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कृष्ण कल्पित कांड में सनसनीखेज मोड़ : पीड़िता शिवांगी गोयल ने जारी किया पत्र!

उपरोक्त पत्र शिवांगी गोयल ने अपने एफबी वॉल पर पोस्ट किया है

कात्यायनी- बहुत अच्छा शिवांगी! हम सभी एकदम तुम्हारे साथ खड़े हैं कन्धे से कन्धा मिलाकर, हर कदम पर। अपनी बात खुलकर लिखो। बहुतेरे नामचीन और छुटभैय्ये प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से कृष्ण कल्पित पतित के बचाव में और प्रकारांतर से तुम्हें ही कटघरे में खड़ा करने की घृणित और बेशर्म कोशिशों में लगे हैं। ये प्रगतिशीलता की खाल ओढ़े बर्बर मर्दवादी हैं। साहित्यिक दुनिया और सोशल मीडिया पर इनकी संगठित खाप पंचायतें अहर्निश सक्रिय रहती हैं। इनके साथ आमने-सामने की भिड़ंत करनी ही होगी।

कल्याण आर गिरी- आरोपी ने लिखित माफी मांगी? वह माफीनामा सार्वजनिक किया जाना चाहिए।

शिवांगी गोयल- नहीं माँगी

कल्याण आर गिरी- फिर विधिक कार्रवाई की योजना है आपकी या नहीं, शराब का एंगल है कई जगह पढ़ने में आया कि शराब का सेवन किया गया था। आपके द्वारा भी और आरोपी के भी। क्या आरोपी शराब का सेवन किया था? हिम्मत रखिए, आप आम लड़की नहीं हैं। और आप साहसी भी हैं कि आपने आवाज उठाई लेकिन किसी दुराचारी को उसके कुकृत्य के लिए उपयुक्त सज़ा दिलाने के प्रयास का भी पूरा साहस रखिए। आप अकेली नहीं हैं। ख़ुद को किसी भी तरीके से कमजोर न समझें।

शिवांगी गोयल– झूठ है ये। जहाँ से पढ़ने में आया था वहाँ से सबूत माँगिए, मुझसे नहीं। पहली शिकायत आपसे पूछकर नहीं की थी और ना करने के बाद फेसबुक पर पोस्ट की थी; विधिक कार्यवाही भी आपके हिसाब से नहीं करूँगी, अपने हिसाब से करूँगी। हर कार्यवाही आपके लिए फेसबुक पर पोस्ट नहीं की जाएगी, FIR की कॉपी भी आपको नहीं भेजूँगी। मुझे मेरे हिसाब से जीने दीजिए, प्लीज़। कोई फेसबुक का व्यक्ति मेरे साथ हर तारीख पर कचहरी नहीं चलेगा, मुझे जाना है, मैं देख लूँगी। आपके फेसबुकीय समर्थन के लिए धन्यवाद।


पंकज चतुर्वेदी-

सब अन्दर से टूट गया है

19 जून, 2025 को लिखी गई शिवांगी गोयल {Shivangi Goel} की ‘रात के साढ़े तीन बजे हैं’ शीर्षक कविता में बयान का जो शान्त, शाइस्ता और मार्मिक लहजा है, उसमें एक हाहाकार छिपा है, जो अपनी सादगी और मायूसी से सहसा स्तब्ध और बेचैन कर देता है। यह रचना एक आईना है, जिसमें हिन्दी के समकालीन साहित्यिक समाज की जो तस्वीर नज़र आती है, उससे डर लगता है :

“सब अन्दर से टूट गया है
तुम पूछोगे किसने तोड़ा
एक नाम ले पाऊँगी क्या?”

शर्म आनी चाहिए उन्हें, जो उत्पीड़क का बचाव कर रहे थे और शायद अब भी कर रहे हों। जो ललकार रहे थे कि सामने आओ, नाम लो; उन्हें इस कविता की चुप्पियों में पढ़ना चाहिए कि एक लड़की को कितने आत्म-संघर्ष और तकलीफ़ से गुज़रना पड़ता है, जब उसे ऐसे अनचाहे विवाद में घसीटा जाता है। साहित्य और साहित्यकार–जिन्हें स्त्री को आत्मीयता, शक्ति और अभय दे सकना चाहिए था–वे सिर्फ़ अजनबीपन, भय और सन्ताप बाँट रहे हैं :

“रोते-रोते मर जाना पर – नाम न लेना
बड़े लोग हैं, बड़े नाम हैं
कल की लड़की – कौन हो तुम?
तुम्हें कौन सुनेगा?”

