ है।

पाकिस्तान ने अपने लोगों के साथ-साथ सोशल मीडिया के सहारे पूरी दुनिया में झूठ फैलाने का जैसा अभियान चलाया है, उसका सङ्केत साफ़ है कि वह आसानी से सुधरने वाला नहीं है। भारत सच की लड़ाई लड़ रहा था, पर पाकिस्तान की संसद की बहसों और आसिफ़ मुनीर की पाकिस्तानी बच्चों के युद्ध में उतारने की घोषणाओं में साफ़ दिख रहा था कि पाकिस्तान की रुचि सच की लड़ाई लड़ने में बिलकुल नहीं है। भारत सच्ची सूचनाएँ देने के प्रति प्रतिबद्धता दिखाता रहा, जबकि पाकिस्तान ने पूरा एक महक़मा इसलिए खड़ा किया कि भारत के ख़िलाफ़ झूठी सूचनाएँ पूरी दुनिया में कैसे फैलाई जाएँ। उनके अख़बार डॉन, वग़ैरह के पन्नों पर निगाह डालिए, कई चीज़ें समझ में आएँगी। हम हिन्दुस्तानियों को झूठ बोलने में उलझन होती है, पर पाकिस्तानी बच्चों को अल-तकिया के नाम पर झूठ बोलने का बाक़ायदा प्रशिक्षण दिया जाता है। किसी पुस्तकालय में या डिज़िटल लाइब्रेरी में पाकिस्तानी अख़बार मिल जाएँ तो उनके पुराने अङ्क देखिए। सन् 1971 में जब पाकिस्तानी सेना के नब्बे हज़ार सैनिक भारत के सामने सिर झुकाए खड़े आत्म-समर्पण कर रहे थे तो उनका ‘डॉन’ अख़बार लिख रहा था—“सभी मोर्चों पर पाकिस्तान की जीत।” पाकिस्तान की बहुत बड़ी आबादी आज भी मानती है कि 1971 में भारत हारा था और पाक सेना ने बड़ी बहादुरी से अपने नब्बे हज़ार सैनिकों को छुडा लिया था।

अब ज़रा बेहद सङ्क्षेप में अल-तकियाह, अल-तकिया या अल-तकैया को समझते हैं। इसके तहत यह सिखाया जाता है कि जब आप कमज़ोर पड़ें या आपकी सङ्ख्या कम हो तो काफ़िरों से झूठ बोल सकते हैं, उनकी चापलूसी करके उनके विश्वास पात्र बने रह सकते हैं, मतलब निकालने के लिए अन्य कोई भी रास्ता अपना सकते हैं, लेकिन जिस दिन आप मज़बूत हो जाएँ, उस दिन इस्लाम क़ाबिज़ करने के काम में फिर से लग जाएँ। सारांश यह है कि अल-तकिया के तहत मुसीबत के समय पर काफ़िरों जैसा व्यवहार करना पड़े तो करो, ताकि सुरक्षित रह सको। दीन की राह में यह सब जायज़ है…अल-तकिया के तहत किए गए गुनाह माफ़ कर दिए जाएँगे। वैसे, इस्लाम के अच्छे व्याख्याकार इसका एक और पक्ष यह बताते हैं कि यदि सुरक्षित माहौल में रहना हो रहा हो, तो किसी भी मुसलमान को अल-तकिया के तहत ऐसे गुनाह करने की ज़रूरत नहीं है, फिर भी अगर कोई ऐसे गुनाह करता है तो उन गुनाहों की माफ़ी नहीं है। इस हिसाब से भारत जैसे सुरक्षित देश में रहते हुए ऐसे गुनाह करना जायज़ नहीं है। बहरहाल, पाकिस्तान का सच यही है कि हूरों के सपने दिखा-दिखाकर और अल-तकिया का पाठ पढ़ा-पढ़ाकर ही वहाँ आतङ्कवादी तैयार किए जाते हैं।

यहीं पर यह भी समझ लेना उचित रहेगा कि इस्लामी शिक्षा के दो विशेष प्रभाव मुसलमानों पर देखे जाते हैं। एक वे हैं, जिन्होंने सूरा-2 अल-बक़रा की आयत-256 (दीन यानी धर्म के मामले में कोई ज़बरदस्ती नहीं) और सूरा-109 अल-काफ़िरून की आयत-6 (तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन मेरे लिए मेरा दीन) का ज़्यादा अभ्यास किया हुआ होता है। ऐसे मुसलमानों की तादाद भारत में काफ़ी है और ये सबके साथ सद्भाव के साथ रहने की हिमायत करते हैं। दूसरी तरह के वे मुसलमान हैं, जो सूरा-9 अत-तौबा की आयत-5, 29, 123 जैसी क़ुरान की तमाम आयतों के अभ्यास में जीते हैं, जिनकी व्याख्याएँ जेहाद के लिए मारकाट का आदेश करती हैं। ये ही वे लोग हैं, जो जब तक कमज़ोर हैं, तब तक अल-तकिया का रास्ता अपनाते हैं और जब इनकी सङ्ख्या या शक्ति बढ़ जाती है तो शरीया के लिए जेहाद का ऐलान करते हैं। दुनिया भर के आतङ्कवाद का अध्ययन करके इसे समझा जा सकता है। ख़ैर…

कुल मिलाकर बात यह है कि पाकिस्तान के एयरबेस लगातार नष्ट हो रहे थे, ड्रोन और कुछ मिसाइलें भेजने के अलावा वह ज़्यादा कुछ कर सकने लायक़ बचा नहीं था, लगातार कमज़ोर पड़ रहा था, तो सीज़फायर की राह पर आना उसे बेहतर लगा। यह अल-तकिया है। मौक़ा पाकर वह ख़ुद को मज़बूत करेगा और दूसरे तरीक़ों से भारत को फिर से कमज़ोर करने की कोशिश करेगा। और यदि, सचमुच सुधर गया तो? बात ही क्या है! हम तो चाहते ही हैं कि सब तरफ़ बस शान्ति ही शान्ति हो। हम उनके यहाँ पिकनिक मनाने जाएँ और वे हमारे यहाँ आकर चहलक़दमी करें। (सन्त समीर)

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