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आज के अखबार : जंग, झूठ और पत्रकारिता में ऑपरेशन सिन्दूर, जवान की पिटाई और देशभक्ति

अमूमन राहुल गांधी और कांग्रेस का सवाल पहले पन्ने पर मूल खबर के साथ नहीं है तो मूल खबर लीड से लेकर सिंगल कॉलम तक में है। “लड़ाई किसकी, शहादत किसकी, खबर किसकी?” में गंभीरता और प्रस्तुति देखने व गौर करने लायक है।

संजय कुमार सिंह

आज के अखबारों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प का यह खुलासा महत्वपूर्ण है कि हाल के भारत-पाकिस्तान युद्ध या टकराव (असल में ऑपरेशन सिन्दूर) में कम से कम पांच विमान मार गिराये गये हैं। द टेलीग्राफ में आज यह खबर लीड है। शीर्षक है, “ट्रम्प का दावा : पांच जेट गिराये गये”। उपशीर्षक के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत-पाकिस्तान के नुकसान की बात तो की लेकिन यह नहीं बताया है कि किस देश के कितने विमान गिराये गये। जाहिर है, भारत में प्रधानमंत्री (या सरकार) से यह सवाल बनता है कि इनमें कितने भारत के थे। न सिर्फ विमानों के लिए या युद्ध का नफा-नुकसान जानने के लिए बल्कि पायलट और उनके परिवार के लिए भी। शहीद पायलट (अगर कोई है) तो उनका नाम सार्वजनिक होना चाहिये, उनका सम्मान भी। देश के लिए शहीद होने वाले की गुमनाम मौत – सोच कर ही देशभक्ति के दावों पर शर्म आने लगती है। उस पर तुर्रा यह कि अमर उजाला की एक खबर के अनुसार, रिश्वतखोरी में बीएसएफ के दो अफसर गिरफ्तार किये गये हैं। आरोप है कि इन लोगों ने शिकायतकर्ता के बकाया वेतन भुगतान के लिए दो लाख रुपये की घूस मांगी थी और 40 हजार रुपये की रिश्वत लेते गिरफ्तार किया गया है। सीबीआई के पुराने कारनामे और उपयोग के आधार पर खबर पढ़कर यही लगा कि सरकार सेना के लोगों को भी नहीं बख्श रही है और उनके पीछे भी सीबीआई लगा रखी है। लेकिन सीमा सुरक्षा बल के अफसर रिश्वतखोरी करेंगे तो कार्रवाई होगी ही, सबको बचाना भी तो संभव नहीं है और यह सब जो कर रहा है उसकी प्राथमिकता तो होगी ही। ऐसे में सेना का सम्मान और सेना के लिए देशभक्ति जैसी बातें भ्रामक लगती हैं और ऑपरेशन सिन्दूर के बहाने सेना या युद्ध के राजनीतिक उपयोग की शंका मजबूत होती है।

ऐसे में खबर को सही संदर्भ में नहीं पेश करना पत्रकारिता के खिलाफ तो है ही देशभक्ति या देशहित के खिलाफ भी है। इसके बावजूद पत्रकारिता के नाम पर सरकार का प्रचार तथा बचाव खुलकर हो रहा है और इसमें इस बात भी चर्चा नहीं हुई कि पहलगाम हमले का जवाब ऑपरेशन सिन्दूर नामक युद्ध कैसे हो सकता है और अगर छेड़ ही दिया था, पूरे देश का सहयोग था तो अचानक युद्ध विराम कैसे हो गया और हो ही गया तो उसकी घोषणा अमेरिकी राष्ट्रपति ने क्यों की? जाहिर है, वे अपनी राजनीति कर रहे होंगे पर हम, ‘अबकी बार ट्रम्प सरकार’ भी तो कह चुके हैं। ऐसे ट्रम्प जो कर रहे हैं वह क्यों कर रहे हैं इसे जानना-समझना तो कोई भी चाहेगा। वह चाहे अमेरिका में हो या भारत में या ट्रम्प की मेहरबानी से बेड़ियों में भारत वापस भेज दिया गया हो। अखबार अपना यह बुनियादी और जरूरी काम नहीं कर रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि यह सब हिन्दुत्व की सेवक और प्रचारक सरकार के समर्थन में उसे मजबूत और बेहतर दिखाने के लिए किया जा रहा है। आप चाहें तो कह सकते हैं कि उनसे करवाया जा रहा है। एक पाठक के रूप में आपके या मेरे लिये दोनों में ज्यादा अंतर नहीं है। हमारे लिये इस बात का मतलब है कि सरकार युद्ध में हुए नुकसान की जानकारी नहीं दे रही है और विपक्ष के नेता पूछ रहे हैं तो अखबार में खबर छप रही है या नहीं।

