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आज के अखबार : प्रचारक मीडिया में करुर भगदड़ की खबर एक हफ्ते चली, जहरीली दवा खबर ही नहीं बनी    

संजय कुमार सिंह

जहरीले कफ सिरप कोल्डरिफ से बच्चों की मौत के बाद इस दवाई का सेवन करने की चिकित्सीय सलाह देने वाले मध्य प्रदेश के सरकारी डॉक्टर प्रवीण सोनी को गिरफ्तार कर लिया गया है। द हिन्दू की खबर के अनुसार सरकार ने उन्हें सेवा से निलंबित कर दिया है। तमिलनाडु के दवा निर्माता के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। आप जानते हैं कि मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और तमिलनाडु में चुनाव होने हैं। भारतीय जनता पार्टी वहां चुनाव जीतने के लिए बिसात बिछा रही है। दीदी ओ दीदी जैसी पुकार अखबारों में सुनाई दे रही है। करुर हादसे की दिल्ली में लगातार कई दिनों से छप रही खबर और सोशल मीडिया पर भाजपा की सेना के हंगामे से यह स्पष्ट है। कल मैंने लिखा था कि प्रधानमंत्री बिहार जीतने में लगे हैं, कर्पूरी ठाकुर का सहारा ले रहे हैं पर जहरीली दवाई से मरने वाले बच्चों की चिन्ता नहीं थी। आज देशबन्धु की खबर से पता चलता है कि हत्या का मामला कंपनी और डॉक्टर दोनों पर दर्ज हुआ है। दवाई जहर है – यह जाने बिना दवाई समझकर, दवाई की तरह सेवन करने के लिए लिखने वाले डॉक्टर के खिलाफ कार्रवाई, वह भी गिरफ्तारी और नौकरी से निलंबन की तुक समझने के लिए खबरें पढ़नी पड़ी। देशबन्धु से ही पता चला कि ‘त्वरित कार्रवाई’ सरकारी डॉक्टर होते हुए निजी क्लिनिक चलाने के लिए की गई है। वैसे तो निर्माता की गिरफ्तारी मध्य प्रदेश पुलिस भी कर सकती है और अमृत काल में ऐसी कार्रवाई होती रही है लेकिन आज की खबर का संदेश यह है कि मध्य प्रदेश की पुलिस ने भाजपा शासन में त्वरित कार्रवाई की और तमिलनाडु पुलिस पीछे रह गई। हो सकता है, मकसद यह नहीं हो पर संदेश तो है ही।

