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आज के अखबार : हेडलाइन मैनेजमेंट के तहत द हिन्दू और दूसरे अखबारों ने ‘हिन्दू’* होने का धर्म निभाया है

संजय कुमार सिंह

आज जब ज्यादातर अखबारों की लीड उप सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल राहुल आर सिंह का खुलासा है तब मेरे आठ अखबारों में सिर्फ दो, द हिन्दू और अमर उजाला में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। दि एशियन एज में यह खबर लीड नहीं है लेकिन पहले पन्ने पर है और सेकेंड लीड है। उपसेना प्रमुख के ऐसे खुलासे को इतने समय बाद लीड नहीं बनाना या पहले पन्ने पर ही नहीं रखना हेडलाइन मैनजमेंट का प्रभाव हो सकता लेकिन यह भी संभव है कि अब स्थितियां ऐसी हो गई हैं कि ज्यादातर अखबारों ने आज इसे लीड बना दिया है। आप जानते हैं कि प्रधानमंत्री ने साढ़े तीन करोड़ की आबादी वाले घाना की संसद को संबोधित किया और उसकी खबर यहां प्रमुखता से छपी लेकिन यहां से जाने से पहले विपक्ष ने देश की संसद का विशेष सत्र बुलाने की मांग की थी तो उसपर ध्यान नहीं दिया गया और मानसून सत्र शुरू करने की घोषणा समय से पहले कर दी गई थी। अब उप सेना प्रमुख राहुल आर सिंह के खुलासे के बाद कांग्रेस ने चीन मुद्दे पर चर्चा कराने की मांग फिर की है। सरकार की कार्रवाई और मांग पर सुनवाई तो बाद की बात है आज उसकी खबर मेरे आठ अखबारों में कहीं प्रमुखता से नहीं है। इनके अलावा, देशबन्धु में मुझे यह प्रमुखता से छपी दिखी। उप सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल राहुल आर सिंह ने जो कहा है उसमें यह भी है कि ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान चीन ने अपने हथियारों को परखा और भारत को पाकिस्तान के अलावा दो अन्य दुश्मनों, चीन और तुर्की का सामना करना पड़ा। बेशक, यह एक महत्वपूर्ण खुलासा है और सरकार (या प्रधानमंत्री) ने बिना सोचे समझे अथवा सलाह किये ऑपरेशन सिन्दूर की घोषणा कर दी थी जो बाद में युद्ध में बदल गया और उसका खुलासा अब हुआ है।

अब जब हिन्दू ने इसे लीड नहीं बनाया और पहले पन्ने पर भी नहीं रखा है तो यह बताना उचित होगा कि हेडलाइन मैनेजमेंट के लिए उसपर दबाव बनाने के लिए क्या सब किया जा चुका है। अमर उजाला संभवतः शुरू से ही ‘हिन्दू’ था, बाद में ऐसा कुछ हुआ हो तो मुझे जानकारी नहीं है। 25 अप्रैल के अंक में द हिन्दूने प्रधानमंत्री की धमकी (या घोषणा) को नीचे रखा था जबकि पाकिस्तान की कार्रवाई को ऊपर रखा था, लीड बनाया था। पूरा हिन्दू समाज (अखबार का नहीं, भले अखबार समेत) इससे परेशान हो गया था। ईमानदारी से कहूं तो भाजपा और संघ परिवार का इको सिस्टम इससे बुरी तरह परेशान नजर आया था। इसपर मैंने उस दिन लिखा भी था। याद दिलाने के लिए बताऊं कि एस गुरुमूर्ति ने एक्स पर लिखा था, “यह इस्लामाबाद के डॉन के एडिशन का शीर्षक नहीं लग रहा है”। मालिनी पार्थसारथी ने उसे रीट्वीट करते हुए लिखा था, संपादकीय टीम की इस असंवेदनशील और गैर देशभक्तिपूर्ण ले आउट से निराश हूं। मालिनी के अनुसार इस मुश्किल समय में देशहित दांव पर है और उसकी रक्षा सर्वोपरि है तब मीडिया के लिए रचनात्मक भूमिका निभाना जरूरी है। मैंने लिखा था कि यह भूमिका, वही (होगी) जो बिना रीढ़ के केंचुआ जैसा हो। मैंने तभी लिखा था कि यह यह हेडलाइन मैनेजमेंट के लिए दबाव बनाने की चाल है। जो भी हो, इन तथ्यों के आलोक में आज द हिन्दू का यह शीर्षक और आठों अखबार में इस खबर का लीड होना मायने रखता है। (2 मई 2025)