इसलिये यह देखना दिलचस्प होगा कि ट्रम्प के दावे और उस पर राहुल गांधी के सवाल को आज के अखबारों ने कैसे छापा है। यह खबर हिन्दुस्तान टाइम्स में सिंगल कॉलम में है जबकि टाइम्स ऑफ इंडिया में लीड के साथ सिंगल कॉलम में है। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड सैटेलाइट से लिये गये तस्वीरों और उससे मिले संकेतों पर है। यह भारत-पाक युद्ध के समय किराना हिल्स स्थित पाकिस्तान के परमाणु केंद्र पर भारत के हमले से संबंधित खबर है। इसलिए ट्रम्प का खुलासा इसी के साथ सिंगल कॉलम की खबर के रूप में है। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड अहमदाबाद की वायु दुर्घटना से संबंधित प्राथमिक जांच रिपोर्ट पर अमेरिकी एनटीएसबी (नेशनल ट्रांसपोर्टेशन सेफ्टी बोर्ड) की प्रतिक्रिया है। इसलिए ट्रम्प की खबर अलग सिंगल कॉलम में है। अखबार ने इसे टॉप पर तो रखा है लेकिन राहुल गांधी या कांग्रेस का सवाल इसके साथ नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस में यह टॉप पर दो कॉलम में है और लीड के साथ छपी है। राहुल गांधी या कांग्रेस का सवाल यहां भी नहीं है। इस खबर के ठीक नीचे दो कॉलम की एक और खबर का शीर्षक है, ट्रम्प के दावों के बीच उप राष्ट्रपति ने कहा, कोई भी ताकत भारत से शर्तें नहीं मनवा सकती है। हेडलाइन मैनेजमेंट यही है, लेकिन उपराष्ट्रपति ने कहा है तो खबर है ही। इंडियन एक्सप्रेस ने इसे बताते हुए ट्रम्प के दावे के साथ इसे छाप दिया है और ऐसा किसी के आदेश पर भी किया गया हो तो अगली बार आदेश देने वाले सोचेगा या और स्पष्ट आदेश देगा। इस बीच अगर कोई समझना चाहे तो समझ सकता है कि आदेश मानते हुए, विज्ञापन का दबाव झेलते हुए भी स्वतंत्र पत्रकारिता की जा सकती है। हालांकि ऐसी पत्रकारिता के लिए खुद स्वतंत्र विचारों का होना उतना ही जरूरी है वरना आप गुलामी के कारणों को उचित ठहराने लगेंगे जो हाल में एक महान पत्रकार ने किया है। 

द हिन्दू में ट्रम्प के खुलासे पर कांग्रेस का सवाल लीड के शीर्षक में ही है। हिन्दी में यह कुछ इस तरह होगा, जेट (के नुकसान) पर ट्रम्प की टिप्पणी को लेकर कांग्रेस ने स्पष्टता की मांग की। उपशीर्षक में बताया गया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह बताये बगैर कि किस देश को नुकसान हुआ, कहा है कि भारत पाक टकराव में पांच जेट मार गिराये गये थे। कांग्रेस नेता ने कहा है कि देश को सच्चाई जानने का अधिकार है। अखबार ने ट्रम्प के इस दावे से संबंधित पूरे वाक्य को हाईलाइट किया हुआ है। दि एशियन एज में यह खबर सेंकेड लीड है। शीर्षक है, “ट्रम्प के ‘पांच जेट गिराये गये’ के दावे से भारत में उठा-पटक”। उपशीर्षक है, कांग्रेस ने कहा प्रधानमंत्री को बोलना चाहिये। भाजपा ने कहा, देशद्रोही मानसिकता। मुझे नहीं लगता कि बिल्कुल मनमाने अंदाज में ऑपरेशन सिन्दूर जैसे नाम से युद्ध शुरू करके उसे अचानक बंद कर देना ठीक है और युद्ध विराम की घोषणा करने वाले के यह कहने पर कि पांच जेट का नुकसान हुआ यह पूछना गलत है कि इसमें भारत का हिस्सा कितना है। जो भी हो, खबरों की प्रस्तुति और शीर्षक से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि कौन देशभक्ति कर रहा है और कौन सरकार की भक्ति।

