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सुख-दुख

द वीक के सीनियर फोटो जर्नलिस्ट पवन कुमार नहीं रहे!

राजीव तिवारी बाबा-

सीनियर फोटो जर्नलिस्ट पवन कुमार जी का आज सुबह निधन हो गया। पवन भाई प्रतिष्ठित मैगज़ीन ‘दि वीक’ के के अलावा इंटरनेशनल न्यूज एजेंसी रॉयटर लिए काम करते भी थे। परिजनों के मुताबिक पवन जी कल शाम ही अमृतसर बेटे के यहां से लौटे थे। आज सुबह नाश्ते के बाद सोफे पर बैठे बैठे अकस्मात उनका हार्ट कोलैप्स कर गया। अभी दस दिन पहले युवा फोटो जर्नलिस्ट पृथ्वी के निधन के बाद बेहद सरल व मिलनसार पवन जी के अचानक यूं चले जाने से राजधानी लखनऊ के मीडिया जगत में शोक की लहर है। बाबा से प्रार्थना है पवन भाई को अपने श्री चरणों में स्थान और परिजनों को धैर्य प्रदान करें। ॐ शांति!


लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार नवेद शिकोह लिखते हैं-

अंडर सिक्सटी दुनिया छोड़ रहे छायाकार, पृथ्वी के बाद पवन की मौत…. लखनऊ में कोई एक महीना नहीं गुजरता जब किसी जर्नलिस्ट या फोटो जर्नलिस्ट की मौत की खबर ना आए। खासकर फोटो जर्नलिस्ट तो हर दौर में असमय मृत्यु को प्राप्त होते रहे हैं।‌ लखनऊ के जमीनी छायाकार कुमार पृथ्वी की मौत का ग़म धुंधला भी नहीं पड़ा था कि ‘द वीक” के सीनियर फोटो जर्नलिस्ट पवन कुमार भी दुनिया छोड़ गए। ये फोटोग्राफी की दुनिया में अपने एक्सक्लूसिव वर्क के लिए जाने जाते थे। लाइट और कम्पोजिशन की विशिष्टता पवन की तस्वीरों को यादगार बनाती थी।

मेहनत और क्रिएशन के बाद भी आज लखनऊ जैसी राजधानी में भी मीडिया के छायाकारों की व्यवसायिक दुनिया में तमाम दुश्वारियां है। इस तकनीकी युग में भी फोटोग्राफी एक ऐसा प्रोफेशन है जहां भागदौड़ में कोई रियायत नहीं। और नौकरी की भी कोई गारंटी नहीं। दिल्ली-, मुंबई जैसे बड़े शहरों की तरह यहां काम की विशिष्टता काम दिलाती रहे इस बात की भी कोई गारंटी नहीं। मुख्यमंत्री की टीम का बढ़ता दायरा,सोशल मीडिया, खास-ओ-आम इंसान के हाथ में बेहतरीन कैमरे वाले स्मार्टफोन … इत्यादि ने प्रेस फोटोग्राफर की व्यवसायिक दुनिया में तमाम चुनौतियां पैदा कर दी हैं।

जाड़ा, गर्मी, बरसात की दौड़ धूप। जाड़े की ठंडी रातें, गुर्मी की झुलसाने वाली धूप और आंधी-पानी से मुकाबला करते, पुलिस की लाठियों और दंगाइयों के पत्थर खाने वाले छायाकारों का जीवन बहुत कठिन है। लेकिन मौत आसान है। कभी एक्सीडेंट में तो कभी धनाभाव में सही इलाज ना होने के कारण। मेहनत, परिश्रम और भागदौड़ की थकी हारी जिन्दगी ज्यादा साथ नहीं देती और चुपके से आकर मौत जिन्दगी की मुश्किलें आसान कर देती है।

अजगर पड़ा रहता है, ज्यादा परिश्रम और दौड़-भाग नहीं करता और सौ साल से ज्यादा जीता है। घोड़ा जीवन भर दौड़ता है पर दस वर्ष की अल्प आयु ही जीता है।

हमारे लखनऊ के ज्यादातर छायाकार भाई अंडर सिक्सटी भगवान को प्यारे हो रहे हैं। कुमार पृथ्वी की मौत के एक सप्ताह भीतर ही पवन कुमार भी चले गए। मौत की किताब के वर्क पलटकर देखिए – पारी, विजय पिंटू, मनोज देवगन, संजय त्रिपाठी, जगत, देवा, राजू तिवारी, बी डी गर्ग, कृष्ण मोहन मिश्र… इनमें नब्बे फीसद साठ साल से पहले दुनिया छोड़ गए। श्रद्धांजलि!

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