घोषित-अघोषित इमरजेंसी

जो नहीं जानते उन्हें बता दूं कि पेशे से चार्टर्ड अकाउंटैंट एस गुरुमूर्ति, अरुण शौरी के साथ उनके संपादन में इंडियन एक्सप्रेस में बोफर्स और रिलांयस पर लिखते रहे हैं। बोफर्स से संबंधित कुछ खुलासे जो इंडियन एक्सप्रेस के अभियान से अलग होते या दिखते वे उन दिनों द हिन्दू में छपते थे। बोफर्स मामले में राजीव गांधी के खिलाफ कुछ मिला नहीं और जांच बंद हो गई। लेकिन उन दिनों द हिन्दू के लिए जीनिवा से रिपोर्ट करने वाली खोजी पत्रकार चित्रा सुब्रमण्यम ने अपनी किताब, बोफोर्स गेट में कथित गुप्त बैठकों का खुलासा करते हुए कहा है, भारतीय अधिकारियों ने राजीव गांधी से जुड़े घोटाले को छिपाने के लिए 1987 में बोफर्स के अधिकारियों को प्रशिक्षित किया था। इस किताब का हवाला देते हुए भाजपा ने सोनिया और राहुल गांधी से संसद की सदस्यता से इस्तीफा मांगा है। कथित तौर पर इस किताब में इतालवी बिचौलिए क्वात्रोची के साथ कांग्रेस के संबंधों को उजागर किया गया है। यह सब अखबारों-पत्रिकाओं में छपा है। छपता रहा है। दूसरी ओर, राफेल सौदे पर सरकार ने कुछ नहीं बताया, जो रिपोर्टिंग हुई उसे आप जानते हैं और सरकारी अधिकारियों ने कुछ नहीं बताया या यहां के अखबारों में बोफर्स की तरह नहीं छपा तो क्या अलग उपाय किये गये हैं यह भी सबको पता है पर उसकी चर्चा नहीं होती है। दूसरी ओर, बोफर्स पर स्वीडन में उस समय के राजदूत बीएम ओजा की किताब, दि एम्बैसडर्स एविडेंस 1997 में ही आई थी। आप इसे घोषित और अघोषित इमरजेंसी के अंतर के रूप में भी देख सकते है। रफाल पर पत्रकार परंजय गुहा ठकुरता की किताब फ्लाइंग लाईज जरूर है पर एआई के अनुसार, उनपर मानहानि के कई मुकदमे दर्ज हैं। इनमें से कुछ अदाणी समूह से संबंधित हैं। 2021 में मानहानि के एक मामले में उनकी गिरफ्तारी का वारंट जारी किया गया था, जिसे बाद में वापस लिया गया। इसके अलावा, उनके फोन को पेगासस स्पाइवेयर से संक्रमित पाया गया था। समझना मुश्किल नहीं है कि ऐसा क्यों हुआ होगा और किस स्तर की सक्रियता का नतीजा हो सकता है।

वक्फ कानून पूरी तरह लागू

अमर उजाला में आज यह खबर लीड नहीं है तो जो खबर लीड है वह इलाहाबाद हाईकोर्ट में हिन्दू पक्ष की याचिका खारिज कर दिये जाने से संबंधित है। देशबन्धु में इसका शीर्षक है, मथुरा की शाही ईदगाह मस्जिद विवादित ढांचा नहीं। सबको पता है कि यह प्रयास या याचिका पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 के बावजूद है जिसका मकसद, “किसी भी पूजा स्थल के धर्मांतरण को प्रतिबंधित करने और किसी भी पूजा स्थल के धार्मिक चरित्र को 15 अगस्त 1947 को जैसा था बनाए रखने और उससे संबंधित या प्रासंगिक मामले हैं।” इस अधिनियम की संवैधानिकता पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका लंबित है। यह याचिका भारतीय जनता पार्टी की दिल्ली इकाई के वकील और पूर्व प्रवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने दायर की है। इसमें अधिनियम की धारा 2, 3 और 4 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। वाराणसी में ज्ञानवापी मस्जिद के सर्वेक्षण की अनुमति देने पर सुनवाई के दौरान, न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि किसी पूजा स्थल के “धार्मिक चरित्र” का पता लगाना अधिनियम द्वारा वर्जित नहीं है। इसके बाद नवंबर 2024 में, जिला अदालत ने संभल स्थित शाही जामा मस्जिद के सर्वेक्षण का आदेश दिया तो घातक हिंसा भड़क गई थी। इसके बाद, दरगाह के नीचे मंदिर होने के दावे किये ही जा सकते हैं और मामले चल रहे हैं। इसलिए, अमर उजाला ने आज खबर दी है, … हिन्दू पक्ष ने ढांचे को ध्वस्त करने की मांग की थी और बताया है कि हिन्दू पक्ष आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगा। दूसरी ओर, वक्फ अधिनियम के संबंध में सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है, संसद द्वारा बनाए गए कानून पर रोक नहीं लगाई जा सकती। फैसला नहीं हुआ है और आज अमर उजाला की खबर है, सरकार ने पोर्टल से जुड़े नियम अधिसूचित कर दिये हैं और इसका अर्थ है कानून अब पूरी तरह लागू है।

