प्रियदर्शन-
बीते तीन दिन से ‘नई धारा’ के पदाधिकारियों की ओर से किसी प्रतिक्रिया का इंतज़ार करता रहा। मेरी अपेक्षा थी कि पटना के दुर्भाग्यपूर्ण प्रसंग पर उनकी ओर से कोई वक्तव्य आएगा। वह नहीं आया तो अब यह कहने को मजबूर हूं।
कृष्ण कल्पित बरसों से मेरे परिसर में निषिद्ध हैं। फेसबुक पर डेढ़ दशक से ज़्यादा समय से रहते हुए बहुत-सारे लोगों से विवाद हुए- कुछ कटुता की हद तक भी पहुंचे। लेकिन मैंने किसी को ब्लॉक नहीं किया।
मगर कृष्ण कल्पित को किया था। क्योंकि उनके स्त्रीद्वेषी वक्तव्य इतने अरुचिकर और लगभग आपराधिक थे कि उनके साथ चलना मुश्किल था। मैंने लिखा भी था- कृष्ण कल्पित की विकृतियां उनकी कृतियों पर भारी हैं।
लेकिन जिस लेखक के साथ मुझे चलना नामुमकिन लगा था, हिंदी का समाज उसके साथ चलता रहा। कृष्ण कल्पित सभी मंचों पर दिखते रहे, उनकी कविता पुस्तकें आती रहीं, उन्हें फेसबुक पर सराहा जाता रहा, वे पुरस्कृत किए जाते रहे। तब किसी ने नहीं कहा कि अमुक पत्रिका का बहिष्कार होना चाहिए, क्योंकि वहां कृष्ण कल्पित छप रहे हैं। किसी ने उन प्रकाशनों का बहिष्कार नहीं किया जहां से उनकी किताबें आ रही थीं। यानी हिंदी समाज में वे अपनी बदनामी के बावजूद स्वीकृत थे। जब उनको फेलोशिप दिए जाने की ख़बर आई, तब भी सबने बधाई दी, किसी ने फेलोशिप के बहिष्कार की बात नहीं कही। यह मैंने सुना है कि फेलोशिप के दौरान भी फेसबुक पर उनकी टिप्पणियां वाहवाही लूटती रहीं। इस पूरे दौरान उनके प्रशंसकों में बड़ी तादाद में प्रगतिशील मित्र भी रहे। मैं इनमें कभी नहीं रहा।
लेकिन उनको फेलोशिप कैसे मिली? हम तीन निर्णायक थे, हमारे पास संस्था की ओर से कुल चार प्रविष्टियां आईं। मेरे ध्यान में था कि मुझे दो लोगों का चुनाव करना है। मेरी अनुशंसा में दो लेखिकाएं ऊपर थीं। मैंने बहुत स्पष्ट लिखा था कि कृष्ण कल्पित जैसे सीनियर लेखक को ऐसी किसी फेलोशिप के लिए नहीं चुना जाना चाहिए। (मेरी यह राय मेल पर भी है।) बेशक, उनकी प्रविष्टि अच्छी थी, लेकिन मैंने उन्हें नीचे रखा। फिर मुझे बताया गया कि बाक़ी दो निर्णायकों की सूची में वे ऊपर हैं और कुल तीन लोगों को रेज़िडेंसी मिल रही है। मैंने बहुमत का सम्मान करते हुए निर्णय स्वीकार किया। बेशक, इस फैसले से अब भी अपने को अलग नहीं कर सकता, क्योंकि यह सामूहिक फ़ैसला था।
कृष्ण कल्पित ने जो कुछ किया, कोई भी संवेदनशील लेखक उसकी निंदा करेगा। मैं भी कर रहा हूं। मगर इस बेहद संवेदनशील मामले में किसी भी कानूनी कार्रवाई का अधिकार पीड़ित लड़की के पास है। उसकी निजता बेहद महत्वपूर्ण है- सिर्फ़ कानूनी तौर पर नहीं, उसके अपने सामाजिक आयाम भी हैं। हालांकि इसके लिए इंसाफ करने या उसको इंसाफ़ दिलाने की हड़बड़ी में सोशल मीडिया इस निजता को तार-तार कर चुका है। यह भी दरअसल उस लड़की के प्रति अपराध है।
यह टिप्पणी इसलिए लिखी है कि यह एहसास है कि ऐसी कोई घटना होती है तो स्त्री-अनुभव की वेदना एक सामूहिक चीत्कार की तरह उभरती है जिसे समझते हुए ही हम कुछ और परिपक्व और संवेदनशील हो सकते हैं। लेकिन इसकी आड़ में कुछ पेशेवर क़िस्म के ट्रोलरों की बिठाई कचहरी में जवाब देना मेरा मक़सद नहीं है। बस यह ख़याल आया कि वाक़ई बहुत सारे मित्रों को मेरा पक्ष जानने की अपेक्षा थी।
तो यह रहा मेरा पक्ष। अब आप निंदा, भर्त्सना या मॉब लिंचिंग का अपना शौक पूरा करने को स्वतंत्र हैं। मुझसे और जवाब की अपेक्षा न रखें।
अंतिम बात- अब भी मुझे ‘नई धारा’ की ओर से किसी संवेदनशील प्रतिक्रिया और कार्रवाई की अपेक्षा और प्रतीक्षा है। यह अपेक्षा पूरी न हुई तो इस संस्था के आयोजनों से मेरा कोई संबंध नहीं रहेगा।
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