
संजय कुमार सिंह
इन दिनों जब वोट चोरी का मुद्दा गर्म है, एसआईआर में मनमानी जारी है, चुनाव आयोग रोज अपने नये अधिकार बता रहा है तो सुप्रीम कोर्ट में मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति से संबंधित मामले की कोई खबर नहीं है। राष्ट्रपति ने हाल में सुप्रीम कोर्ट से 14 सवाल पूछे थे। लेकिन सुप्रीम कोर्ट को उसके कर्तव्य की याद दिलाने वाली कोई खबर नहीं है। हो भी कैसे जब हाल तक उपराष्ट्रपति रहे जगदीप धनखड़ की ही कोई खबर नहीं है। कुल मिलाकर, लग रहा है कि लोया से शुरू हुई कहानी धनखड़ पर समाप्त हो गई हो। पर यह खबर नहीं है। असल में नये उपराष्ट्रपति का चुनाव अभी नहीं हुआ है तब भी यह चिन्ता नहीं है कि पुराने उपराष्ट्रपति ने क्या वाकई स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा दिया? अगर नहीं तो क्या उसी सरकार ने उन्हें इसके लिए मजबूर किया जिसपर आरोप है कि वोटों की चोरी से सत्ता में है। विपक्ष के नेता ने दावा किया कि मशीन से पढ़ने योग्य (देश भर की) मतदाता सूची दी जाये तो वे यह साबित कर देंगे कि सरकार बनाने के लिए जरूरी 25 सीटें वोटों की चोरी से जीती गई हैं। इसके बावजूद (या इसीलिये) उनसे बेमतलब की पूछताछ चल रही है और बिहार के प्रारूप मतदाता सूची की जगह अब उसकी तस्वीर लगा दी गई है। कुल मिलाकर स्थितियां काफी गंभीर लगती हैं पर अखबारों में ऐसा नहीं लगता है। ज्यादातर अखबार सरकार की प्रशंसा और अपनी पीठ खुद थपथपाने का प्रचार कर रहे हैं।
आज देशबन्धु में एक खबर है, धनखड़ की कोई जानकारी न होना चि्ताजनक है। यह यहां शिवसेना (यूबीटी) सांसद संजय राउत की फोटो के साथ है। उन्होंने कहा है कि यह भारत जैसा लोकतांत्रिक देश के लिए गलत है। इसके अलावा, मेरे नौ अखबारों में सिर्फ एक देशबंधु की लीड का शीर्षक है, चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्ष करेगा मार्च। उपशीर्षक है, विपक्ष के नेताओं ने चुनाव आयुक्तों से भी मुलाकात का समय मांगा। इस खबर का फ्लैग शीर्षक है, चुनावों में धांधली के खिलाफ विपक्ष एकजुट। दूसरे अखबारों की खबरों से नहीं लग रहा है कि विपक्ष सरकार को इस तरह घेर चुका है। वोटों की चोरी से सत्ता में होने के आरोप और सरकार के समर्थन में कुछ खास नहीं होने के बावजूद खबरें ऐसे छपी हैं जैसे सब चंगा सी। उदाहरण के लिए हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड चुनाव आयोग का यह दंभ है कि वह हटाये गये नामों का खुलासा करने के लिए कानूनन बाध्य नहीं है। अगर ऐसा है या इसे मान लिया जाये तो यह भी मानना पड़ेगा और होगा ही कि उसने किसे वोटर बनाया है, यह बताने के लिए बाध्य नहीं है। शायद इसीलिये राहुल गांधी ने जिन फर्जी वोटरों की खबर बताई है उसे स्वीकार करने की बजाय चुनाव आयोग ने उन्हें पत्र लिखा है, पूछताछ में सकुन रानी ने कहा है कि उन्होंने एक ही बार वोट किया है, न कि दो बार जैसा कि आपने आरोप लगाया है। यहां सवाल है कि दो बार नाम होना ही गलत है तो उसपर कार्रवाई करने उसका जवाब देने की बजाय चुनाव आयोग यह साबित करने में क्यों लगा है कि श्रीमती शकुन रानी ने एक ही बार वोट दिया। वोट एक ही बार पड़ा हो, दो बार नाम होना सही है? इसका जवाब क्यों नहीं, कौन देगा और कब?
