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टूटी भरोसे की खिड़की: एयर इंडिया को लेकर वरिष्ठ पत्रकार संजय सिन्हा का विश्लेषण

संजय सिन्हा-

ज नोट पहले – हत्यारा कौन है? मैं ‘ड्रीमलाइनर’ विमान में पहली बार बैठा था दिल्ली से सिडनी की उड़ान में। बोइंग का वो विमान मुझे इतना अंचभित कर रहा था कि मैंने वहां से लौट कर फेसबुक पर एक पोस्ट लिखी थी, और नाम दिया था- रिश्तों की खिड़की।

जिस दिन अपनी ssfb Family का पहला मिलन समारोह दिल्ली में होने वाला था (15 नवंबर 2014) को, उसके एक दिन पहले मैं सिडनी से दिल्ली लौटा था। मुझे कुछ और दिन सिडनी रहना था, लेकिन जाने के पहले हमारे ssfb परिवार के मिलन समारोह की तारीख तय हो चुकी थी, तैयारियां हो चुकी थीं, तो मैंने उसे टालने की जगह, सिडनी प्रवास टाला।

आज कहानी ये नहीं है। आज कहानी ये है कि हर जगह रिश्ते तलाशने वाले संजय सिन्हा ने बोइंग के ड्रीमलाइनर विमान की तकनीक से भी ‘रिश्ता’ जोड़ लिया था।

वहां से लौट कर मैंने लिखा था कि एअर इंडिया के बेड़े में एक सीरिज है बोइंग – ड्रीमलाइनर विमानों की। इस विमान की लंबाई कितनी है, कितने लोग इसमें बैठ सकते हैं, क्या खाना मिलता है ये बताने में मेरी दिलचस्पी नहीं थी। मेरी दिलचस्पी थी, ये बताने की, कि इन विमानों की खिड़कियों में हैरान करने वाले इलेक्ट्रानिक शीशे लगे हुए थे, जिनमें एक बटन दबा कर अंधेरा और उजाला किया जा सकता है। आम तौर पर विमानों की खिड़कियों में पर्दे होते हैं, और लंबी उड़ान में रात और दिन का फासला मिटाने के लिए विमान परिचारिकाएं खिड़की के पर्दे को बंद करवाती या खुलवाती हैं। लेकिन ड्रीमलाइनर विमान में खिड़कियों के शीशे ऐसे थे, जिनसे विमान में रात और दिन का माहौल रिमोट से बना दिया जा सकता है।

सिडनी से दिल्ली की सीधी उड़ान करीब 13 घंटे की है। समय के अंतर की वजह से ये जरूरी हो जाता है कि 13 घंटे की इस उड़ान में एक रात और दिन का माहौल बनाया जाए (जेट लैग से बचाने के लिए)। कुल जमा इतनी-सी बात कि उड़ान के बेड़े में दो तीन साल पहले ही शामिल हुए थे ड्रीम लाइनर। ये तब सबसे आधुनिक विमान थे। हमें बताया गया था कि हमारी उड़ान ड्रीमलाइनर में हो रही है।

मैंने लिखा था कि उस विमान की खिड़की के शीशे मुझे ‘मानवीय रिश्तों’ की तरह लगने लगे थे। ऐसे शीशे जो आदमी की तरह सिर्फ ‘मान लेने भर से’ दिन को रात में तब्दील कर देते हैं। जाहिर है, उन शीशों में इलेक्ट्रानिक सेंसर लगा था। मेरी यात्रा सुबह शुरू हुई, और तीन घंटे के भीतर विमान में शाम और फिर रात का माहौल ऐसे बना कि पता ही नहीं चला, 12 घंटे मैं कैसे हमने 24 घंटे जी लिए।

संसार मान लेने पर टिका है। मैं फेसबुक पर जब लिखने आया था, तो मैंने मन में मान लिया था कि आप सब अब मेरे रिश्तेदार हैं। आप में से ही कोई मेरी मां है, कोई बहन है, कोई भाई है। मैंने मान लिया कि आप सबके होते हुए मैं अकेला नहीं हूं। और मान लेने (भरोसा) की कड़ी में ही हम जब किसी विमान में बैठते हैं, किसी ट्रेन या बस में बैठते हैं, जिसमें हमारी ज़िंदगी किसी और के हाथों में होती है, तो हम मान लेते हैं कि हम सुरक्षित (भरोसा) हैं।

हमारे पास मानने का आधार होता है। लेकिन जब किसी और की चूक, भूल से कोई हादसा हो जाए तो, हमारे मान लेने पर संदेह खड़ा हो जाता है। आज बहुत से सवाल उठेंगे, उनका जवाब तलाशना चाहिए।

