विवेक त्रिपाठी-
ये फोटो वरिष्ठ पत्रकार दिलीप सिन्हा की मृत देह की है.. एक्सीडेंट में नहीं रहे. पुलिस ने जब पहचान के लिए उनके कपड़े खंगाले तो कलम और कार्ड के सिवा कुछ न मिला.. वही कलम जो उनकी शर्ट की जेब से झांक रही है..

दिलीप सिन्हा लखनऊ में पत्रकारपुरम में रहते थे. आज लोहिया पथ पर जियामऊ के सामने एक बस ने उनकी स्कूटी में टक्कर मार दी. उन्हें सिविल अस्पताल लाया गया जहां डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया. दिलीप जी ने लंबे समय पत्रकारिता की.. अभी अपना डिजिटल प्लेटफार्म लांच करने की तैयारी कर रहे थे. पत्रकारों के हितों के लिए दिलीप जी हमेशा तत्पर रहते थे. पत्रकारों को चिकित्सकीय सुविधा मिले, इसके लिए प्रयास कर रहे थे.
ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दें..
अमरेन्द्र प्रताप-
श्रद्धा नमन…. अरे…बस ऐसे ही चले गए “दिलीप सिन्हा सर”… कल रात में ही हुई थी मुलाकात, बैठे थे साथ, आज नहीं रहे….
विश्वास ही नहीं हुआ, जब साथी अभिषेक मिश्रा का अचानक फोन आया कि, “सिविल अस्पताल से बोल रहा हूं, हम लोगों के सीनियर दिलीप सिन्हा सर की एक्सीडेंट में मृत्यु हो गई है। बॉडी मोर्च्यूरी में है” कानों ने सुना, पर दिल ने नहीं माना। मैंने कई बार अभिषेक से कई तरीके से पूछा, परन्तु सच नहीं बदला “दिलीप सिन्हा सर” चले गए थे।

सोचो, एक स्वस्थ कुशल मंगल व्यक्ति, बिल्कुल नौजवानों सी चाल ढाल, स्फूर्ति, अंदाज और दमदार बातचीत, उम्र भले उनकी जो भी हो, परन्तु उनकी फिटनेस और जीवटता से वे बिल्कुल नौजवान थे। विशेष प्रकार का हेयर स्टाइल, फिल्मों के हीरो जैसे कपड़ों में दिलीप सिन्हा सर एकदम कड़क पर्सनालिटी नजर आते थे। कल पहले दिन में प्रेस रूम में मिले और फिर देर शाम को प्रेस क्लब में, कहां मालूम था कि इन्हें कल ही कुछ हो जायेगा, वरना मैं दस बारह बार उनके पैर तो छू ही लेता।
मान्यता समिति के कई बार सदस्य चुने गए, नेशनल हेराल्ड जैसे संस्थान में काम कर चुके दिलीप सिन्हा सर बड़े भाईसाहब सुरेश बहादुर सिंह जी और पीके तिवारी सर के बहुत अच्छे दोस्त थे। मान्यता समिति के चुनाव में वो हेमंत तिवारी जी के सबसे मजबूत दूत की भूमिका निभाते थे। अपना चुनाव तो वो वरिष्ठों के सहयोग से यूं ही जीत जाते थे। लगते तो वो हेमंत जी के लिए ही थे।
चुनाव – फ़ुनाव सब जो था वो तो था ही, परन्तु दिलीप सिन्हा सर थे सबकी चिंता करने वाले, मेरी नालायकियों पर वो मुझे रेलते तो खूब थे, परन्तु स्नेह कितना करते थे यह समझना बहुत मुश्किल है।
निर्मम, निर्दयता से भरी प्रकृति ने एक दुर्घटना के माध्यम से एक जबरदस्त व्यक्तित्व पत्रकारिता जगत से छीन लिया। खुद उन्हें या किसी अन्य को ईश्वर ने कोई मौका नहीं दिया कि दिलीप सर होते। बस की टक्कर से जान गंवाने वाले “दिलीप सिन्हा सर” के लिए बस यही कह सकता हूं कि, ऐसे कैसे चले गए आप? कुछ तो समय देते ईश्वर आपको, आपके अपनों को और आपके जानने वाले पत्रकारिता जगत को।
सादर अश्रुपूरित नमन…..मन में हमेशा बने रहेंगे आप सर..
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