यह खबर आज टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने पर है लेकिन इसका विवरण कम है। हालांकि यह खबर इतनी आम नहीं है जैसा अखबारों ने आज इसके साथ व्यवहार किया है। पत्र में आगे कहा गया है, इस कार्यालय द्वारा की गई प्राथमिक जांच से पता चलता है कि आपने अपने प्रेजेंटेशन में सही का निशान लगा जो दस्तावेज दिखाया है वह चुनाव अधिकारी द्वारा जारी दस्तावेज नहीं है। हो सकता है न हो और होना जरूरी भी नहीं है। लेकिन अपने आका की सेवा में चुनाव आयोग के मुखिया के मातहतों को शायद यह बताये जाने की जरूरत है कि मतदान के समय चुनाव आयोग के अधिकारी के अलावा सभी दलों या उम्मीदवारों के नुमाइंदे होते हैं जो मतदाता सूची पर मतदान करने आये मतदाता के नाम के आगे निशान लगाते हैं। राहुल गांधी को यह दस्तावेज अपनी या किसी और पार्टी के एजेंट से मिला हो सकता है और जरूरी नहीं है कि चुनाव आयोग का अधिकृत दस्तावेज इससे अलग हो। इसके अलावा वोट पड़ा या नहीं, मुद्दा ही नहीं है, मुद्दा (जो चुनाव आयोग को देखना है) यह है कि दो बार नाम कैसे है? इसका जवाब देने या तलाशने की जगह चुनाव आयोग लगभग फालतू काम में लगा है। ऐसे काम कर रहा है जिसकी जरूरत ही नहीं है। पर यह आज अखबारों की खबर या खबरों के चयन से नहीं दिख रहा है।
इसके उलट, अमर उजाला की लीड के शीर्षक से लगता है कि चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि बिना सूचना व सुनवाई के बिहार में मतदाता सूची से नहीं हटेगा कोई नाम। यह हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड के लगभग विपरीत है। हालांकि, यह संभव है कि सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग ने यह दलील दी हो पर उसे माना नहीं गया हो और अंत में उसे यह हलफनामा दाखिल करना पड़ा हो कि बिना सुनवाई के कोई नाम नहीं हटेगा यानी जो हटा दिये गये बताये गये हैं उनके मामले में सुनवाई होगी। जो भी हो, खबरें दिलचस्प हैं। हालांकि, चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में यह दावा भी किया तो वह कम नहीं है। द टेलीग्राफ की खबर है, सुप्रीम कोर्ट में कहा गया है कि कारण बताने के लिए बाध्य नहीं है। मुख्य शीर्षक है, मतदाता सूची में नाम नहीं है? चुनाव आयोग नहीं बतायेगा क्यों। इन खबरों से साफ है कि चुनाव आयोग का मामला तो है और अगर इन अखबारों के लिए प्रमुख या लीड जैसी खबर है तो बाकी अखबारों की लीड को भी जानना-समझना चाहिये। पत्रकारिता के नजरिये से यह शर्मनाक है कि ऐसे समय में अखबारों ने प्रधानमंत्री के दावे को ही लीड बना दिया है। वह भी तीन महीने बाद जबकि अभी ऐसा कोई दूसरा मामला या दावा नहीं है और स्पष्ट है कि सरकार या प्रधानमंत्री चाहते हैं कि बिहार चुनाव तक यह मामला बना रहे और उन्हें (उनकी पार्टी को) उनकी इस वीरता के लिए ईनाम मिले और वे जीत जायें। भले यह उनकी वीरता नहीं है और युद्ध लड़ने वाले कह चुके हैं कि उनके हाथ बंधे हुए थे। अब इसी कलंक से बचना है या खत्म करना है और इसी दिशा में काम होता नजर आ रहा है। बहुत सारे अखबार अपनी पूरी सेवा दे रहे हैं।
दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है, ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान भारतीय तकनीक ने पाकिस्तान को घुटनों पर ला दिया। द हिन्दू की लीड भी यही है। हिन्दी में यह इस प्रकार होगा – प्रधानमंत्री ने कहा, भारत कुछ ही घंटों में पाकिस्तान को घुटनों पर ले आया। यह सही भी हो तो तथ्य है कि भारत को मणिपुर में क्या हो रहा है से मतलब नहीं है और ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान जम्मू में जो हुआ वह याद ही नहीं है। यह प्रधानमंत्री का दावा है और इसलिए लीड तो हो ही सकती है पर मुद्दा यह है कि पाकिस्तान कब सीना ताने खड़ा था या भारत को चुनौती दे रहा था? अगर पहलगाम हमला उसकी करतूत है तो उसने कहां कहा है या हमला कौन सा ऑपरेशन सिन्दूर की तरह खुल कर (या कह कर) किया गया था। यह तो चोरी-छिपे मौके पर वारदात करके भागना था, भले घेर कर मार दिये गये। इसके अलावा मोदी ने और भी दावे किये हैं, अपनी पीठ खुद थपथपाई है। पर यह सब खबर नहीं है फिर भी अखबारों में प्रमुखता से छपी है।
