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जनसत्ता की मेरी पत्रकारीय यात्रा : छोटे, सरल और सीधे सपाट वाक्य लिखने की आदत डाली!

जयंत सिंह तोमर-

श्री रामनाथ गोयनका द्वारा स्थापित ‘इंडियन एक्सप्रेस’ समूह के अखबार ‘जनसत्ता’ से मेरी पत्रकारिता की यात्रा शुरू हुई थी। मेरे अध्यापक प्रोफ़ेसर कमल दीक्षित जी ने मुझे ‘जनसत्ता’ के कलकत्ता संस्करण में प्रशिक्षण के लिए भेजा था।‌ कवि त्रिलोचन की चंपा कलकत्ते पर जिस कारण बजर या बिजली गिराना चाहती है तब ऐसे कोई हालात हमारे जीवन में नहीं थे।

उन दिनों सम्पादक श्याम आचार्य जी थे। उन्हें जब पता चला कि ठहरने का मेरा कोई इंतजाम नहीं है तो भारतीय भाषा परिषद के अतिथि गृह में डा. प्रभाकर श्रोत्रीय जी से कहकर सप्ताह भर के लिए मेरी व्यवस्था कराई।‌ यह कहते हुए कि सात दिन में अपने लिए रहने का बंदोबस्त न कर सको तो वापस चले जाना।

जनसत्ता के ही वरिष्ठ साथी कृष्णकुमार जी ने अलीपुर चिड़ियाघर के पास, जहां उनका घर था, एक मंदिर परिसर में कमरे की व्यवस्था मेरे लिए कर दी। कृष्णकुमार जी बड़े सहृदय व्यक्ति थे। वे अब इस दुनिया में नहीं हैं।

जनसत्ता में मैंने बहुत कुछ सीखा। जनसत्ता की वर्तनी और शैली से परिचित हुआ।‌ छोटे, सरल और सीधे सपाट वाक्य लिखने की आदत डाली। बताया गया कि ‘द्वारा’ का उपयोग बहुत जरूरी हो तभी करें। आधा ‘न’ की जगह बिंदी का उपयोग करें। हालांकि इस बात से कृष्ण बिहारी मिश्र जी बहुत नाराज़ रहे जो कलकत्ता विश्वविद्यालय में हिन्दी के अध्यापक थे और हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास पर बड़ी अच्छी किताब लिखी है।

तब सिटी चीफ़ गंगा प्रसाद जी होते थे जो आपातकाल के शुरुआत के दौर में ‘चौरंगी वार्ता’ से जुड़े थे। कवि त्रिलोचन के सुपुत्र अमित प्रकाश सिंह समाचार सम्पादक थे। खेल फ़ज़ल इमाम मल्लिक जी देखते थे, क्राइम प्रभात रंजन दीन, व्यापार प्रमोद मल्लिक। सम्पादकीय विभाग में दीपक रस्तोगी, शैलेन्द्र जी, विनय बिहारी जी, डॉ मांधाता सिंह, पलाश विश्वास, सुमंत भट्टाचार्य आदि थे।‌

जनसत्ता का मास्ट हेड दिलीप चिंचालकर ने डिज़ाइन किया था। अपने समय में हिन्दी का सम्भवतः पहला अखबार था जो आठ के बजाय छह कालम में निकला।‌ प्रभाष जोशी जी के नेतृत्व में जनसत्ता ने हिन्दी के एक से बढ़कर एक श्रेष्ठ और साहसी पत्रकार दिए।‌ इसके तेवर कैसे होंगे यह शायद ‘एवरीमेंस’ और ‘प्रजानीति’ के समय से ही तय हो गया था जब अज्ञेय जी व अजित भट्टाचार्य र्जी आदि इसका सम्पादन कर रहे थे।

एक समय जनसत्ता खरीदने के लिए लाइन में लगना पड़ता था। अपने रविवासरीय में समाज के नायकों को स्थान देना इस अखबार ने शुरू किया। पीढ़ी के बदलाव का असर जनसत्ता पर हुआ है, पर उसकी शैली और तेवर कमोवेश वही हैं।

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