हिन्दी अखबारों में नवोदय टाइम्स में यह खबर लीड है। शीर्षक है, “ट्रम्प शिगूफा : ऑपरेशन सिन्दूर में मार गिराये पांच विमान, बताया नहीं किसके”। इस खबर का इंट्रो है, फिर किया सैन्य टकराव समाप्त करवाने का दावा। दो कॉलम की इस लीड के नीचे राहुल गांधी की फोटो के साथ दो कॉलम की खबर है, “मोदी जी पांच जहाजों का सच क्या है : राहुल”।  अमर उजाला में यह दो कॉलम की खबर है, “भारत-पाकिस्तान संघर्ष में गिराये पांच विमान : ट्रम्प”। देशबन्धु में यह खबर चार कॉलम में है। एक लाइन का शीर्षक है – “ट्रम्प फिर बोले, भारत-पाकिस्तान जंग रुकवाई”। राहुल गांधी का सवाल, पांच जहाजों का सच क्या है और देश को जानने का हक है, इसके साथ है। दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में यह खबर दो कॉलम में सबसे नीचे छह कॉलम के बॉटम के साथ दो कॉलम की खबर है। कांग्रेस का सवाल शीर्षक में या हाईलाइट किया हुआ नहीं है। बॉटम का शीर्षक है, 37 साल बाद दिवंगत कैप्टन की पत्नी को मिला न्याय। देशभक्ति से ओतप्रोत यह खबर इस प्रकार है, पाकिस्तान के खिलाफ मोर्चा लेने में घायल एक जांबाज के दिवंगत होने के बाद उनकी पत्नी विशेष पारिवारिक पेंशन के लिए 37 साल तक संघर्ष करती रही …. आखिर सशस्त्र बल अधिकरण (एएफटी) की लखनऊ खंडपीठ ने रक्षा मंत्रालय को वर्ष 1988 से विशेष पारिवारिक पेंशन का लाभ देने का आदेश दिया है। इस खबर से मूल सूचना के अलावा यह भी पता चलता है केंद्र में सत्ता बदलने के बाद भी रक्षा मंत्रालय के रवैये में कोई बदलाव नहीं आया और पारिवारिक पेशन देने का आदेश एएफटी को ही देना पड़ा। रक्षा मंत्रालय ने खुद नहीं दिया और देशभक्त सरकार के शासन में भी 11 साल से ज्यादा निकल गये।

इन दो खबरों के अलावा आज दो और खबरें हैं जिनकी प्रस्तुति से डबल इंजन वाली सरकारों के प्रति अखबारों का रुख समझा जा सकता है। दैनिक जागरण में चार कॉलम की एक खबर का शीर्षक है, कांवड़ियों ने सीआरपीएफ जवान को पीटा, सात गिरफ्तार। मामला रेलवे स्टेशन का है और कार्रवाई रेल पुलिस ने की है जो अभी हिन्दी पट्टी की पुलिस जैसी नहीं हुई है। शीर्षक में सात के खिलाफ कार्रवाई की बात है लेकिन खबर में बताया गया है कि तीन आरोपित कांवड़ियों के खिलाफ रेलवे अधिनियम के तहत केस दर्ज किया गया है। नाबालिग समेत चार कांवड़ियों के खिलाफ एक्सट्रा फेयर टिकट (ईएफटी) के तहत चालान किया गया है। खबर कहती है कि, वीडियो में स्पष्ट देखा जा सकता है कि कई कांवड़िये जवान की लात घूंसों से पिटाई कर रहे हैं लेकिन खबर तीन के खिलाफ ही मुकदमा दर्ज होने की है। चार का तो टिकट मामले में चालान किया गया है। फिर भी शीर्षक में सात गिरफ्तार बड़ी बात है और संभवतः चार कॉलम में छपने का कारण यह भी हो सकता है। इसके जरिये यह बताने की कोशिश की गई है कि कांवड़ियों के उत्पाद के लिए कार्रवाई हुई है। आज दैनिक जागरण के साथ अमर उजाला की लीड भी धर्मांतरण के मामले में 10 गिरप्तार खबर है। लेकिन कांवड़ियों के हाथों जवान की पिटाई को कम महत्व दिया गया है। अमर उजाला में जवान की पिटाई पहले पन्ने पर नहीं है। अमर उजाला में, अजमेर में बारिश से बहने लगे लोग खबर है जबकि यह जागरण में नहीं है।

मिर्जापुर रेलवे स्टेशन पर कावड़ियों के हाथों जवान की पिटाई अंग्रेजी अखबारों में है लेकिन हिन्दी में नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस में यह दो कॉलम की खबर है और सात के खिलाफ कार्रवाई ही शीर्षक में है। द टेलीग्राफ में यह सिंगल कॉलम की खबर है। शीर्षक है, कांवड़ियों ने जवान के साथ मार-पीट की। इसी तरह उड़ीशा में एक नाबालिग का अपहरण कर आग लगा देने की खबर है। द टेलीग्राफ में सेकेंड लीड, इस खबर के अनुसार हमलावरों की पहचान नहीं हुई है और अपराध का कारण भी तय नहीं हुआ है। यह खबर द हिन्दू में तीन कॉलम में है जबकि हिन्दुस्तान टाइम्स और दि एशियन एज में भी पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम में है।  डबल इंजन वाले राज्यों में अच्छी सुरक्षा के दावों के बावजूद इस तरह की वारदातें अपनी जगह हैं। इन खबरों को प्रमुखता नहीं देना अलग किस्म की भक्ति है जो इन दिनों खूब दिखाई देती है। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का नारा और बेटियों के खिलाफ अपराध नहीं रोक पाना एक मामला है लेकिन उसकी खबरों को महत्व नहीं देना बिल्कुल अलग है। अपराधी भाजपाई हो तो और सन्नाटा रहता है। दूसरी ओर ऐसी कोई वारदात पश्चिम बंगाल में हो जाये तो खबर छूट नहीं सकती। भले अपराधी गिरफ्तार हो जाये, केस सुलझ जाये पर सीबीआई से जांच की मांग होती है और हुई भी है। हिन्दी पट्टी की घटना को कवर करने जाने वाले को फर्जी मुकदमे में फंसाने का उदाहरण है।   

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