अगर किसी को प्रधानमंत्री का कहा पसंद न आये, लीड जैसी खबर न लगे और हेडलाइन मैनेजमेंट जरूरी है ताकि राहुल गांधी की खबर पहले पन्ने पर न छप जाये तो रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का योगदान भी आज के अखबारों में दिख रहा है। नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, सबके बॉस को रास नहीं आ रहा भारत का विकास। यह खबर आज टाइम्स ऑफ इंडिया की भी लीड है। इसका इंट्रो है, बहुतों को भारत की प्रगति पच नहीं रही है। इंडियन एक्सप्रेस ने भी राजनाथ सिंह के इस तंज को लीड बनाया है और शीर्षक में ही बता भी दिया है कि यह ट्रम्प पर उनका कटाक्ष है। इसमें यह भी कहा गया है, हमें नहीं रोक सकते। यह तो हुई मेरे नौ अखबारों की लीड की कहानी और मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री के हवा-हवाई दावों को 11 वर्ष में लीड बनाना जरूरत से ज्यादा महत्व देना है। पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था के बाद दुनिया की तीसरी अर्थव्यवस्था का प्रचार बेमतलब है और अब तो प्रचारकों, समर्थकों को भी समझना चाहिये कि पूरा मामला झूठ की बुनियाद पर ही चल रहा है। इसमें चुनाव आयोग पर आरोप, उसे संरक्षण और वह वह जिन अधिकारों का दावा कर रहा है सब असामान्य है। इसलिये प्रमुखता से छपनी चाहिये लेकिन उसकी उपेक्षा करके सरकारी दावों को महत्व दिया जा रहा है।
उदाहरण के लिए, आप जानते हैं कि बिहार में एसआईआर के बाद मतदाता सूची का जो प्रारूप आया उसमें तमाम गलतियां थीं और विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव का नाम ही नहीं था। इसपर चुनाव आयोग ने जो सब किया वह तो पहले पन्ने की खबर रही लेकिन अब जब तेजस्वी यादव ने बताया है कि बिहार के उपमुख्यमंत्री के दो वोटर आईकार्ड हैं तो यह खबर सिर्फ द हिन्दू में पहले पन्ने पर गंभीरता से दिखी। खबर है कि बिहार ने उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा को भी नोटिस भेजा है। कहने की जरूरत नहीं है कि दो बार नाम होना गलत और अनुचित है। ऐसा होने पर कार्रवाई के नियम हैं पर चुनाव आयोग ने इस ओर कभी ध्यान ही नहीं दिया। इसलिए कार्रवाई उनपर होनी चाहिये जो इसके लिए जिम्मेदार है। यही नहीं, चुनाव आयोग राहुल गांधी को मांगने पर भी मशीन से पढ़ने योग्य मतदाता सूची नहीं मुहैया करा रहा है पर यह सुविधा और तकनीक उपलब्ध है तो अपने स्तर पर नामों के दोहराव की जांच के लिए भी इसका उपयोग नहीं करता है। हिन्दू में आज पहले पन्ने पर एक और महत्वपूर्ण खबर है जो दूसरे अखबारों में इतनी प्रमुखता से नहीं है। खबर के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने जम्मू और कश्मीर हाईकोर्ट से कहा है कि जम्मू कश्मीर विधानसभा में नामांकन निर्वाचित सरकार के अधिकार से बाहर है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने यह भी कहा है कि उपराज्यपाल का कार्यालय सरकार का विस्तार नहीं है। फिर भी, केंद्र शासित प्रदेश के उपराज्यपाल, सरकार की “सहायता और सलाह” के बिना, जम्मू-कश्मीर विधानसभा में पाँच सदस्यों को नामित कर सकते हैं।
इंडियन एक्सप्रेस में एक खबर है जो बताती है कि प्रशिक्षण के दौरान घायल हुए एनडीए और आईएमए के कई प्रशिक्षु इलाज के लिए तरस रहे हैं। सरकार की बहुप्रचारित आयुष्मान योजना से उनका काम नहीं होना है। प्रशिक्षण के दौरान घायल होकर अयोग्य करार दिये जाने वाले ऐसे कोई 500 उम्मीदवार हैं और ये 1985 से अब तक के उम्मीदवार हैं। अकेले एनडीए से पांच साल में ऐसे 20 उम्मीदवारों को अयोग्य करार दिया गया है। नियमानुसार ये पूर्व सैनिक भी नहीं हैं क्योंकि चुने जाने के बाद अफसर होने से पहले अयोग्य हो गये। जो भी हो, ये काम पर घायल या अयोग्य हुए हैं, पुराना मामला है और सैनिकों के मामलों को जज्बातों से जोड़ने वाले सरकार समर्थक लोग इस मामले में निस्चिंत हैं और 1985 से लेकर अभी तक कुछ खास नहीं हुआ है। उल्टे इस सरकार ने अग्निवीर योजना पेश की है जो उम्मीदवारों को उनका हक नहीं देती है। यह मामला भले उससे पुराना है और रक्षा मंत्री ने गये साल प्रशिक्षण के दौरान घायल हुए उम्मीदवारों के लिए एक्सग्रेशिया में वृद्धि की सहमति दे दी थी पर यह मामला अभी तक लटका हुआ है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का भी अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


