
इसमें राजनीतिक नेतृत्व के बंधनों के कारण ‘कुछ’ लड़ाकू जेट के नुकसान की खबर भी छोटी या बड़ी, छप ही गई है साथ में महाराष्ट्र की त्रिभाषा नीति को वापस लिये जाने का प्रचार जोरदार है।
संजय कुमार सिंह
इंडियन एक्सप्रेस में आज डिजिटल घोटाले की एक विस्तृत कहानी है। इसमें बताया गया है कि बैंक खातों से पैसे उड़ाने वाले मिनटों में करोड़ों रुपये कई बैंकों में भेज देते हैं। ये बैंक (खाते) कई राज्यों में होते हैं और अधिकारी देखते रहते हैं कि उन्हीं खातों का उपयोग बार-बार होता है। आप जानते हैं कि सरकार ने नियम कितने सख्त कर दिये हैं, बैंक में खाता रखना महंगा हो गया है और केवाईसी की सख्ती ऐसी है कि उसके नाम पर भी लूट और ठगी होती है। वरना कोई कारण नहीं था कि कोई आपको फोन करके धमकाये आपके केवाईसी पूरा नहीं है। अभी जैसे बता रहा हूं वैसे कीजिये और नहीं करेंगे तो आपके खाते से इतने पैसे कट जायेंगे और खाता बंद कर दिया जायेगा। अमृतकाल से पहले या जब भ्रष्टाचार होता था तब केवाईसी जरूरी नहीं था फिर भी खाते से गड़बड़ी होती नहीं थी और अगर हुई तो अपराधी पकड़े जाते थे। अब केवाईसी जरूरी है। इतना कि खाता बंद कर दिया जाता है और ऐसे खातों से अपराध के पैसे इधर-उधर होते हैं। आम आदमी के लिए नियम है कि बिना पैन नंबर 50,000 रुपये से ज्यादा नकद जमा नहीं करा सकते और लाखों-करोड़ों खाते में इधर से उधर हो जायें कोई पकड़ने वाला नहीं है और शिकायत करने पर भी अपराधी पकड़े नहीं जाते हैं। सब मोबाइल फोन से होता है। आम आदमी के लिए मोबाइल लेना मुश्किल है लेकिन अपराधियों को मोबाइल नंबर से पकड़ा नहीं जाता।
इंडियन एक्सप्रेस की आज की खबर के अनुसार 2022 में 39925 वारदातें हुईं और 91.14 करोड़ रुपये की ठगी हुई। 2023 में 60676 वारदातें हुईं और इनमें 339.03 करोड़ की ठगी हुई। 2024 में वारदातों की संख्या काफी बढ़ गई और 1,23,672 में 1,935.51 करोड़ रुपये की ठगी हुई। 2025 में 28 फरवरी तक ही 17718 वारदातों में 210.21 करोड़ रुपये की ठगी हो चुकी थी और यह राज्यसभा में दी गई सूचना है। इसके बाद सरकार ने कुछ किया या नहीं, फोन पर चेतावनी सुनने को जरूर मिली। देखना है उसका कितना फायदा हुआ और कितने लोग बचे क्योंकि ठगने-लूटने की कोशिश में फोन तो उसी रफ्तार में आ रहे हैं और भले कहा जाता हो कि शिकायत दर्ज कराइये, ऐसा कर पाना आसान नहीं है और शिकायत दर्ज हो भी जाये तो लूट के पैसे वापस मिलने की संभावना कितनी है आप जानते हैं। इस खबर में एक खास बात यह है कि एक कोऑपरेटिव बैंक के डायरेक्टर और उनके दो सहयोगियों को भी गिरफ्तार किया गया है तथा 58 लाख रुपये बरामद हुए हैं। एक और दिलचस्प मामला यह है कि 11 ‘म्यूल’ अकाउंट का पता चला है और ये 81 शिकायतों के केंद्र में हैं। इन खातों के जरिये 21 करोड़ रुपये गुजरे हैं। इस तरह, सरकार जब अरविन्द केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को भ्रष्ट साबित करने में लगी है, वाशिंग मशीन राजनीति कर रही है तब डिजिटल चोरों ने हर साल सैकड़ों वारदात किये हैं सैकड़ों करोड़ की रकम लूटी है।
कहने की जरूरत नहीं है कि जांच एजेंसियां वहां नहीं लगाई गई होंती तो इनपर लगाम कसा गया होता पर ‘सरकार’ की अपनी प्राथमिकता है। वे विरोधियों को सताने और नियंत्रित करने में ही लगे रहे। उनके साथियों सहयोगियों ने तो काम करने के लिए नहीं ही कहा मीडिया ने भी ‘मन की बात’ का प्रचार करना जरूरी समझा। आज भी कई अखबारों में कल के मन की बात पहले पन्ने पर है। दि एशियन एज ने तो लीड ही बना दिया है। मुख्य शीर्षक है, “मोदी ने इमरजेंसी की ज्यादतियों को याद किया, कांग्रेस पर निशाना साधा”। इसमें बताया गया है कि अपने कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने इमरजेंसी विरोधी नेताओं के बयान सुनाये। मुझे नहीं पता कि एक प्रधानमंत्री के