पूरी कविता पढ़िए और आप पाएँगे कि हम कोई सभ्य समाज अभी तक नहीं बन पाए, क्योंकि इसमें आकर एक स्त्री को लगता है, जैसे वह अपने परिजनों से बिछुड़कर किसी अरण्य में, किसी गिरोह में फँस गई है और इससे उसे जूझना है। स्वप्न देख सकने के लिए तो राहत, ख़ुशी और नींद चाहिए; लेकिन यहाँ सिर्फ़ एक रतजगे का उजाड़ और स्वप्नहीनता है :

रात के साढ़े तीन बजे हैं

शिवांगी गोयल

रात के साढ़े तीन बजे हैं
जाने कैसी सोच में गुम हूँ
कितनी रीलें देख चुकी हूँ
मन फिर भी तो बुझा हुआ है
जीत गई या हार रही हूँ
अब तक कोई ख़बर नहीं है
अम्मा-बाबा जगे हुए हैं, हैराँ से हैं
भाई मुझसे लिपट गया था
रो उट्‌ठा था
उसके आँसू याद आ रहे
उसकी बेचैनी भी मेरे पोर-पोर में जाग उठी है

सब अन्दर से टूट गया है
तुम पूछोगे किसने तोड़ा
एक नाम ले पाऊँगी क्या?
मेरी आँखें आसमान के उस तारे को देख रही हैं
तुम भी देखो
देखो मेरे नानाजी हैं तारा बनकर
बोल रहे हैं मुझसे लोगों की मत सुनना
उम्र, पढ़ाई, नाम, पदक – सब बेमानी है
लोग कहेंगे चुप रहना, सब सह लेना
लोगों की परिभाषाएँ सब बेमानी है

दरवाज़े पर खटके से दिल काँप गया है
छुपकर देखा – कोई नहीं है – बेचैनी है
रात अँधेरी, कोई नहीं है, बेचैनी है
नींद कहाँ है?
शायद बिस्तर के नीचे है, झुककर देखें?
डर लगता है – किससे लेकिन?
एक नाम ले पाऊँगी क्या? सख़्त मनाही है

डरना हो तो डर सकती हो लेकिन सख़्त मनाही है
न! तुम कोई नाम न लेना!
रोते-रोते मर जाना पर – नाम न लेना
बड़े लोग हैं, बड़े नाम हैं
कल की लड़की – कौन हो तुम?
तुम्हें कौन सुनेगा?

रात समेटो, नींद उठाओ
ठीक तो हो तुम; ठीक नहीं क्या?
क्या पागलपन रोना-धोना
मुँह पर कस के पट्टी बाँधो
चुप – सो जाओ!


राहुल पांडेय-

सबसे पहले उन लोगों का शुक्रिया जिन्होंने लड़की की पहचान गैरकानूनी तरीके से पब्लिक की। उसकी निजता और उसकी सुरक्षा का ख्याल किए बिना। आपको क्या लगा लड़की डर जाएगी?

उन लोगों का भी शुक्रिया जिन्होंने लड़की को ना जानने के बाद भी उसके चरित्र पर सवाल उठाए और रेजिडेंसी जैसे शब्द को सहवास तक कह डाला। आपको क्या लगा आपकी सस्ती ट्रोलिंग से लड़की डर जाएगी?

उन लोगों का भी शुक्रिया जिन्होंने आरोपी की जात पूछी। उम्मीद है आप जान गए होंगे कि आरोपी किस जात का है।

उस लड़की के पास सारे सबूत हैं जिनके आधार पर आरोपी को रेजिडेंसी से बाहर का रास्ता दिखाया गया।

आप शायद समझ नहीं सकते कि ऐसे किसी मामले में किसी महिला को किन सामाजिक और मानसिक कष्ट से गुजरना पड़ता है। खैर आप समझेंगे भी कैसे! आप ही वो झुंड हैं।

आपको दिक्कत थी कि वो लड़की तस्वीर में मुस्कुरा रही थी! हाँ वो मुस्कुराएगी क्योंकि रोना उसको चाहिए जिसने गलत किया है।

और हाँ, आप सोशल मीडिया ट्रायल कर रहे हैं ना तो ये सुनिए आप सब की कही हर एक बात, हर बनाए हुए गलत नैरेटिव का चिट्ठा भी इकट्ठा है! और ये सब समय आने पर माननीय न्यायालय में उपलब्ध करवाए जाएंगे।

हाँ, ये काम आपके दबाव और आपकी मर्ज़ी से नहीं होगा, ये फैसला वो साहसी लड़की ही करेगी। Shivangi Goel तुम्हारे साहस को सलाम है।

तुम मुस्कुराओ। मुस्कुराते हुए सुंदर लगती हो। तुम्हारी हिम्मत आवाज़ है उन सभी महिलाओं की जो अपने परिवार और समाज के डर से चुप रहीं। खूब खुश रहो। आग लगा दो इन सबकी नींद में। इनको लगता है पीड़िता बिलखती है। बिलखा दो इन सबको।

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