नरेन्द्र मोदी का प्रचार और बिहार

इन दो खबरों के अलावा आज की तीसरी खबर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का प्रचार है। नवोदय टाइम्स की सेकेंड लीड का शीर्षक है, आतंकवाद मानवता का दुश्मन : मोदी। दि एशियन एज की लीड है, भारत जल्दी ही तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होगा : मोदी। हिन्दुस्तान टाइम्स की सेकेंड लीड पीयूष गोयल के हवाले से है। उन्होंने कहा है, अंतिम समय से पहले काम पूरा करने के लिए व्यापार सौदे में जल्दबाजी नहीं करूंगा। हालांकि, द हिन्दू की खबर के अनुसार, भारत ने डब्ल्यूटीओ से कहा है कि वह अमेरिकी आयात पर 724 मिलियन डॉलर का जवाबी टैरिफ लगा सकता है। द टेलीग्राफ में पहले पन्ने की दूसरी महत्वपूर्ण खबर केरल कांग्रेस में खादी को लेकर विभाजन से संबंधित है। खबर के अनुसार वरिष्ठ पुरुष नेता तो खादी पहनते हैं पर युवा कैजु्अल वीयर में दिखते हैं। जो भी हो, तथ्य यह है कि बिहार में मतदाता सूची का सघन पुनरीक्षण गंभीर होता जा रहा है और इसकी खबर बहुत कम है। देशबन्धु के अनुसार पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव ने 9 को बिहार बंद की अपील की है। इस दिन चुनाव आयोग के कार्यालय का घेराव भी किया जायेगा। इंडियन एक्सप्रेस ने बताया है कि चुनाव आयोग जिन 11 दस्तावेजों की मांग कर रहा है उनमें से एक को भी पाना कितना मुश्किल है और क्यों। दरभंगा डेटलाइन से एक दूसरी खबर बताती है कि चुनाव आयोग का नया आदेश जमीन पर पुराने मामले याद दिलाता है और बेहद पिछड़ी जाती (ईसीबी) में कई कागज और स्पष्टता के लिये परेशान हैं। ऐसी खबरें होती तो पहले पन्ने पर ही होतीं, नहीं हैं तो समझना मुश्किल नहीं है क्यों नहीं हैं।

कहने की जरूरत नहीं है कि चुनाव आयोग के काम और पुराने रिवाजों के अनुसार इन दस्तावेजों की जरूरत ही नहीं है और अभी तक की व्यवस्था के अनुसार किसी चुनाव क्षेत्र में रहने वाला 18 वर्ष से ऊपर का व्यक्ति वहां का मतदाता है। ठीक है कि उसे भारत का नागरिक होना चाहिये पर इसकी पुष्टि या इससे बचने के उपाय करना चुनाव आयोग का काम नहीं है और अभी तक ऐसा नहीं हुआ है। इसके उलट, चुनाव आयोग का काम है कि किसी चुनाव क्षेत्र में रहने वाले आम लोगों को मतदाता बनाया जाये और यह सुनिश्चित किया जाये कि उनके वोट पड़ें। इसमें यह कल्पना कहीं नहीं है कि किसी चुनाव क्षेत्र में विदेशी या घुसपैठिये रहेंगे। इसे रोकना चुनाव आयोग का काम नहीं है और सरकार न रोक पाये तो चुनाव आयोग उन्हें मतदाता न माने या उनका नागरिक होना सुनिश्चित करे यह चुनाव आयोग का काम नहीं रहा है। वैसे भी विदेशी या कश्मीरी अथवा किसी और राज्य के शरणार्थियों की बात अलग है। राज्यों के लोगों को तो बाहरी माना ही नहीं जाता है और जन्म प्रमाणपत्र या माता-पिता के जन्म प्रमामपत्र मांगने का कोई मतलब नहीं है। 1947 में भारत आये ऐसे कई लोग यहीं रह गये, उन्हें मकान व दूसरी सुविधायें दी गईं, इस सरकार ने विदेशी नागरिकों के लिए कानून बनाया है और उसमें भी हिन्दुओं से कोई भेदभाव नहीं है और नाम पूछकर मारा जा सकता है तो नाम पूछकर या धर्म पूछकर मतदाता बनाया जाना चाहिये पर इस बार बिहार की बात अलग है तो क्यों है यह बिहार वालों को समझना है। जहां तक मीडिया की बात है, वह तो बहस करवा रहा है कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाना सही है? उसे दिख ही नहीं रहा है कि चुनाव आयोग निष्पक्ष है ही नहीं।

* ‘हिन्दू’ – भाजपा समर्थक / प्रचारक

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