रूप में यह कितना महान कार्य है लेकिन कांग्रेस की आलोचना की उनकी आदत या जरूरत का हिस्सा तो है ही और मुझे नहीं लगता है कि 11 साल में लोगों को यह मालूम नहीं है और जिसे यह सब सुनना होगा वह कल रेडियो पर सुन चुका होगा तो आज किसके लिए छापा गया है। वह भी लीड। इस खबर के जो फ्लैग शीर्षक हैं जो बुलेट के साथ हैं। पहले के अनुसार मन की बात में मोदी ने न सिर्फ ज्यादतियों पर रोशनी डाली बल्कि यह भी कहा कि कहा कि संविधान की हत्या की गई बल्कि न्यायपालिका को अपनी कठपुतली बना ली। यही नहीं, प्रधानमंत्री ने अपने इस कार्यक्रम में सामाजिक सुरक्षा योजनाओं की भी प्रशंसा की।
‘मन की बात’ के इस प्रचार में यह नहीं बताया गया है कि ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान भारत को राजनीतिक नेतृत्व के बंधनों के कारण ‘कुछ’ लड़ाकू जेट का नुकसान हुआ। यह खबर आज हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने पर विस्तार से है। इसके अलावा यह सिंगल कॉलम में है या नहीं है। ‘मन की बात’ करने वाले नरेन्द्र मोदी कांगेस को भ्रष्ट कहते रहे हैं पर सच्चाई यह है कि कांग्रेस ने देश को आरटीआई कानून दिया था। अमृतकाल में आरटीआई कानून से सरकार को कितनी परेशानी है अभी बताने की जरूरत नहीं है। अभी बताया जा रहा है कि इमरजेंसी बुरी थी पर अभी का सेंसर महसूस नहीं हो रहा है। द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार, इंडोनेशिया में भारत के रक्षा अताशे कैप्टन शिव कुमार ने जकार्ता में एक सेमिनार कहा कि भारत को लड़ाकू जेट का नुकसान राजनीतिक नेतृत्व के बंधनों के कारण हुआ। निश्चित रूप से यह एक नई और महत्वपूर्ण सूचना है और पत्रकारीय नियमों और परंपरा के अनुसार पहले पन्ने की ही खबर है। फिर भी आज यह खबर किसी अखबार में नहीं है। दिलचस्प यह है कि सेमिनार 10 जून को हुआ था और तब किसी ने इसपर ध्यान नहीं दिया या चूक गये। रविवार को एक वीडियो से इसका खुलासा हुआ। कैप्टन कुमार के अनुसार, लड़ाकू जेट के नुकसान का कारण यही है कि राजनीतिक नेतृत्व ने यह रोक लगाई थी कि पाकिस्तान के रक्षा प्रतिष्ठानों और वायु सुरक्षा केंद्रों पर हमला नहीं किया जाये। हालांकि, कैप्टन कुमार ने यह भी कहा है कि नुकसान के बाद हमने अपना तरीका बदला और उनके सैनिक प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया। कहने की जरूरत नहीं है कि पुलवामा हमले को पाकिस्तान की कार्रवाई बताकर, ऑपरेशन सिन्दूर के नाम पर युद्ध छेड़ देना, पाकिस्तान के हमले में जम्मू में जान-माल के भारी क्षति और फिर अचानक युद्ध विराम ने पहले ही इस कार्रवाई को संदिग्ध बना रखा था। उसके बाद खबर आई कि यह हमला पाकिस्तान को पूर्व सूचना देकर किया गया था। लड़ाकू विमान के नुकसान की बात तो स्वीकार की जा चुकी थी पर उसका कारण अब मालूम हुआ है। इसलिये, जाहिर तौर पर यह एक महत्वपूर्ण और जानने लायक खबर है।
हिन्दी के मेरे दोनों अखबारों में रथयात्रा में भगदड़ और उत्तरकाशी में बादल फटा जैसी खबरें छाई हुई हैं। अमर उजाला के दो पहले पन्ने की खबरों में इमरजेंसी या मन की बात से जुड़ी आज की खबर नहीं है। लेकिन नवोदय टाइम्स में है और टॉप पर बॉक्स में छपी खबर का शीर्षक है, “आपातकाल से लड़ने वालों को याद किया जाना चाहिये : मोदी”। इंडियन एक्सप्रेस में इमरजेंसी की खबर आज भी है और सभी अखबारों के मुकाबले ज्यादा विस्तार व प्यार से है। आज की एक दिलचस्प खबर महाराष्ट्र की त्रिभाषा नीति को वापस लिये जाने का प्रचार भी है। अमर उजाला की खबर के अनुसार, यह नीति जारी करने के संबंध में सरकार संकल्प अप्रैल और जून में लिया गया था। आज इसे वापस लेने का प्रचार ज्यादा जोर शोर से है और हिन्दी ही नहीं अंग्रेजी अखबारों में भी प्रमुखता से है। द हिन्दू ने इसे लीड बनाया है जबकि टाइम्स ऑफ इंडिया में यह सेकेंड लीड है ।


