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एविएशन कवर करने वाले पत्रकार एयर इंडिया की यात्रा को लास्ट ऑप्शन में क्यों रखते हैं? जानिए

प्रदीप सुरिन-

क्या आप जानते हैं कि एविएशन कवर करने वाले ज़्यादातर पत्रकार एयर इंडिया से यात्रा करने को सबसे लास्ट ऑप्शन रखते हैं. पिछले पंद्रह सालों में (जब से मैंने एविएशन कवर करना शुरु किया) मेरी भी सबसे लास्ट चॉइस एयर इंडिया ही रही.

ये जो आज अहमदाबाद में बोइंग 787 ड्रीमलाइनर क्रैश हुआ इससे कोई भी पुराना एविएशन रिपोर्टर हैरान नहीं है. बस ये घटना इतने सालों बाद क्यों हुआ ये मेरे लिए सरप्राइज़ था.

एयर इंडिया में बोइंग 787 ड्रीमलाइनर आने के दो साल बाद ही इसके महँगे मेंटेनेंस को लेकर सवाल उठने लगे थे. पायलटों की हड़ताल और एयर इंडिया के ख़स्ताहाल के बीच जो सबसे हैरानी वाली बात निकलकर आई थी, जिसे कोई पत्रकार हिम्मत करके भी नहीं छाप पाया था वो ये है कि एयर इंडिया की इंजीनियरिंग टीम ने एक रिपोर्ट तैयार की थी जिसमें साफ़ लिखा गया था कि कंपनी के पास अपने एयर क्राफ़्ट्स के नए स्पेयर पार्ट्स ख़रीदने तक के पैसे नहीं है. और कई सालों तक तो पुराने घिसे पिटे पार्ट्स को ठीक करके ही प्लेन उड़ाए गए. शायद आज भी वैसा ही हो रहा है.

पिछले दो दशकों में ऐसी कई घटनाएँ हुई जिसमें आम यात्रियों को ये बोला जाता रहा कि कुछ टेक्निकल कारणों से एयर इंडिया की फ़्लाइट रद्द हो गई है. लेकिन एयर इंडिया के पायलट और इंजीनियर दोस्त बताते रहे कि फटे-पुराने टायरों या फिर घटिया स्पेयर पार्ट्स की वजह से प्लेन नहीं उड़ पाए.

मुझे ये बताने में बिलकुल भी हिचक नहीं है कि जब भी मुझे मजबूरन एयर इंडिया की फ़्लाइट लेनी पड़ी मैंने हर फ़्लाइट से पहले प्लेन के टायरों की तरफ़ देखा कि कहीं ये घिसे हुए तो नहीं हैं?

2013 में मैंने अपनी आख़िरी बार बोइंग 787 ड्रीमलाइनर में दिल्ली से लंदन तक की यात्रा की. लेकिन उस वक़्त भी प्लेन की हालत बेहद ख़राब थी. इंजन काफ़ी वाइब्रेट कर रहे थे और लैंडिंग इतनी हार्ड थी कि लगा नेपाल के किसी थर्ड हैंड फ़्लाइट में सफ़र कर रहे हों. अब सवाल ये है कि अहमदाबाद की घटना क्यों हुई और ज़िम्मेदार कौन?

तो इसे सीधे शब्दों में समझिए. सरकार एयर इंडिया बेचना चाहती थी और ये टाटा समूह को ही बेचना चाहती थी. रतन टाटा की दिली ख्वाहिश भी थी कि एयर इंडिया एक बार फिर टाटा समूह के पास आ जाए. लेकिन अगर एयर एशिया और सिंगापोर एयरलाइंस के पेंच को हटा भी दें तो भी टाटा की मैनेजमेंट एयर इंडिया की ख़स्ताहाल की वजह से इसे ख़रीदने से कतराती रही. मौजूदा सरकार ने एक तरह से जबरन करोड़ों रुपए के रीबेट के साथ एयर इंडिया को टाटा समूह की झोली में डाल दिया.

टाटा समूह को एयर इंडिया के कबाड़ में तब्दील हो रहे फ्लीट की चिंता सता रही थी. लेकिन नए प्लेन ख़रीदना मारूति या हंडे की कार ख़रीदने जितना आसान भी नहीं है. टाटा ने एयर इंडिया के लिए जिन नए प्लेन्स का ऑर्डर‍ दिया उन्हें आने में अभी भी लगभग 2-3 साल लगेंगे. ऐसे में कंपनी बेचारी क्या करती? सबसे आसान तरीक़ा यही था कि यात्रियों को लुभाने का लोगो बदल दीजिए, एयर होस्टेस की ड्रेस अप़डेट कर दीजिए और प्लेन के सीट कवर बदल दीजिए. कंपनी ने वही ही किया. लेकिन इंजन उसी तरह ठीक कराते रहे जैसे कोई अपनी कार को शोरूम में ठीक करवाने की जगह नज़दीकी कार मार्केट में ठीक करा लेता है.

आज मैं सिविल एविएशन के अपने कुछ पुराने दोस्तों से बात कर रहा था. हमने निष्कर्ष निकाला कि अहमदाबाद में प्लेन क्रैश की घटना को अंततः पायलट की गलती या कुछ बेहद बेतुके कारणों को वजह बताते हुए दरकिनार कर दिया जाएगा. क्योंकि अगर इस घटना में कहीं भी बोइंग 787 ड्रीमलाइनर में दोष पाया गया तो एयर इंडिया को अपने सभी मौजूदा बोइंग 787 ड्रीमलाइनर्स को ग्राउंडड करना होगा. और अगर ऐसा कुछ हुआ तो घाटे में चल रही एयर इंडिया को पूरी तरह से बंद होने से कोई नहीं रोक सकता.

आप देखिएगा ख़ुद सरकार भी पूरी कोशिश करेगी की ICAO, FAA और बोइंग से आने वाली टीम को खिला-पिला कर ऐसे ही रवाना कर दे. वैसे भी ये एजेंसी अपनी कोई भी रिपोर्ट आम लोगों के साथ साझा नहीं करती इसी लिए इनसे ज़्यादा ख़तरा नहीं है. लेकिन टाटा समूह को जो माल चिपकाया है उसके लिए इस घटना पर पर्दा डालना कौन सी बड़ी बात है.

बाकि रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में कमीशन बनेगी ही. दो तीन साल में लोग इसे भी भूल ही जाएँगे. PS: 1, चिड़िया के टकराने से बोइंग 787 ड्रीमलाइनर क्रैश नहीं होता. 2. टेकऑफ के समय दोनों इंजन चालू रहते हैं.

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