‘ना खाउंगा ना खाने दूंगा’ और ‘मेरी सरकार पर भ्रष्टाचार का कोई दाग नहीं है’ – जैसे दावों के बावजूद सरकारी डाक्टर निजी क्लिनिक चला रहा था, तमिलना़डु की कंपनी की जहरीली दवाइयां (भाजपा शासित राज्यों में) बिक रही थी। और बात इतनी ही नहीं है, शिकायत के बावजूद कार्रवाई नहीं की गई। बचाव किया गया और टालने व समय लेने की कोशिश की गई। अब डॉक्टर के खिलाफ कार्रवाई का कोई मतलब नहीं है और सरकारी नौकरी में रहते हुए निजी क्लिनिक चलाना या उसमें काम करना वैसे ही गलत है। लेकिन अलग मामला है। दवा में जहर हो और डॉक्टर को पता नहीं हो तो डॉक्टर कैसे जिम्मेदार हुआ? जो जिम्मेदार है उसके खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई है। कारण चाहे जो हो। मामले को ठीक से समझने के लिए बता दूं कि ‘कोल्डरिफ’ एक कफ सिरप है। इसका उपयोग बच्चों में खांसी, जुकाम और सर्दी जैसे लक्षणों के इलाज के लिए किया जाता था। यह दवा भारत में बनती थी और कई विकासशील देशों में इसका निर्यात भी किया गया है। खबरों के अनुसार इस दवा से संबंधित पहली चेतावनी 2024 के अंत या 2025 की शुरुआत में उज्बेकिस्तान से मिली थी। वहां की सरकार ने रिपोर्ट किया कि 18 बच्चों की मौत एक भारतीय कंपनी द्वारा बनाए गए कफ सिरप के सेवन से हुई है। यह कफ सिरप भारत में निर्मित था – नाम था कोल्डरिफ। इस आधार पर कहा जा सकता है कि डॉक्टर को इसकी जानकारी होनी चाहिए थी और यह दवा लिखना लापरवाही है। लेकिन जो हुआ उसमें डॉक्टर के खिलाफ ऐसा मामला भी नहीं बनेगा।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जनवरी 2025 में कोल्डरिफ और उससे संबंधित अन्य कफ सिरप के “खतरनाक” रसायनों की जांच की। प्रयोगशाला रिपोर्ट में यह सामने आया कि दवा में डायथिलीन ग्लाइकॉल और एथिलीन ग्लाइकॉल पाए गए – ये रसायन मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यंत जहरीले होते हैं। भारत सरकार ने भी जनवरी–फरवरी 2025 में इसकी जांच कराई। ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया यानी डीजीसीआई या भारत के औषधि महा नियंत्रक ने संबंधित कंपनी और उसके निर्माण स्थल की जांच शुरू की। सैंपल लिए गए और टेस्टिंग शुरू हुई। शुरुआती रिपोर्ट में कुछ सैंपल “असुरक्षित” पाए गए। संबंधित राज्य सरकार (जहां दवा निर्माण हुआ) ने कंपनी का उत्पादन लाइसेंस रद्द कर दिया। फैक्ट्री को सील कर दिया गया। फिर भी लगता है कि दवा बाजार में मौजूद रही। ना उसे वापस लिए जाने के संकेत हैं और ना डॉक्टर्स को इस बारे में सूचना देने के। वह भी तब जब अंतरराष्ट्रीय जांच चल रही थी और दबाव होना चाहिए। लेकिन भारत परमाणु शक्ति से नहीं डरता है तो ऐसी जांच की क्या बिसात। विश्व स्वास्थ्य संगठन उज्बेकिस्तान और अन्य देशों की मेडिकल एजेंसियों ने भारत से और पारदर्शिता की मांग की। यह मामला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की फार्मा उद्योग की छवि को भी प्रभावित कर ही रहा होगा। लेकिन प्रभावी कार्रवाई ना देश में हुई ना विदेश में। कारण समझना चाहें तो यह तथ्य है कि देश की नामी कंपनियों ने इलेक्टोरल बांड खरीदे थे और भाजपा को चंदा दिया है। अरबिन्दो फार्मा का मामला सुर्खियों में रहा है क्योंकि उसके एक निदेशक पी शरत चंद्र रेड्डी को दिल्ली एक्साइज नीति वाले मामले में गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद ही कंपनी ने बांड खरीदे और उसे भाजपा को दिया गया। और भी मामले हैं पर अभी वह मुद्दा नहीं है। सरकार ने फार्मा निरीक्षण और निर्यात गुणवत्ता नियंत्रण को मजबूत करने के लिए नई नीतियाँ घोषित कीं। जून 2025 में दवाओं के निर्यात से पहले अनिवार्य परीक्षण की घोषणा की गई। हालांकि, दवाइयों का जहरीला होना संबंधित कंपनी की लापरवाही, घटिया क्वालिटी कंट्रोल और सस्ते जहरीले रसायनों के प्रयोग के कारण ही होगा। बेशक डीजीसीआई की ढीली निगरानी प्रणाली भी जिम्मेदार रही होगी।