मैं सीधे-सीधे अमदाबाद से लंदन के लिए उड़े विमान की कहानी नहीं सुना रहा, क्योंकि विमान हादसे की खबर कल दोपहर से सुन-सुन कर आप अब तक ‘श्मशान वैराग्य’ से बाहर निकल चुके होंगे। नहीं निकले होंगे तो ‘मान लेने का वो यकीन’, जो कल तक आपको था, आज थोड़ा डगमगाया होगा।

एअर इंडिया पहले सरकारी इकाई थी। सारी जिम्मेदारी सरकार की थी। सरकार कोई भी काम अपने दम पर नहीं करती, हमारे दम (पैसों) पर करती है। हम सरकार पर यकीन करते हैं, क्योंकि हमने उन्हें अपना यकीन दिया होता है। लेकिन हम किसी प्राइवेट कंपनी पर वो यकीन (सरकार की तुलना में) कम देते हैं, क्योंकि वहां भाव ‘लाभ’ का होता है। सरकार का भाव ‘कल्याण’ का होता है (होना चाहिए)।

इसमें संदेह नहीं कि ड्रीमलाइनर विमान आधुनिक विमान हैं। लेकिन पिछले कुछ दिनों से अमेरिका की बोइंग कंपनी संदेह के घेरों में थी। बोइंग कंपनी के विमान में खामियां बताई गई थीं और बताया था कि ये खामियां कभी बड़े हादसे की वजह बन सकती हैं। विमान जब जमीन पर खड़े होते हैं, तो उन्हें कोई भय नहीं होता। लेकिन विमान ज़मीन पर खड़े होने के लिए नहीं होते, आसमान में उड़ने के लिए होते हैं। जो भय होता है, उड़ते हुए ही होता है। जब ये आशंका जग जाहिर हो चुकी थी, तो एअर इंडिया कंपनी ने बोइंग के संचालन पर क्या सावधानी बरती थी? ये तत्काल ऑडिट का विषय होना चाहिए।

पिछले कुछ दिनों से एक नहीं, कई वीडियो वाइरल हुए जब कभी ‘प्रजा कल्याण’ की संस्था रही एअर इंडिया टाटा के पास जाकर ‘मुनाफे की औलाद’ बन गई थी। याद कीजिए, कुछ ही दिन पहले किया गया देश के कृषि मंत्री और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान का वो ट्वीट, जिसमें उन्होंने भर पेट एअर इंडिया को कोसा था। उन्होंने लिखा था कि भोपाल से दिल्ली के लिए के समय पता चला कि एअर इंडिया के विमान में उनकी सीट टूटी हुई थी। संदेह नहीं कि टाटा कंपनी सरकार की दुलरुआ कंपनी है और ऐसे में शिवराज का ट्वीट कुछ कह रहा था, जिसकी ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया, सिवाय टाटा के इतना कह भर देने के कि वो देखेंगे, गलती कहां हुई।

आप चाहे टाटा को लेकर जो सोचते हों, लेकिन ये सोचने में मत चूकिएगा कि व्यापारी व्यापारी होता है। उसी के लिए कहावत बनी है कि घोड़ा घास से दोस्ती कर ले तो खाएगा क्या?

जो विमान कल उड़ते ही एक आवाज़ के साथ सदा के लिए उड़ गया, वो एक भरोसेमंद विमान था। जो पायलट थे, वो अनुभवी थे। विमान पुराना था लेकिन ऐसा नहीं था कि अपनी उम्र जी चुका था। फिर प्रश्न उठता है कि संजय सिन्हा कहना क्या चाहते हैं? मौसम ठीक था। विजिबिलिटी पूरी थी। हवा का रुख भी ठीक था। ऐसे में बस दो सवाल-

  1. क्या उड़ान से पूर्व विमान की तकनीकी जांच (पूरी हुई थी–होती ही है)।
  2. इस हादसे पर फांसी की सजा किसे सुनाई जाएगी? किसे सुनाई जानी चाहिए? सरकार को या टाटा संस को?

सरकार के पास अब कुछ है नहीं, सिवाय मंत्रियों के। मंत्री अफसोस जता सकते हैं, टाटा मुवावजा दे सकती है। लेकिन उन लोगों का क्या, जिनके लिए कल दोपहर तक सूरज रोज उग रहा था, नारंगी के आकार की धरती रोज घूम रही थी। वो अब कभी नहीं…

मेरा प्रश्न छोटा-सा है। हत्यारा कौन? ध्यान रहे, ये प्राकृतिक आपदा नहीं है। चाहे जिस स्तर पर हो, मानवीय भूल से उपजी आपदा ही है।

नोट- जब विमान सरकार के पास नहीं। एयरपोर्ट सरकार के पास नहीं। तो मंत्री और इतना बड़ा उड्डयन विभाग सरकार के पास क्यों (हमारे पैसों पर पलने वाले परजीवी)? मेरी मांग है, दोषी (जिम्मेदार) को फांसी। उससे कम कुछ नहीं।

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