सिद्धार्थ कलहंस-
हमारे समय के और हमसे भी पहले से लगातार सक्रिय पत्रकार दिलीप सिन्हा की अंत्येष्टि पर भैंसाकुंड में और बाद में पूरा दिन यही सोचता रहा कि हमेशा तन्हा दिखने वाले, कभी किसी तस्वीर के फ्रेम में आने की कोशिश न करने वाले इस खमोश तबियत के आदमी ने कितनी विशाल सामाजिक पूंजी बटोरी थी।
राजधानी में किसी मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त पत्रकार के दिवंगत होने पर यों तो नेता से लेकर संगठनों की दर्जनों संवेदनाएं आती हैं और खासी भीड़ अंत्येष्टि स्थल पर भी नजर आती है। दिलीप भाई को अंतिम विदाई देने उमड़ी भीड़ अलहदा थी। अरसे बाद पत्रकारिता जगत के सक्रिय, निष्क्रिय, नौजवान, अधेड़ और ताजा दाखिल पीढ़ी कोई छूटा नहीं था।

घाट पर जुटे सैकड़ों गमगीन चेहरे ये गवाही दे रहे थे कि दुर्घटना के समय जेब में बस एक कार्ड और कलम में रखने वाले दिलीप सिन्हा ने कितनी अपार सामाजिक पूंजी इक्ट्ठा की थी।
कल पोस्टमार्टम हाउस पर फफकते हुए वरिष्ठ पत्रकार अफ़ज़ल अंसारी ने बताया कि कैसे उनके अस्वस्थ होने पर दिलीप सिन्हा ने उनकी बेटी से कहा था कि कभी रात दो बजे भी जरूरत पड़ने पर बुला लेना।
तमाम आपसी कटुता को भुला ऐसे चेहरे एक साथ सर जोड़ कर गम बांट रहे थे जिन्हें देखकर शायद दिलीप भाई भी खुश होते।
तीन दशकों की पत्रकारिता में सैकड़ों बार साथी पत्रकारों के साथ कुछ अनहोनी होने पर भैंसाकुंड गया पर जितने लोग दिलीप सिन्हा के लिए आए, कभी शायद देखना हुआ।
दिलीप सिन्हा जी की उम्र भले 70 पार थी पर गेटअप, शरीर व रखरखाव किसी नौजवान से कम नहीं था। अक्सर मैं कहता था कि दिलीप भाई सौ साल में भी ऐसे दिखोगे तो कहते अरे नहीं बस ऐसे तमन्ना है कि बिना किसी बीमारी के फटाफट निकल जाऊं और आखिरी वही हुआ।
दिलीप भाई के लिए ही लगता है ये लाइनें लिखी गई थी
मौला ये तमन्ना है कि जब जान से जाऊं
जिस पर शान से आया था उसी शान से जाऊं
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