इस मामले में तमिलनाडु सरकार ने कार्रवाई की है और मध्य प्रदेश सरकार की कार्रवाई की खबर आज छपी है। यह सब तब है जब ‘कोल्डरिफ कफ सिरप’ कांड भारत के फार्मास्युटिकल उद्योग के लिए खतरे की घंटी है। स्पष्ट है कि सरकार को निगरानी और सुरक्षा मानकों को भी मजबूत करना होगा लेकिन ऐसा कुछ किया गया होता या किया जाता तो इतने बच्चे क्यों मरते। राजनीतिक कारणों से करुर हादसा तो पहले पन्ने पर बना रहा लेकिन जहरीली दवाई के मामले में कार्रवाई के नाम पर डॉक्टर की गिरफ्तारी की खबर पाठकों की आंखों में धूल झोंकने के लिए ही है। अखबारों में कल खबर थी कि शुरू में सरकार या सरकारी एजेंसियों ने कोल्डरिफ में जहरीला पदार्थ नहीं होने की बात की थी लेकिन मौतों के बाद यू टर्न ले लिया। वास्तविकता यह है कि जब कुछ बच्चों में अचानक गुर्दे (किडनी) संबंधी जटिलताएँ आना शुरू हुईं, तो स्वास्थ्य प्रशासन एवं जिला स्तर के अधिकारी वजह नहीं बता सके। प्रारंभिक जांच और मीडिया रपटों में यह संकेत दिया गया कि ऐसा किसी संक्रमण, पानी या पर्यावरण प्रदूषण या सामान्य जुकाम/बुखार की जटिलता के कारण हो सकता है। आइये अब इस खबर का रिपोर्टिंग और प्रस्तुति की बात कर लें। अमर उजाला में यह खबर कल लीड थी। शीर्षक में दवा का नाम या मरने वालों की संख्या नहीं थी। आज लीड के ऊपर आठ कॉलम में छपी खबर में बताया गया है – डॉक्टर गिरफ्तार, उत्तर प्रदेश में भी पाबंदी। सच्चाई यह है कि कार्रवाई दिखावा है, पाबंदी बहुत पहले लग जानी चाहिए थी, डॉक्टर को सूचना होनी चाहिए थी। नवोदय टाइम्स ने कंपनी पर एफआईआर की खबर को ही लीड बनाया है। दि एशियन एज का शीर्षक है मरने वालों की संख्या बढ़कर 13 हुई, डॉक्टर गिरफ्तार। द टेलीग्राफ में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक है, डॉक्टर गिरफ्तार, सिरप से मध्य प्रदेश में मरने वाले बढ़कर 14 हुए तो एसआईटी का गठन। हिन्दुस्तान टाइम्स में भी सरकारी खबर है। शीर्षक है, कफ सिरप से मरने वाले बढ़े डॉक्टर गिरफ्तार तमिलनाडु की फर्म के खिलाफ मामला दर्ज। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि करुर की घटना हफ्ते भर से ज्यादा दिल्ली में पहले पन्ने पर रही। इस घटना में अगले ही दिन सरकारी कार्रवाई की खबर छपी है। और जहरीली दवा से मरने वालों की संख्या तक सही नहीं है या जोड़कर नहीं लिखी जा रही है। करुर में सरकारी कार्रवाई कहीं ज्यादा उचित और गंभीर है। हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर के अनुसार अकेले मध्य प्रदेश में 17 मौतें हो चुकी हैं। दि एशियन एज ने लिखा है कि मरने वालों की संख्या बढ़कर 13 हुई। जाहिर है, अखबार संख्या छिपा रहे हैं या कम बताने की कोशिश कर रहे हैं

इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार यह मामला अगस्त से चल रहा है और 11 बच्चे सिर्फ मध्य प्रदेश के छिन्दवाड़ा में मरे हैं। कुछ और राज्यों में मौत हुई है। मुझे राज्यवार कोल्डरिफ से हुई मौतों की संख्या नहीं मिली। कुम्भ में भगदड़ से मरने वालों की संख्या नहीं बताई गई, नई दिल्ली स्टेशन पर मरने वालों की संख्या और उससे संबंधित हंगामे को रोकने के लिए रेलवे ने पहली बार नकद मुआवजा बांट दिया था। करुर समेत वह सब अलग कहानी है। जहरीली दवा के इस मामले में कायदे की खबर सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस में है। शीर्षक है, मध्य प्रदेश के इस शहर में, जहाँ कफ सिरप से 11 मौत हो चुकी है, एक ही बात: कोई सुविधा नहीं है, नागपुर जाना पड़ा। परासिया डेटलाइन से आनंद मोहन जे की खबर इस प्रकार है, (संपादित गूगल अनुवाद) प्रकाश यदुवंशी अपने बेटे की मौत पर बयान दर्ज कराने के लिए परासिया थाने के बाहर खड़े थे। उनके हाथ में दस्तावेजों का एक फोल्डर था, जिसमें छह डायलिसिस सेशन की रसीदें और तीन अस्पतालों की डिस्चार्ज समरी शामिल है। मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के परासिया निवासी यदुवंशी ने कहा, “वह मेरा इकलौता बेटा था। सरकारी अस्पतालों में उचित इलाज नहीं था। मेरे पास नागपुर के निजी अस्पतालों में जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।” अपने बेटे को छिंदवाड़ा से लगभग 150 किलोमीटर दूर महाराष्ट्र के नागपुर ले जाने का फैसला बहुत महँगा था। उन्होंने अपने बेटे के अस्पताल में भर्ती होने और डायलिसिस के इलाज पर सात लाख रुपये खर्च किए। ये पैसे उन्होंने पत्नी के गहने बेचकर और स्थानीय लोगों से उधार लेकर जुटाए थे। आखिरकार, वह डायलिसिस का खर्च वहन नहीं कर सके। अगस्त और अक्टूबर के बीच छिंदवाड़ा जिले में कम से कम 11 बच्चों की कथित तौर पर दूषित कफ सिरप पीने से मौत हो चुकी है। कायदे से उज्बेकस्तान की खबर के बाद यह सुनिश्चत किया जाना चाहिए था कि दवाई में गडबड़ी नहीं है। लेकिन जो हुआ वह हत्या है।  

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

लेखक संजय कुमार सिंह से संपर्क [email protected] के ज़रिए किया जा सकता है।

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